लिव इन रिलेशनशिप
परिवार की महत्वत्ता और कर्तव्य प्राचीन काल से ही समाज की प्राथमिकता में शामिल रहे हैं और उसे समाज की महत्वपूर्ण संस्था समझा जाता रहा है। इसी आधार पर विश्व की सभी संस्कृतियों, देशों और विभिन्न भागों में मानव पारिवारिक व्यवस्था के अंतर्गत ही जीवन यापन करता रहा है, लेकिन वर्तमान युग में विभिन्न कारणों से इस संस्था पर खतरा मंडरा रहा है। इन दिनों मानवता जिन गंभीर समस्याओं से घिरी हुई है उनमें से एक है परिवार की तबाही एवं बर्बादी। बेलगाम आज़ादी, स्वार्थपूर्ण जीवन, वासना एवं लालच, भौतिकवाद के बढ़ते प्रभाव और धन एवं संपत्ति की लालच ने इस पवित्र संस्था को पराजित कर दिया है। परिवार के कर्तव्यों से भागने के मार्ग ढूंढे जा रहे हैं, यहां तक कि अब उसकी आवश्यकता से भी इंकार किया जाने लगा है। इस प्रचलन को सुधारात्मक शब्द में Live in Relationship या Cohabitation कहा गया है। इस का आशय है कि पुरुष और महिला का एक साथ रहते हुए जीवन व्यतीत करना। इसका तात्पर्य विवाह के बिना रह रहे जोड़ों से लिया जाता है जो विवाह के बिना एक साथ रहने लगें। उनका यह साथ स्थायी या चंद दिनों का भी हो सकता है और उसमें स्थिरता की भी संभावना विद्यमान होती है ताकि वे लंबे समय तक एक साथ रहें। इस समय में उनके बीच यौन संबध भी स्थापित रहता है जिसके परिणामस्वरुप कभी कभी बच्चे भी हो जाते हैं, लेकिन पति पत्नी की तरह रहने के बावजूद उनके बीच विवाह का कोई अनुबंध नहीं होता, जिसके आधार पर उनमें से हर एक को यह स्वतंत्रता रहती है कि जब भी उसकी इच्छा हो अलग हो सकते हैं। विवाह ना होने के कारण वह अपने साथी से संबधित हर प्रकार के कर्तव्यों से पूर्ण रुप से स्वतंत्र होता है और उस पर कोई कानूनी बंदिश भी नहीं होती। वैश्विक स्थितिः- आधी सदी पूर्व तक विश्व के अधिकांश भागों में विवाह के बिना यौन संबध को अनुचित समझा जाता था और अधिकतर देशों के संविधान एवं कानून में उसे अवैध करार दिया गया था, लेकिन उसके बाद स्थिति बहुत तेज़ी से परिवर्तित होने लगी और परिवार के बंधन से मुक्त होकर जीवन यापन करने का प्रचलन तेज़ी से बढ़ने लगा जिसमें निरंतर बढ़ोतरी होती जा रही है। यहां तक कि अब इसने भयानक एवं विकट रुप धारण कर लिया है। इसका अंदाज़ा इससे संबधित विभिन्न देशों की जारी होने वाली जनगणना से लगाया जा सकता है। अमेरिका में 1960 से पूर्व लगभग चार लाख पचास हज़ार जोड़े बिना विवाह के साथ में रहते थे। 2000 तक ऐसे लोगों की संख्या में दस प्रतिशत बढ़ोत्तरी हुई, यहां तक कि 2011 में उनकी संख्या साढ़े सात मिलियन तक पहुंच गई। 2009 में U.S. Census Bureau ने American Community Survey करवाया था जिससे ज्ञात हुआ कि तीस से चव्वालीस साल के बीच की आयु के पुरुष एवं महिलाएं, जो विवाह के बिना एक साथ रहते हैं उनका अनुपात 1999 में चार प्रतिशत था जो अब सात प्रतिशत हो गया। महिलाओं का अलग से सर्वे किया गया जिससे ज्ञात हुआ कि 19 से 44 वर्ष के बीच की महिलाएं जो बिना किसी पुरुष के अकेले रहती हैं उनका अनुपात 1987 में 33 प्रतिशत था, जो अब बढ़कर 58 प्रतिशत हो गया। ब्रिटेन के Office for National Statistics के अनुसार वहां 2012 में बिना विवाह के एक साथ रहने वाले लोगों की संख्या 9.5 मिलियन थी, जो 1996 की संख्या की दोगुनी थी। यही स्थिति यूरोपीय देशों की भी है। 