सच्चे मन की बात
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साहित्य

सच्चे मन की बात

ज़मीर साहब ने जैसे ही ट्रेन के जनरल कंपार्टमेंट में कदम रखा, भीड़ देखकर उनका दिमाग चकरा गया। ठीक से खड़े होने तक की जगह नहीं थी। उलटे कदम लौटकर वह कंपार्टमेंट से बाहर निकल आए।

अगला कंपार्टमेंट स्लीपर क्लास का था। जनरल टिकट पर स्लीपर क्लास में सफर करना ज़मीर साहब को गवारा नहीं था। ट्रेन स्टार्ट होने वाली थी और सफर करना भी मजबूरी। इसलिए दोबारा हिम्मत करके जनरल कोच में वापिस दाखिल हुए और ट्रेन ने रेंगना शुरु कर दिया। ट्रेन स्पीड पकडने ही वाली थी कि किसी ने चेन खींच दी। एक सवारी प्लेटफॉर्म पर भागती हुई आती हुई दिखाई दी। एक सवारी बाहर निकलना चाह रही थी। शायद जिस सवारी को सफर करना था वह कंपार्टमेंट में चढ़ने से रह गयी थी और जो शख्स सवारी को छोड़ने आया था उतर नहीं पाया। सवारियों की अदला-बदली होने लगी।

थोड़ी देर ट्रेन रुकी रही, ज़मीर साहब के मन में आया कि उतर कर स्लीपर क्लास में चले जाएं, टी.सी. जो चार्ज मांगेगा दे देंगे। लेकिन फिर उनके ज़मीर ने गैर कानूनी काम करने से रोका और ढांढस बंधाया कि एक ही घंटे की तो बात है, जैसे तैसे सफर कट जाएगा। ज़मीर साहब का उसूल था कि अपने ज़मीर की बात हमेशा मानना चाहिए लिहाज़ा वह नहीं उतरे और कंपार्टमेंट में आगे बढ़कर बैठने लायक सीट की तलाश करने लगे।

थोड़ा आगे बढ़ने पर उन्होंने देखा कि एक सीट पर एक फैमिली बैठी है, जिसमें एक नकाबपोश महिला, एक दाढ़ी, टोपी, कुर्ता पायजामा में युवा आदमी और साथ में दो मासूम बच्चे। एक की उम्र तकरीबन नौ दस साल के बीच की मालूम दे रही थी और दूसरा लगभग छह से सात साल के बीच का। ज़मीर साहब को उम्मीद थी कि यह मुस्लिम फैमिली उन्हें बैठने से मना नहीं करेगी। उन्होंने मिन्नत भरे लहज़े में बड़े लड़के से कहा कि, “बेटा थोड़ा खिसक कर बूढ़े अंकल को बिठा लीजिए।”

लेकिन बच्चे का जवाब सुनकर वह हक्का बक्का रह गए। बच्चे ने जवाब दिया, “नहीं चच्चा आप ज़िंदगी में बहुत बैठ चुके हैं। अब बच्चों के बैठने का टाइम है।”

उसका मज़ाकिया जवाब सुनकर सभी हंसने लगे लेकिन ज़मीर साहब खिसिया गए, फिर नर्म लहज़े में बोले, “बेटा आपके घर में कोई बुज़ुर्ग नहीं है क्या?”

लड़का कुछ जवाब देता इससे पहले उसकी मां ने डांटते हुए कहा, “बड़ों से ऐसे थोड़ी बात करते हैं, आप इधर थोड़ा खिसक आइए और बाबा को बैठ जाने दीजिए।”

ज़मीर साहब को वह महिला भली मालूम पड़ी। उन्होंने कहा, “रहने दीजिए बच्चों को परेशानी होगी।”

वह लड़का फिर बोल पड़ा, “सफर में परेशानी तो होती है लेकिन आप बैठ जाइए। आप भी याद रखेंगे कि क्या दरिया दिल लड़के से आपका पाला पड़ा था।”

यह सुनकर लड़के के बाप ने नाराज़ होते हुए कहा, “बुज़ुर्गों से ज़बान लड़ाते हुए शर्म नहीं आती।”

फिर ज़मीर साहब से वह मुखातिब होकर बोले, “अब्बू आप बैठ जाइए। मैं ऊपर वाली बर्थ पर बैठ जाऊंगा। नींद आ रही है बैठे बैठे एक झपकी भी ले लूंगा।”

