आदर्श परिवार: ईमान और प्रेम से मज़बूत समाज का निर्माण
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परिवार

आदर्श परिवार: ईमान और प्रेम से मज़बूत समाज का निर्माण

परिवार मानव समाज की आधारशिला है, और इस्लाम में, समाज की नींव के रूप में इसे एक पवित्र स्थान प्राप्त है। यह सिर्फ़ एक छत के नीचे रहने वाले लोगों का समूह नहीं है बल्कि यह एक ऐसा पवित्र स्थल है जहाँ ईमान बढ़ता है, प्रेम फलता-फूलता है, और सम्मान व दया सभी को एक साथ बाँधे रखती है। एक मज़बूत इस्लामी परिवार दयालु हृदयों को आकार देता है, शाश्वत मूल्यों को बनाए रखता है, और इस्लाम के मूल्यों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाता है। लेकिन आज की तेज़-तर्रार दुनिया में, उस नींव को मज़बूत बनाए रखना हमेशा आसान नहीं होता। आइए जानें कि एक आदर्श इस्लामी परिवार क्या होता है और हम आधुनिक चुनौतियों के बावजूद इसे कैसे पोषित कर सकते हैं।

एक इस्लामी परिवार का हृदय

मूल रूप से, एक इस्लामी परिवार विवाह से शुरू होता है, एक खूबसूरत बंधन जिसे ईश्वर ने शांति, प्रेम और दया का स्रोत बताया है। क़ुरआन की सूरह अल-रूम आयत 21 में कहा गया है, "और उसकी निशानियों में से यह भी एक निशानी है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हारे ही बीच से जोड़े बनाए ताकि तुम उनके साथ सुकून पाओ, और उसने तुम्हारे बीच प्रेम और दया रखी। निस्संदेह, इसमें उन लोगों के लिए निशानियाँ हैं जो चिंतन करते हैं।" 

विवाह केवल संगति के बारे में नहीं है, बल्कि यह एक इबादत का कार्य है, एक साझेदारी जहाँ दो लोग एक-दूसरे को अल्लाह के करीब आने में मदद करते हैं। एक इस्लामी परिवार में, हर किसी की एक भूमिका होती है। पति का कर्तव्य घर की सुरक्षा करना होता है, जबकि पत्नी सम्मान के साथ घर का पालन-पोषण और देखभाल करती है। ये भूमिकाएँ कोई बहुत बड़ा पहाड़ नहीं हैं बल्कि एक-दूसरे की पूरक हैं, इसमें आपसी सम्मान और निष्पक्षता निहित हैं। 

पैगंबर मुहम्मद सल्ल० ने कहा, "तुममें से सबसे अच्छे वे हैं जो अपने परिवारों के साथ सबसे अच्छे हैं" (तिर्मिज़ी)। यह सरल सलाह हमें याद दिलाती है कि घर में दयालुता सच्चे चरित्र का एक पैमाना है। 

परिवार आस्था की पहली पाठशाला भी हैं। माता-पिता अपने बच्चों को केवल नमाज़ पढ़ना या क़ुरान पढ़ना ही नहीं सिखाते बल्कि वे अपने कार्यों से ईमानदारी, करुणा और अल्लाह के प्रति समर्पण का उदाहरण पेश करते हैं। ऐसे घरों में पले-बढ़े बच्चे अपनी इस्लामी पहचान में आत्मविश्वास से भरे होते हैं और उसे आगे बढ़ाने के लिए तैयार रहते हैं। क़ुरान और सुन्नत से प्रेरित परिवार प्रेम, खुले संवाद, सौम्य अनुशासन और रिश्तेदारों के साथ मज़बूत रिश्तों से फलता-फूलता है।