2011 में यूरोपीय यूनियन के 27 देशों में जन्म लेने वाले बच्चों में 39.5 प्रतिशत बच्चे ऐसे थे जिनका जन्म बिना विवाह के यौन संबध बनाने के परिणामस्वरु हुआ। यह रोग पश्चिमी देशों के साथ अब पूर्वी देशों में भी तेज़ी से फैल रहा है। जापान की संस्था National Institute of Population and Social Security Research के अनुसार पच्चीस (25) से उन्नतीस (29) वर्ष के मध्य की महिलाओं की लगभग 3 प्रतिशत संख्या इस समय जापान में बिना शादी के पुरुषों के साथ रह रही है और 20 प्रतिशत महिलाएं ऐसी हैं जिन्होंने अपने जीवन में कभी ना कभी बिना विवाह के यौन संबध स्थापित करने का अनुभव प्राप्त किया। फिलपाईन में 2004 में बीस (20) से चौबीस (24) वर्ष के बीच की आयु के लगभग ढाई मिलियन लोग बिना विवाह के एक साथ रह रहे थे। Live in Relationship चुनने वाले युगल का अनुपात ऑस्ट्रेलिया में 2005 में वहां की जनसंख्या का 22 प्रतिश और न्यूज़ीलैंड में 2001 में वहां की कुल जनसंख्या का 18 प्रतिशत था। यह केवल कुछ देशों की जनगणना है दूसरे देशों की स्थिति इससे कुछ अधिक भिन्न नहीं है। भारत की स्थिति भारत में प्राचीन समय से एक धार्मिक और व्यवहारिक परंपरा का आदर करने वाला देश रहा है। यहां विभिन्न धर्म, जनता, कबीले और समूहों से संबध रखने वाले लोग रहते हैं। यह सब पारिवारिक व्यवस्था के पक्ष में रहे हैं। उनके निकट विवाह की मान्यता को आदर से देखा जाता रहा है और उसके बिना यौन संबध को कड़े रुप में अनुचित एवं घिनौना कार्य समझा जाता रहा है। लेकिन वासना, अश्लीलता और आवारगी में निरंतर होती बढ़ोत्तरी के कारण से अब यहां भी Live in Relationship को स्वीकार किया जाने लगा है। ना केवल यह कि उसकी प्रसार में कमी आयी हो बल्कि उसको कानूनी मान्यता देने की भी बात की जाने लगी है। भारत में कितने जोड़े बिना विवाह के साथ रहते हैं? उसकी जनगणना या कोई आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन विभिन्न रिपोर्टों से ज्ञात होता है कि यह प्रचलन बड़ी तेज़ी से फल फूल रहा है और विशेष रुप से मेट्रो सिटी में रहने वाले युवा लड़के लड़कियां इसकी तरफ आकर्षित हो रहे हैं। भारत की संसद का रुझान भी उसकी चुप्पी से इस ओर ही है और यहां कि अदालतें इसे कानूनी मान्यता देने के लिए संघर्षरत्त हैं। महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षित रखने के लिए 2005 में एक कानून पारित किया गया, जिसे Protection of Women from Domestic Violence Act का नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत में उन महिलाओं को भी शामिल किया गया है जो बिना विवाह के पुरुषों के साथ रहती हैं। उनके आपसी यौन संबध को Relationship in the Nature of Marriage (विवाह के समान संबध) करार दिया गया है। इस कानून में ऐसी