यह कहकर वह अपनी सीट से उठ गए और उस जगह पर ज़मीर साहब यह कहते हुए बैठ गए कि “एक घंटे का सफर है मैं अगले स्टेशन पर उतर जाऊंगा।”

ज़मीर साहब अभी बैठे ही थे कि छोटा वाला बच्चा रोने लगा। मां गोद में उसका सिर रखकर सुलाने की कोशिश करने लगी। ज़मीर साहब बच्चे को पुचकारते हुए बोले, “बेटे सो जाइए, नींद में मीठे मीठे ख़्वाब दिखेंगे। मिठाईयों के पेड़ नज़र आएंगे जिनपर जलेबियां लटकी हुई होंगी। समोसों, कचौड़ियों के पहाड़ जैसे ढेर होंगे। शहद और दूध की नदियां बह रही होंगी जिनके किनारे पर तरह तरह की टॉफियां कंकर पत्थर की तरह पड़ी होंगी।”

छोटा बच्चा उनकी बात सुनकर खुश हो गया और हंसने लगा लेकिन बड़ा बच्चा शरारत भरे लहजे में फिर बोला, “मुझे भी देना अकेले मत खा जाना।”

उसकी बात पर छोटा फिर रोने लगा तो उसकी मां चुप कराते हुए बोली, “आप सो जाओ, किसी को मत देना, सब आप ही खा जाना।” फिर बच्चा सोने की कोशिश करने लगा और थोड़ी ही देर में गहरी नींद में समा गया। बड़ा बच्चा कान में लीड लगाकर मोबाईल गेम खेलने लगा। आसपास बैठे लोग भी इधर उधर की बात करने लगे।

ज़मीर साहब सोचने लगे कि इन बच्चों के मां-बाप कितने मुहज़्ज़ब हैं। एक ने उन्हें बाबा कहा और दूसरे ने अब्बू। लेकिन बच्चे कितने बदतमीज़ हैं कि उलटे सीधे जवाब देते हैं।

वह यह सोच ही रहे थे कि तभी बच्चों की मां ने कहा, “बाबा जान आप बुरा मत मानिए बच्चे की बातों का। इसके दादा दादी ने लाड़ प्यार में इसे बिगाड़ दिया है। इसकी तरफ से मैं माफी मांगती हूं।”

ज़मीर साहब ने जवाब दिया, “कोई बात नहीं बेटा बच्चे तो शरारती होते ही हैं। हम लोग भी तो बचपन में शरारत करते थे।”

महिला ने आगे बताया, “छोटा बच्चा हम लोगों के पास रहता है और बड़ा दादा दादी के पास। वहां इसके चाचा के बच्चे बहुत शरारती हैं, उन्हीं लोगों के साथ ने और बिगाड़ दिया है।”

तभी छोटा बच्चा जाग गया और रोते हुए बोला, “अंकल झूठ बोलते हैं, ख़्वाब में मिठाईयां नहीं मिली।”

ज़मीर साहब ने हंसते हुए पूछा, “तो क्या मिला?” 

बच्चे ने जवाब दिया, “एक बहुत बड़ा कमरा था, उसमें चिप्स, टेढ़े मेड़े और नमकीन व बिस्कुट के पैकेट का ढेर लगा था।”

बच्चे की मासूम बातों को सुनकर ज़मीर साहब कहकहे लगाते हुए बोले, “आपने खाए नहीं?”

बच्चे ने फिर उसी मासूमियत से जवाब दिया, “नहीं अंकल, कमरे में बहुत सारे चूहे, कॉक्रोच और छिपकिलियां थी इसलिए नहीं खाया। मैं खा लेता तो वे भूखे रह जाते।”

उसका जवाब सुनकर आसपास बैठे सभी लोग हंसने लगे। तब ज़मीर साहब ने उसके बड़े भाई से कहा, “देखिए आपकी और आपके भाई की सोच में कितना फर्क है। उसे ख़्वाब में भी छोटे छोटे कीड़े मकोड़ों की भूख का एहसास था और आप एक बुज़ुर्ग इंसान के लिए थोड़ी सी परेशानी नहीं उठा पाते।”

बच्चे का दिमाग को हिला देने वाला जवाब सुनकर ज़मीर साहब बहुत प्रभावित हुए और उस किस्से को आज तक याद करते हैं। बच्चे ने जवाब दिया, “हमने जो भी सीखा है बुज़ुर्गों से ही सीखा है। पेट से सीखकर नहीं आए।”

- ज़हीर ललितपुरी

- कवि एवं साहित्यकार


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