संशोधित वक़्फ़ कानून पर एक शानदार किताब
आज देश एक नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है, जब अल्पसंख्यकों के अधिकार, धार्मिक स्वायत्तता और विधायी हस्तक्षेप चर्चा और वाद-विवाद का विषय बने हुए हैं। डॉ. सैयद नासिर हसन की नई पुस्तक मुस्लिम वक़्फ़ और वक़्फ़ संशोधन अधिनियम-2025 अपने आप में एक आवश्यक एवं समयोचित गाइड है। हिन्दी में प्रकाशित यह 120 पृष्ठों की छोटी सी किताब—जिसका मूल्य मात्र ₹100 रखा गया है—ं केवल नवीनतम संशोधनों की समीक्षा करती है, बल्कि भारतवर्ष में वक़्फ़ संस्था की धार्मिक, ऐतिहासिक तथा क़ानूनी बुनियादों का एक सुव्यवस्थित, संक्षिप्त और सरल परिचय भी प्रस्तुत करती है।
सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र से सम्बद्ध होते हुए भी इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय संवैधानिक क़ानून की अच्छी समझ रखने वाले डॉ. सैयद नासिर हसन ने इस पुस्तक को सरल, परन्तु सशक्त शैली में लिखा है। हिन्दी को माध्यम बनाकर उन्होंने विषय को भाषाई संकीर्णता से मुक्त किया है, वरना अब तक यह विषय प्रायः अंग्रेज़ी और उर्दू के अकादमिक दायरे तक सीमित रहा है। यह पुस्तक आम नागरिक से लेकर सामाजिक कार्यकर्ताओं, अध्येताओं और नीति-विशेषज्ञों, सभी के लिये 2025 में वक़्फ़ क़ानून में किए गए संशोधनों, उनकी नयी संरचना तथा संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 पर उनके प्रभावों को समझने का भरपूर अवसर प्रदान करती है।
ग्यारह अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक अपनी यात्रा धर्मग्रन्थों के हवाले से आरम्भ करती है और नया वक़्फ़ क़ानून बनने तक की सारी दास्तान संक्षेप में बयान करती है। आरम्भिक अध्याय वक़्फ़ की आध्यात्मिक हैसियत को उजागर करते हैं—उसका उद्गम क़ुरआनी आदेशों, नबी (सल्ल.) की शिक्षाओं, इस्लाम के प्रारम्भिक इतिहास तथा दिल्ली सल्तनत से मुग़ल शासन तक उसके विकासक्रम से अवगत कराते हैं। डॉ. हसन वक़्फ़ को मात्र एक धार्मिक न्यास न मानकर, एक ऐसी सभ्यतागत संस्था के रूप में प्रस्तुत करते हैं, जिसने शिक्षा, जन-सेवा और मुस्लिम समुदाय के अस्तित्व को शताब्दियों तक क़ायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
पुस्तक का मूल सार उसके विधिक विवेचन में निहित है। हसन उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भिक बंगाल विनियमों से लेकर स्वतंत्रता के बाद बने वक़्फ़ अधिनियमों तक के नियामक पड़ावों की संक्षिप्त समीक्षा प्रस्तुत करते हैं, और फिर 2025 के संशोधनों की ओर उन्मुख होते हैं। उनके अनुसार, व्यापक कटौतियों और नये पर्यवेक्षण-तंत्र ने वक़्फ़ को उसके पारम्परिक ‘चिरस्थायी न्यास’ के स्वरूप से हटा कर, एक ऐसी संस्था में रूपान्तरित कर दिया है जो अब अधिक राज्य-नियन्त्रण में जकड़ी और असुरक्षित हो गई है। लेखक स्पष्ट चेतावनी देते हैं कि यह परिवर्तन उन संवैधानिक गारण्टियों पर प्रत्यक्ष आघात है, जिनके अन्तर्गत समुदायों को अपने धार्मिक संस्थानों का स्वयं प्रबंधन करने का अधिकार सुनिश्चित किया गया है।
हिन्दू तथा सिख धर्मन्यासों के उपबन्धों की तुलना पुस्तक को और गम्भीरता प्रदान करती है। लेखक बताते हैं कि इन संस्थाओं को जहाँ अधिक स्वायत्तता प्राप्त है, वहीं वक़्फ़ पर कठोर होते प्रावधान सुधार की आड़ में ‘एकरूपता’ और नियन्त्रण की प्रवृत्ति के विस्तार का संकेत देते हैं।
इस पुस्तक की महत्ता उसके सरल किन्तु गम्भीर भाषा-शिल्प, उसकी विद्वत्ता-संपन्न परन्तु सुगम शैली, और उसके व्यावहारिक दृष्टिकोण में निहित है। “हमें क्या करना चाहिए” अध्याय में लेखक ने दस्तावेज़ों के डिजिटलीकरण, क़ानूनी जागरूकता तथा नागरिक संगठनों के साथ सहयोग जैसे सुझाव देकर चिन्ता को कर्म में रूपान्तरित करने का प्रयास किया है। परिशिष्ट और संदर्भ सामग्री प्रवाह को बोझिल किए बिना पुस्तक को तथ्य-समृद्ध बनाते हैं।
यद्यपि कुछ ऐतिहासिक प्रसंगों का विवरण संक्षिप्त है, तथापि इससे ग्रन्थ की प्रभावकारिता पर कोई आंच नहीं आती। डॉ. हसन ने क़ानूनी उदाहरणों, ऐतिहासिक साक्ष्यों और सामाजिक यथार्थ के आधार पर, अपने तर्कों में संयम और प्रामाणिकता दोनों को बरक़रार रखा है। सारतः मुस्लिम वक़्फ़ और वक़्फ़ संशोधन अधिनियम-2025 एक अत्यन्त आवश्यक, विचारोत्तेजक और समयानुरूप योगदान है। यह पुस्तक न केवल वर्तमान बहस की संवेदनशीलता को समझने में सहायक है, बल्कि यह भी स्मरण कराती है कि सच्चा सुधार वही है, जो वक़्फ़ की नैतिक और आध्यात्मिक आधारशिला को दृढ़ करे, न कि कमज़ोर।
न्यायविदों, अध्येताओं, पत्रकारों तथा सामुदायिक नेतृत्व के लिये यह कृति इसलिए भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, कि आज संवैधानिक प्रावधानों की रक्षा के लिए अधिक सजगता, नयी संकल्पबद्धता, और निरन्तर विवेक की आवश्यकता है।
पुस्तक : मुस्लिम वक़्फ़ और वक़्फ़ संशोधन अधिनियम
लेखक : डॉ. सैयद नासिर हसन
प्रकाशक : एम.एम.आई. पब्लिशर्स, नई दिल्ली
समीक्षक : डॉ. मुहम्मद इक़बाल सिद्दीक़ी