महिलाओं को, उन पर घरेलू हिंसा होने की स्थिति में, या आर्थिक एवं दूसरी सुविधाओं की ज़मानत दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 23 मार्च 2010 में S.Khushboo Kannianmmal के केस में यह दलील दी कि बालिग पुरुष और महिलाएं विवाह के बिना भी एक साथ रह सकते हैं, इसमें कोई हर्ज नहीं है। योग्य जजों ने साथ ही अपने अनुभव साझा करना भी आवश्यक समझाः “When two adult People want to live together, what is offence? Does it amount an offence? Living together is not an offence. It can not be an offence ” “यदि दो युवा (महिला एवं पुरुष) एक साथ रहना चाहते हैं तो इसमें अपराध क्या है? यह मामला अपराध तक कहां पहुंचता है? एक साथ रहना कोई अपराध नहीं है। यह अपराध हो भी नहीं सकता।” 13 अगस्त 2010 को Madan Mohan singh vs Rajni Kant केस में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने यह सलाह दी कि कोई महिला या पुरुष यदि लंबे समय तक बिना विवाह के दांपत्य जीवन जी रहा है तो उनके संबध को विवाह पर आधारित संबधों में शामिल माना जा सकता है। एक दूसरे केस (Bharata Matha vs R.Vijaya) में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने यह फैसला दिया कि Live in Relationship के परिणाम में यदि कोई संतान होती है तो उसें अपने माता पिता दोनों की ओर से विरासत के अधिकार प्राप्त होंगे। सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने 21 अक्टूबर 2010 को D. Velusamy vs D Patchaiammal के केस में राय दी कि Domestic Violence Act 2005 के अंतर्गत निम्नलिखित शर्तें पूरी करने पर दो लोगों के Live in Relationship को विवाह का दर्जा दिया जा सकता हैः- वे दोनों समाज की दृष्टि में पति पत्नी के समान रहते हों। वह इस आयु को पहुंच गए हों जो संवैधानिक रुप से विवाह के लिए आवश्यक करार दी गई हो। बिना विवाह के साथ रहते हुए वे इस योग्य हों कि उनके बीच कानूनी रुप से विवाह हो सकता हो। वह सहमति से एक साथ रहते हों और वे एक लंबे समय से संयुक्त रुप से साथ रह रहे हों। इस विवरण से हिंदुस्तानी अदालत के रुझान का भलि भांति अनुमान लगाया जा सकता है कि वह किस प्रकार Live in Relationship को विवाह जैसी कानूनी हैसियत देने के लिए बेचैन है। कारण और उसे समझाने वालों के उदाहरण परिवार के बंधन से मुक्ति प्राप्त करने और बिना विवाह के स्वतंत्र रुप से रहने के विभिन्न कारण बयान किए जाते हैं। इसी प्रकार जो लोग इस प्रचलन का समर्थन करते हैं और उसे कानूनी दर्जा देने के लिए संघर्ष करते हैं वह इसके विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। नीचे उनका उल्लेख किया जाता हैः- जिस पुरुष और महिला का आपस में विवाह होता है, उनके मध्य सामान्यतः पहले से कोई परिचय नहीं होता और यदि होता है तो अति साधारण। वे एक दूसरे की आदत, व्यवहार, रहन-सहन के अंदाज से भलि भांति परिचित नहीं होते। बिना विवाह के साथ रहने का उद्देश्य एक दूसरे से विस्तृत रुप से परिचित होना और यह जानकारी प्राप्त करना है कि क्या वह