"कोहरे के बीच जिंदगी की तलाश! कितना मुश्किल"
अमूमन दिसंबर जनवरी के महीनों में भारत के अधिकांश क्षेत्रों में ठंड और कोहरे का व्यापक प्रभाव रहता है। कोल्ड-डे और कोहरे के प्रकोप से विजिबिलिटी में गिरावट समय के साथ दौड़ती भागती जिंदगियों को थोड़ा ब्रेक लगातीं हुई प्रतीत होती है लेकिन इंसानी जिंदगी की खासियत यह होती है कि थोड़ा सा तालमेल बिठाकर निराशाजनक स्थितियों के बीच भी आशाओं का अलाव जलाकर रफ़्तार तथा रचनात्मकता को इस विश्वास के साथ ढूंढ लेता है कि दुनिया में कुछ भी स्थाई नहीं है बल्कि मौसम का मिज़ाज हो या कठिनाइयों का दौर सबकुछ परिवर्तित होने वाले हैं और एक सुनहरा सवेरा बेहद करीब हैं जो माहौल को गर्म करते हुए दोबारा जिंदगी को रफ्तार देंगा।
भारत के हर इलाकों में ठंड के प्रकोप से बचने के लिए अलाव का जलाना एक आम चलन है और आग के चारों ओर लोगों का जुटाव ऐसा महसूस कराता है कि सर्द मौसम ने जिंदगियों को बेहद क़रीब ला दिया और फिर अपने अनुभवों का आदान-प्रदान, भूली-बिसरी यादें, कहानी-किस्से और बीते हुए घटनाओं को उचित मापदंडों पर परखने का साझा प्रयास बहुत ही सहजता से मानवीय संवेदनाओं को क्रियाशील बना देता है जो निर्मित होने वाले डार्क ऐज को कोसों दूर फेंकतीं हुए सह-अस्तित्व की भावनाओं को प्रज्ज्वलित करतीं हैं।
यदि परिस्थिति के विपरीत हम अपना नजरिया बदल लें तो प्रतिकूल मौसम की तीक्ष्णता में कमी का अनुभव होने के साथ राहत मुहैया कराने वाला बन सकता है। अब सोचिए कि अगर ठंड और कोहरा नहीं पड़ेगा तो क्या रबी फसलों का उत्पादन हो पाएगा? बहुत ही मुश्किल है और थोड़ा सा हुआ भी तो यह करोड़ों लोगों की भूख को शांत करने में अपर्याप्त होगा और अकाल की नौबत आ पड़ेगी।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारतीय मौसम में विविधता बड़े पैमाने पर लोगों को आजीविका मुहैया कराने के साथ अर्थव्यवस्था को संभालें हुए है लेकिन फिर भी ठंड और कोहरे की स्थिति किसी बड़ी चुनौती से हरगिज़ कम नहीं।
कभी मुंशी प्रेमचंद की लिखी कहानी "पूस की रात" को पूरी दिलचस्पी के साथ पढ़िए और हालातों के साथ जंग करतीं हुईं एक जिंदगी को बहुत करीब से देखते हुए इस बात को समझने का प्रयास करिए की गरीबी कैसे किसी विभिषिका या प्रकोप को कई गुना बढ़ा देती है।
वास्तविकता यही है कि गरीबी और गर्माहट के बीच एक बेहद जटिल तथा विरोधाभासी रिश्ता है क्योंकि यथार्थ में सर्द मौसम गुजरने के बाद भी एक ग़रीब की ठंडक जातीं नहीं है बल्कि वो हमेशा हालातों के आगे कांपते रहता है। यदि बीते 100 सालों के दौरान भौतिक और तकनीकी तरक्की का जायजा लिया जाए तो इसमें बड़ी छलांग प्रतीत होती है लेकिन इस मानव उत्कृष्टता का विभाजन समान रूप से सभी इंसानों के बीच हो सका और सभी को इसका लाभ मिल सका?
