क्या है पीएमएस? जागरुकता लाना बेहद ज़रुरी
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स्वास्थ्य

क्या है पीएमएस? जागरुकता लाना बेहद ज़रुरी

दुनिया की हर महिला को मासिक धर्म के मुश्किल दिनों से गुज़रना पड़ता है। यह प्रकृति का बनाया हुआ नियम है। हर महिला इसके अलग अलग प्रकार के दौर से गुज़रती है। आइए जानते हैं इसी से संबंधित पीएमएस के बारे में।

पीएमएस यानि प्रीमेंस्टुअल सिंड्रोम। यह मासिक धर्म से जुड़ी एक ऐसी स्थिति है जिसके बारे में हमारे समाज में आज तक जागरुकता नहीं आ सकी है। जिस कारण ढेर सारी महिलाओं को शारीरिक एवं मानसिक दर्द से गुज़रता पड़ता है। 

अकसर हम अपने आसपास देखते हैं कि अगर पीरियड्स के दौरान किसी महिला के स्वभाव में कोई बदलाव आ रहा है, उसे गुस्सा ज़्यादा आ रहा है या वह ज़रुरत से ज़्यादा चिड़चिड़ेपन का शिकार हो गई है तो घर और आस पास की महिलाएं उसका मज़ाक बनाती हैं। या फिर कह दिया जाता है कि यह सिर्फ दिमाग की ख़ुराफ़ात है। जबकि ऐसा प्रीमेंट्रुल सिंड्रोम के कारण होता है और महिला के स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ता है। इसलिए हमें पीएमएस के बारे में जानना बेहद ज़रुरी है ताकि हम खुद का और अपने आसपास की महिलाओं का ध्यान रख सकें। हर महिला को एक सहज एवं स्वस्थ्य माहौल मिल सके।

पीएमएस क्या है?

यह शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलाव की वजह से होता है जिस कारण शरीर में अनेक प्रकार के शारीरिक एवं मानसिक बदलाव होते हैं। महिलाएं ज़्यादा भावनात्मक हो जाती हैं। यह सभी बदलाव पीरियड्स आने से 7 से 8 दिन पहले होते हैं जिस कारण कई लक्षण देखने को मिल सकते हैं। 

जैसेः-

चिड़चिड़पन, मूड में उतार-चढ़ाव, चिंता, भूलने की बीमारी, खाने की लालसा, भ्रम, क्रोध, बेचैनी, रोना आना, एकाग्रता में कमी, सिरदर्द, वज़न बढ़ना, चेहरे पर सूजन, हाथ पैरों में सूजन, कब्ज़, पेट फूलना, स्तन का ढीलापन आदि।

ज़रुरी नहीं कि किसी एक महिला में यह सभी लक्षण एक साथ पाए जाते हों। अलग अलग महिलाओं में इनमें से अलग अलग लक्षण देखने को मिल सकता है। पीएमएस से दुनिया भर की लाखों महिलाएं प्रभावित हैं जिनमें से भारत में भी एक बड़ी संख्या शामिल है। विशेषज्ञों के अनुसार इससे सबसे ज़्यादा प्रभावित 30-45 साल की महिलाएं होती हैं, लेकिन कुछ रिसर्च के मुताबिक कम आयु की लड़कियों को भी यह प्रभावित कर सकता है। समस्या यह है किन कारणों से यह सिंड्रोम होता है इसका अभी तक पता नहीं लगाया जा सका है। जिस वजह से इसका उचित इलाज भी उपलब्ध नहीं है।

इसलिए इसके प्रति जागरुकता की बेहद ज़रुरत है और हम अपनी लाइफस्टाइल एवं खान-पान आदि चीज़ों पर ध्यान देकर इसे कंट्रोल कर सकते हैं। जैसेः-

नमक, चीनी, कैफ़ीन और शराब के सेवन से बचें।

अपनी डाइट में कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन शमिल करें। जैसे- ओट्स, साबुत गेंहू, दालें, छोले, शकरकंद, गाजर आदि।

कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में हमारे शरीर में पहुंचे। इसके लिए आप दूध, पनीर, दही, अंजीर, ब्रोकली आदि का आप सेवन कर सकती हैं।

मैग्नीशियम और विटामिन बी6 का सेवन भी नियमित रुप से करें। यह आपको केला, एवोकाडो, पालक, मेवे, काली बीन्स आदि में भरपूर मात्रा में मिल जाएगा।

चेस्टबेरी फल, प्रिमरोज़ तेल और ब्लैक कोहैश का सेवन भी पीएमएस के लक्षणों से राहत दिलाने में मदद करता है। लेकिन डॉक्टर की निगरानी में या डॉक्टर की सलाह पर ही करें तो आपकी सेहत के लिए ज़्यादा बेहतर होगा।

अच्छी नींद और नियमित व्यायाम भी पीएमएस के लक्षणों को कम करने में मददगार होते हैं।

अगर लक्षण ज़्यादा सीरियस कंडीशन में पहुंच जाएं तो NSAIDs, OCPs, और डिप्रेशन में दी जाने वाली अन्य दवाओं की मदद से इसे कंट्रोल किया जा सकता है। लेकिन डॉक्टर की सलाह पर ही ऐसा करें।

पीएमएस के बारे में समाज में विशेषरुप से महिलाओं में जागरुकता लाना बेहद ज़रुरी है। क्योंकि कई महिलाएं जानकारी के अभाव में चुपचाप इससे जूझती रहती हैं। इससे न केवल उनकी ज़िंदगी बल्कि पूरा व्यकतित्व तबाह हो जाता है। इतना ही नहीं कभी कभी यह सिंड्रोम पीएमडी यानि प्री मेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर में बदल जाता है। जो कि इस का गंभीर रुप होता है और उसके लिए फिर एंटीडिप्रेसेंट और दूसरी दवाएं दी जाती हैं जिनका अपना जोखिम होता है।


डॉक्टर आमना ख़ानम

जनरल फिजिशियन, महाराष्ट्र

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