भविष्य में एक साथ जीवन बसर कर सकते हैं? अधिकांश सर्वे के आंकड़ों से ज्ञात होता है कि बिना विवाह के एक साथ रहने वाले लोगों में से तीन चौथाई से अधिक यही कहते हैं कि विवाह से पूर्व साथ रहना विवाह का ही संकेत है। विवाह के बंधन में बंध कर यदि कोई पुरुष एवं महिला एक साथ जीवन यापन करेंगे तो कुछ समय बाद टकराव की स्थिति में अलगाव होने में कानूनी अड़चनें और पारंपरिक रुकावटें पेश आएंगी। इसलिए यह उचित है कि बिना विवाह के वे एक साथ रहें और जब उनका मन भर जाए, एक दूसरे से अलग हो जाएं और अपने अपने मार्ग पर चल पड़ें। कुछ लोगों की आय सीमित होती है या वे अपनी आर्थिक स्थिति के संबध में संतुष्ट नहीं रहते हैं। वे विवाह में देरी करते हैं या कभी कभी इसी चक्कर में विवाह नहीं करते। इसलिए कि वे विवाह में होने वाले खर्च सहन करने योग्य नहीं होते, या उन्हें यह भय कहता है कि यदि विवाह के पश्चात रिश्ता निभा नहीं सकते और तलाक की नौबत आयी तो वह आर्थिक संकट के शिकार हो जाएंगे। यह लोग इसी में भलाई समझते हैं कि विवाह के बिना ही विपरित लिंग के व्यक्ति के साथ कुछ समय व्यतीत कर लिया जाए। कुछ युवक एवं युवतियां उच्च शिक्षा की प्राप्ति के लिए या नौकरी के लिए घर से दूर कहीं और अस्थायी रुप से शिफ्ट होते हैं एवं विभिन्न कारणों से उनके लिए विवाह करना संभव नहीं होता। इसलिए वे विवाह के बिना साथ रहने लगते है। कोई व्यक्ति विवाहित हो और वह किसी कारण से दूसरा विवाह करना चाहता हो, लेकिन कानूनी रुप से पहली पत्नी के रहते हुए दूसरा विवाह की अनुमति कानून नहीं देता हो तो वह बिना विवाह के दूसरी पत्नी के साथ रहने लगता है। कुछ पुरुष एवं महिलाएं विवाह को रुढ़िवादी परंपरा समझते हैं और स्वयं को इसका हिस्सा नहीं बनाना चाहते। वह इसी चीज़ को समझदारी समझते हैं कि विवाह के बंधन में बंधे बिना जिसके साथ चाहें कुछ समय व्यतीत कर लें और जब उससे ऊब जाएं तो उसे छोड़कर दूसरे से रिश्ता जोड़ लें। पारिवारिक व्यवस्था – व्यवहारिक मांग वास्तविकता यह है कि मानवीय व्यवहार पारिवारिक व्यवस्था के अंतर्गत ही जीवन यापन करने की मांग करता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से आज तक सभी मानव समाज में विवाह का प्रावधान रहा एवं पारिवारिक व्यवस्था बरकार रही और वर्तमान समय के विलासितापूर्ण एवं भौतिकवादी युग के वर्चस्व से पूर्व किसी ने इसका इंकार नहीं किया है और पारिवारिक व्यवस्था को कमज़ोर करने का प्रयास नहीं किया। मानव पीढ़ी के अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है कि महिला एवं पुरुष का संबध सुशील एवं शिष्ट नींव पर स्थापित हो। दोनों केवल वासना की पूर्ति और संतुष्टि के लिए एक दूसरे के साथ ना रहे या इसके बाद अलग हो जाने के कर्तव्य से स्वतंत्र ना हों बल्कि उनके बीच ऐसा स्थायी संबध हो जो समाज में शुभ हो और उसकी सुरक्षा की गारण्टी भी दी गई हो। इसलिए कि उनसे जो संतान होगी वह अपने जीवन, लालन-पालन और संस्कार के लिए अधिक ध्यान, निरीक्षण एवं संरक्षण चाहती है। इस कार्य में यदि पुरुष साथ ना दे