सच्चाई यही है कि मानव का बहुसंख्यक हिस्सा तकनीकी क्रांति के ज़रिए उपलब्ध संसाधनों के दोहन से हासिल होने वाले फ़ायदे से वंचित रह गया और पूंजीपतियों ने साइंस आधारित तकनीकी तरक्की को एक धन चुंबक की तरह उपयोग में लाते हुए अपनी तिजोरियों में खजानों का ढेर लगा दिया। पूंजीपतियों ने अपने निजी स्वार्थों को हासिल करने के लिए प्रकृति से बेझिझक खिलवाड़ करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी जिसकी वज़ह से उत्पन्न हानिकारक गैसों तथा प्रदूषण जनित कोहरे के गंभीर प्रभाव से मध्यमवर्गीय और गरीबों का फेफड़ा छलनी हो रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक स्तर पर प्रदूषण को नियंत्रित करने की गरज से हर साल आयोजित होने वाला कॉप सम्मेलन खुलेतौर पर अमीरों और विकसित देशों की पैरोकारी के लिए बदनाम हो चुका है।
अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलनों में पीएम मोदी सरकार के नुमाइंदे प्राकृतिक संरक्षण के प्रति अपनी जवाबदेही तथा प्रतिबद्धता जताते आएं हैं लेकिन पिछले कई सालों से दिल्ली में बनी हुई प्रदूषण की बेकाबू स्थिति को एड्रेस करने के बजाय पीएम मोदी सरकार ने अरावली पहाड़ी की नई परिभाषा तय करके दिल्ली में प्रदूषण के खतरनाक स्तर को विमर्श से ही गायब कर दिया।
पर्यावरणविदों का यहीं मानना है कि यदि अरावली पहाड़ियों पर खनन या कोई निर्माण कार्य होता है तो स्थानीय इकोसिस्टम व्यापक रूप से प्रभावित होगा और पैदा होने वाला असंतुलन गरीबों पर मौसमी प्रकोपों में बढ़ोत्तरी लाएगा।
यह स्पष्ट है कि पीएम मोदी सरकार का दस सालों से भी ज्यादा का समय का कार्यकाल आर्थिक समस्याओं का हल पेश करने में बुरी तरह से असफल साबित हुआ और बड़ी आबादी के सामने रोज़गार तथा आमदनी की मुश्किलें बढ़ीं है।
विश्व असमानता रिपोर्ट 2026, जो दिसंबर 2025 में सार्वजनिक की गई वह यह दर्शाती है कि भारत में आय असमानता बहुत ज़्यादा है, जहां शीर्ष स्तरीय 10 फीसदी लोगों के पास देश की 58 फीसदी आय है, वहीं निचले 50 फीसदी के पास केवल 15 फीसदी आय है, जबकि शीर्ष स्तर के 1 फीसदी के कब्जे में 40 फीसदी से अधिक की संपत्ति है, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी संपत्तियों के विभाजन का उच्च स्तर है।
अमीरी-गरीबी के बीच बर्फीली रेखा कब पिघलेगी? इसकी कोई समय सीमा निश्चित नहीं है लेकिन जब सरकार ही स्वयं संरक्षणवादी सिद्धांतों के तहत् चंद पूंजीपतियों की पैरोकार बनी हुई है और सार्वजनिक पूंजी को पूंजीपतियों के लाखों करोड़ के कर्जों को राइट ऑफ करने में लुटा रहीं हैं तो गैर-बराबरी कम होने का ख्याल ही बेमानी हो जाता है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भी भारत की बड़ी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में गुजर-बसर करतीं हैं और केंद्र सरकार की आर्थिक योजनाओं से बड़ी उम्मीदें रखतीं हैं लेकिन पीएम मोदी सरकार ने मनरेगा का नाम बदलकर एक महत्वपूर्ण आर्थिक योजना की दुर्दशा को नये कलेवर में लपेट दिया, जो कुछ हद तक नाम की बुनियाद पर देश के बहुसंख्यकों को भावनात्मक तौर पर खुश करें लेकिन इससे आर्थिक विक्रालता का पटाक्षेप होना मुश्किल है बल्कि ग्रामीणों की दरिद्रता बढ़ेगी।
बदलाव के खिलाफ नाराजगी जताते हुए सोनिया गांधी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि,"मनरेगा योजना का ढहना हमारी सामूहिक विफलता है", इस बयान को आर्थिक मामलों के जानकारों ने वास्तविक मानते हुए कहा कि ग्रामीणों की आमदनी में रोज़गार की गारंटी वाली मनरेगा योजना का योगदान बेहद महत्वपूर्ण था, जिससे सबसे ज्यादा ग्रामीण महिलाएं लाभान्वित हो रहीं थीं लेकिन बदले हुए प्रावधान अनिश्चितताओं को बढ़ावा देंगे और रोज़गार गारंटी का प्रावधान बहुत हद तक अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।