आज हमारे सामने चुनौतियाँ

लेकिन सच कहें तो आज एक आदर्श मज़बूत परिवार बनाने के अपने संघर्ष हैं। हमारे आसपास की दुनिया तेज़ी से बदल रही है। वैश्वीकरण और सोशल मीडिया अक्सर ऐसे मूल्यों को बढ़ावा देते हैं जो इस्लामी शिक्षाओं के विपरीत होते हैं, जैसे "हम" के बजाय "मैं" को प्राथमिकता देना या विनम्रता को कमतर आंकना। तकनीक, मददगार होते हुए भी, परिवारों को अलग करने की ज़िम्मेदार है। हम कितनी बार देखते हैं कि हर कोई एक-दूसरे से बात करने के बजाय अपने फ़ोन से चिपका रहते है? बच्चों के बारे में तो क्या ही कहा जाए, उनके और भ्रमित नुकसान पहुंचाने वाली दुनिया के बीच में मात्र एक क्लिक की दूरी है। 

आर्थिक तनाव और "बराबरी बनाए रखने" का दबाव लोगों को डिप्रेशन में धकेल रहा है। समाज हमें आलीशान शादियों, डिज़ाइनर जीवनशैली और अंतहीन तुलनाओं की ओर धकेलता है, जिससे रिश्तों में तनाव बढ़ता जा रहा है और हम अपने भीतर खालीपन महसूस करते हैं। अतीत के संयुक्त परिवार भी विलुप्त हो रहे हैं, जिसमें दादा-दादी, नाना-नानी की सलाह, उनके दिए हुए संस्कार भविष्य की चुनौतियों का सामना करने में सहायक होते थे।

शायद सबसे कठिन चुनौती पारिवारिक कलह और तलाक में वृद्धि है। अधीरता, संवाद की कमी और इस्लामी मूल्यों को भूल जाने के कारण छोटी-छोटी असहमतियां कभी कभी बड़ी दरार में बदल जाती है। इससे बच्चे बीच में फँस जाते हैं और खोया हुआ, असुरक्षित महसूस करते हैं। हमें मानसिक स्वास्थ्य संबंधी संघर्षों—जैसे तनाव, चिंता या अकेलेपन को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए, जो चुपचाप हमारे घरों में घुस आते हैं और हमारे प्रिय बंधनों को कमज़ोर कर देते हैं।

कुरान और सुन्नत की रौशनी में समाधान

ये चुनौतियाँ भारी लग सकती हैं, लेकिन इस्लाम हमें मार्गदर्शन के लिए शाश्वत ज्ञान प्रदान करता है। पारिवारिक जीवन को ईमान पर आधारित करना पहला कदम है। फिर भी, इसका मतलब केवल साथ मिलकर प्रार्थना करना नहीं है। ईमान को मज़बूत करने का अर्थ है एक ऐसा घर बनाना जहाँ हर वयस्क अपनी ज़िम्मेदारियों (फ़रा'इद) को समझे और पूरा करे और दूसरों के अधिकारों (हुक़ूक़) का सम्मान करे। पति दया से पेश आए और सुरक्षा प्रदान करे, पत्नी निस्वार्थ भाव से पालन-पोषण करें; बच्चे सम्मान से सुनें और माता-पिता प्रेम पूर्वक मार्गदर्शन करें। जब प्रत्येक सदस्य अल्लाह और एक-दूसरे के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करता है, तो घर में संतुलित, न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण वातावरण बनता है।

साथ ही, प्रार्थना, कुरान पाठ और अल्लाह का स्मरण केंद्र में रहना चाहिए। एक साथ इबादत करने वाला परिवार हर कार्य में ईश्वरीय चेतना के साथ जीना सीखता है, चाहे वह कमाने, खर्च करने, बोलने या बच्चों की परवरिश में हो। यह समग्र दृष्टिकोण आस्था को पारिवारिक जीवन का दिशासूचक बनाता है, निर्णयों पर मार्गदर्शन करता है, विवादों का समाधान करता है और घर को सुख शांति से भर देता है।

वैवाहिक सद्भाव को दया और करुणा के माध्यम से बहाल किया जाना चाहिए, जैसा कि पैगंबर (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने अपने घर में दिखाया था। वह सौम्य, स्नेही और शीघ्र क्षमा करने वाले थे। जब विवाद उत्पन्न हों, तो खुलकर बात करें, सहानुभूति के साथ सुनें, और प्रेम पूर्वक बर्ताव करें, अहंकार को आसपास फटकने भी ना दें।