तो अकेले महिला उसे सही तरीके से नहीं संभाल सकती। इसी उद्देश्य के लिए प्रकृति ने महिला एवं पुरुष के मध्य एक आकर्षण बरकार रखा है। इसीलिए वे दोनों आपस में मिलते हैं, फिर जब संतान होती है तो दोनों के दिलों में उसका अथाह प्रेम डाल दिया जाता है। दोनों मिलकर उसका पालन पोषण करते हैं, उसकी मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं और उसे जीवन के संघर्ष के योग्य बनाते हैं। बिना विवाह के संबध बनाने में इन प्राकृतिक मांगों को रौंद दिया जाता है, इसलिए कि उस केवल वासना की पूर्ति होती है, मानवीय पीढ़ी का अस्तित्व सामने नहीं होता और यदि संयोग से गर्भ ठहर जाए और बच्चे का जन्म हो जाए तो महिला एवं पुरुष उसका संरक्षण स्वीकार करने और उसके पालन पोषण का कर्तव्य स्वीकार करने को तैयार नहीं होते। सभ्यता का विकास पारिवारिक व्यवस्था पर आधारित है पारिवारिक व्यवस्था इसलिए भी आवश्यक है कि उसके बिना सभ्यता का विकास अंसभव है। सभ्यता का अस्तित्व ही उस समय होता है जब एक पुरुष और महिला मिलकर घर बनाते और परिवार का निर्माण करते हैं। संतान होती है और परिवार में बढ़ोत्तरी होती है तो इसके क्षेत्र में माता पिता और दूसरे रिश्तेदार आ जाते हैं। बहुत से परिवार अस्तित्व में आते हैं और उनके बीच संपर्क स्थापित हो जाते हैं। इस प्रकार सामूहिक जीवन आरंभ होता है और सभ्यता विकसित होती है। लेकिन महिला एवं पुरुष पर स्वार्थ एवं निजता हावी हो और वे स्वयं को केवल अपनी वासना की तृप्ति तक ही सीमित रखें और परिवार के निर्माण में कोई दिलचस्पी ना लें तो सामूहिक जीवन की जड़ कट जाती है और वह नींव ही बाकी नहीं रहती जिस पर सभ्यता का भवन स्थापित हो सके। परिवार इंसान को हैवान से अलग बनाता है परिवार मानवीय जीवन की विशेषता है। वह व्यक्ति को हैवानियत से अलग करता है। हैवानियत में भी यौन इच्छा होती है, जिनके कारण उनके नर मादा मिलते हैं। उसके परिणामस्वरुप बच्चे पैदा होते हैं और उनकी पीढ़ियां चलती है। लेकिन हैवानियत में वासना की तृप्ति के बाद उनके नर मादा और बच्चे से कोई संबध बाकी नहीं रहता, यदि रहता है तो बहुत कमज़ोर सा। मादा अपनी नई पीढ़ी का पालन पोषण करती है, वह भी केवल उस हद तक कि वे जीवित रह सके। उसके पश्चात वह एक दूसरे के लिए अजनबी बन जाते हैं। उसके विपरित इंसानों के आपसी संबध में सुरक्षा एवं उत्तमता पायी जाती है। पुरुष एवं महिला उद्देश्यपूर्ण रुप से यौन संबध स्थापित करते हैं। उनसे जो संतान होती है दोनों मिलकर लंबे समय तक उसका पालन पोषण करते हैं। उनके बीच प्रेम, सहानुभूति, दया अंतिम समय तक स्थापित रहती है। वह एक दूसरे के अधिकारों का सम्मान, संरक्षण एवं कर्तव्यों का आदर करते हैं। मानव में जो लोग अपने संबध को केवल वासना की पूर्ति तक सीमित रखते हैं और परिवार के निर्माण एवं अपनी आने वाली नस्लों के पालन पोषण से कोई दिलचस्पी नहीं रखते वह वास्तव में स्वयं को मानव के उच्चत्तम स्तर से हैवानियत के निम्न स्तर में स्वयं गिरा लेते हैं। ----शेष अगले महीने
रज़िउल इस्लाम नदवी
रिसर्च स्कॉलर व लेखक