योजना के नये प्रावधान यही साबित करते हैं कि "वीबी-जीरामजी" योजना पूरी तरह से केन्द्र सरकार की मनमर्जी के मुताबिक संचालित होंगी यानी यथार्थ में योजना का नया स्वरूप अप्रत्यक्ष तौर पर लोकतंत्र के राजशाही तंत्र में परिवर्तित होने का सूचक जैसा ही होगा और ग़रीब अधिकार विहिन दिखेंगें, कहीं पर कोई नियम-कानून नहीं बल्कि सबकुछ राजा ही तय करेगा।
जिस तरीके से पीएम मोदी शासनकाल में गड़े हुए मुद्दे को उखाड़कर तथ्यों की अनदेखी करते हुए मनमाने तरीके से दोबारा इतिहास लिखने का प्रयास हुआ उसे प्रत्यक्ष तौर पर माहौल सुलगा कर सियासत को साधनें की कोशिश मानी गई लेकिन वास्तविकता यही है कि पीएम मोदी सरकार का सियासी अंदाज देश को पुनः हिमयुग की ओर ले जाता हुआ प्रतिबिंबित होता है, जो समाज को खांचों में बांटकर एकाधिकार तथा वर्चस्व को निर्धारित करेगा।
सर्द और ठिठुरन के बीच अब एक अमीरी देखिए कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दुस्साहस तथा अमानवीय हरकतों के जवाब में पीड़िता ने उस सरकारी नौकरी को ठोकर मार दी जिसके लिए युवाओं की बड़ी संख्या किसी भी हद से गुजरने के लिए तैयार है। हक़ीक़त में यह खौलती हुई जिंदगी का जिंदा सुबूत हैं जो इतिहास गढ़ते हुए सीमाओं को तय करतीं हैं।
वास्तविकता में किसी छात्रा के लिए किसी मुख्यमंत्री के खिलाफ जवाबी कार्रवाई तक की शक्ति जुटा लेना,यह अपने आप में बेहद असाधारण और अभूतपूर्व स्थिति है जो सफलतापूर्वक यह बड़ा संदेश प्रेषित करतीं हैं कि निश्चित रूप से रोजगार के कई विकल्प रहते हैं लेकिन आत्मसम्मान का कोई अल्टरनेट नहीं होता है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मौलिकता या सैद्धांतिक रुख़ का पूरा दारोमदार इस बात में टिका रहता है कि न्याय और अन्याय के बीच अंतर है या नहीं लेकिन इन स्थितियों को ध्यानपूर्वक देखिए की अधिकारों का आवाज़ बुलंद करने वाले उमर खालिद और कुछ अन्य लोगों पर यूएपीए कानून के तहत् मुकदमा दर्ज किया गया लेकिन पांच सालों बाद भी सुनवाई में देरी के बावजूद भी ज़मानत नहीं मिल पाई।
लेकिन दूसरी ओर गंभीर बलात्कार अपराध में दोषी ठहराए जाने के आधार पर उम्रकैद की सजा मिलने के बावजूद भी उत्तरप्रदेश हाईकोर्ट ने पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सज़ा को निलंबित कर दिया। यह ऐसा आदेश है जो पीड़िता की जिंदगी को सदमे से उबरने नहीं देगा।
यदि यह मान भी लिया जाए कि "जेल एक अपवाद है और जमानत नियम" भारतीय न्याय प्रणाली का एक मौलिक सिद्धांत है जिसके तहत् कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलंबित की गई और यह नियम और सिद्धांत यूएपीए जैसे विशेष कानूनों और पीएमएलए मामलों पर भी लागू होता है लेकिन इस प्रावधान के तहत सालों बाद भी उमर खालिद और इसी तरह के मामले से जुड़े अन्य लोगों को ज़मानत नहीं मिल सकी। वास्तविकता यही है कि न्याय तंत्र का यह विरोधाभासी रूझान लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ स्थिति है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि मौसमी ठंड और कोहरे का प्रकोप कुछ सप्ताह बाद समाप्त हो जाएगा लेकिन इसके बावजूद भी साझा दूरदर्शिता पर सवाल क़ायम रहेगा कि हम कितनी दूर तक देख पा रहे हैं और मानवीय मूल्यों को सहेजने में हम कितने कामयाब तथा कितने तैयार है।
मोहम्मद जुनैद अली
मध्यप्रदेश