आज पालन-पोषण के लिए अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता है। हमारे बच्चे विकर्षणों और मिश्रित संदेशों से भरी एक डिजिटल दुनिया में बड़े हो रहे हैं। माता-पिता केवल भरण-पोषण करने वाले ही नहीं, बल्कि चरवाहे भी हैं, जो अपने बच्चों के चरित्र को अपने उदाहरण से आकार देते हैं। बच्चों को अंतहीन विकर्षणों से भरी दुनिया में, बिना मार्गदर्शन के, अकेला नहीं छोड़ा जा सकता।

विश्वसनीय मीडिया, लाभकारी शिक्षा को प्रोत्साहित करना और इस्लामी पहचान में विश्वास का पोषण उन्हें भ्रम से बचाएगा। पैगंबर मुहम्मद (सल्ल०) ने कहा, "तुम में से प्रत्येक एक चरवाहा है, और तुम में से प्रत्येक से उसके झुंड के बारे में पूछा जाएगा।" (बुखारी और मुस्लिम)।

पारिवारिक संबंधों की ताकत को न भूलें। पारिवारिक संबंधों और सामुदायिक सहयोग को पुनर्जीवित करने से परिवार की और उससे समाज की नींव मजबूत होती है। इस्लाम रिश्तेदारों के साथ संबंध बनाए रखने पर बहुत जोर देता है। बड़ों के साथ नियमित संपर्क, सामुदायिक जुड़ाव और साझा पारिवारिक गतिविधियाँ ज्ञान, समर्थन और अपनेपन की भावना प्रदान करती हैं।

जब पैसे की बात आती है, तो इसे सरल रखना चाहिए। इस्लाम संयम सिखाता है, एक साधारण शादी, एक कृतज्ञ हृदय, और "अधिक" के पीछे भागने से मुक्त जीवन घरों में बरकत (आशीर्वाद) लाता है। दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, उस चीज़ पर ध्यान केंद्रित करें जो वास्तव में मायने रखती है।

इसके अतिरिक्त परिवारों की भावनात्मक और मानसिक भलाई का पोषण किया जाना चाहिए। तनाव और चिंता वास्तविक हैं, लेकिन इस्लाम हमें याद दिलाता है, "वास्तव में, अल्लाह के ज़िक्र में दिलों को सुकून मिलता है।" (कुरान 13:28) धैर्य रखें, एक-दूसरे का साथ दें और सच्चे दिल से दुआ के साथ अपने रब की ओर पलटें। 

एक सार्थक दृष्टिकोण

आदर्श इस्लामी परिवार कोई दूर की कौड़ी नहीं है बल्कि यह हमारी पहुँच में है। जब हम अपने घरों को विश्वास, प्रेम और ज़िम्मेदारी में गूंध देते हैं, तो वे एक सुरक्षित आश्रय बन जाते हैं जहाँ हर कोई फलता-फूलता है। ये परिवार न केवल आधुनिक चुनौतियों का सामना करते हैं; बल्कि वे दया और शक्ति के उदाहरण के रूप में चमकते हैं और पूरे समाज को मज़बूत करते हैं।

ऐसे घरों की कल्पना करें जहाँ प्रेम सहज रूप से बहता हो, जहाँ विश्वास मार्ग को रोशन करता हो, और जहाँ हर सदस्य स्वयं को मूल्यवान महसूस करता हो। यह एक घर से कहीं बढ़कर है—यह शांति का एक बगीचा है, विश्वास का एक किला है, और एक विरासत है जो पीढ़ियों तक इस्लाम को आगे बढ़ाती है। आइए, एक-एक करके दयालुता के कार्य करते हुए, ऐसे घर बनाएँ और अपने समाज को फलते-फूलते देखें।

सायमा नईम चौधरी

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