बंद होते सरकारी स्कूल: नई पीढ़ी का भविष्य
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कवर स्टोरी

बंद होते सरकारी स्कूल: नई पीढ़ी का भविष्य

शिक्षा एक ऐसा हथियार है जिससे दुनिया को बदला जा सकता है। शिक्षित लोग ही घर, परिवार,समाज और राष्ट्र को व्यवस्थित और सभ्य बनाते है। जिस समाज में शिक्षा का अस्तित्व ना हो उस समाज के विकास की कल्पना कर पाना भी असंभव है।

डॉ भीमराव अंबेडकर का ये कथन बहुत लोकप्रिय है कि "शिक्षा वो शेरनी का दूध है, जो इसे पिएगा वो दहाड़ेगा" मतलब पढ़ लिख कर ही कोई नागरिक अपने अधिकार के प्रति जागरूक होता है, अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद करता है, समाज को स्वस्थ, सशक्त और न्यायप्रिय बनाता है। 

अतः स्वस्थ्य समाज के लिए शिक्षा का महत्व तो है ही साथ ही समान शिक्षा भी ज़रुरी है। समाज के दबे कुछले निर्धन लोगों तक शिक्षा की पहुंच हमारे देश का संवैधानिक अधिकार है।

लेकिन दुर्भाग्यवश हमारे समाज का पढ़ा लिखा और आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग इस दिशा में तो आगे बढ़ रहा है लेकिन जो निचला वर्ग है जहां दो वक्त की रोटी लोगो को बहुत मुश्किल से नसीब होती है, शिक्षा के क्षेत्र में बहुत पीछे है। 

अगर कोई आगे बढ़ भी रहा है तो वो सिर्फ उन सरकारी स्कूलों की देन है जहां बच्चों को मुफ्त में शिक्षा मिल रही है और वो बच्चे अपना भविष्य बना रहे है। लेकिन पिछले 10 सालों से सरकार उन निचले वर्ग और गरीब बेसहारा बच्चों का वो सहारा छीनने में लगी हुई है जो उन्हें संविधान ने दे रखा है। सरकार धीरे धीरे सरकारी स्कूल को बंद करने पर तुली हुई है।

हम विश्वगुरु बनने का सपना तो देखते हैं लेकिन जिस देश को शिक्षा के द्वारा विश्वगुरु बनाना था, वहां बच्चों के हाथों से किताबें छीनी जा रही है। हाल ही में आए आंकड़ों के मुताबिक देश में पिछले दस सालों में लगभग 89 हज़ार सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए हैं।

जिसमें से ज़्यादातर सरकारी स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में ही है जहां बच्चों को शिक्षा प्राप्त करना बहुत मुश्किल होता है और आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं रहती कि कही और जाकर निजी स्कूलों से ज्ञान प्राप्त कर सके। 

अगर सरकार इन इलाकों में स्कूलों पर ताले लगाती है तो वो बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल रही है जो समाज और राष्ट्र को अनपढ़ बनाने की ओर एक कदम है। भारत वो देश है जहां हर साल साक्षरता दिवस मनाया जाता है ताकि समाज को अधिक साक्षर बनाने के लिए प्रयास किए जा सके लेकिन उसी देश की सरकार बच्चो को आगे बढ़ने बजाए पीछे धकेलने का प्रयास कर रही है। जबकि पिछले 70 से 75 सालों में विभिन्न जागरुकता कार्यक्रम चलाकर, और शिक्षा को संवैधानिक अधिकार बनाकर इन ग्रामीण बच्चों को शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ाने के कठिन प्रयास किए गए गए। अब उन्हीं मासूमों से शिक्षा जैसे मौलिक अधिकार को छीनने का प्रयास किया जा रहा है।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार ने लोकसभा में खुद इस बात को स्वीकार किया है कि पिछले 10 साल में तक़रीबन 89 हज़ार सरकारी स्कूल सरकार द्वारा बंद कर दिए गए है। जिसमें सबसे ज्यादा उत्तरप्रदेश के आंकड़े है जहां 5000 से ज़्यादा स्कूल बंद किए गए, यही नहीं आगे 27000 स्कूलों को बंद करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा मध्यप्रदेश, उड़ीसा, झारखंड और जम्मू कश्मीर में भी बड़ी संख्या में सरकारी स्कूलों को बंद किया जा रहा है।

एबीपी की एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में 2014-15 से 2023 -24 तक सरकारी स्कूलों को संख्या में 8 प्रतिशत कमी आई है, जबकि निजी स्कूलों में 14.9 प्रतिशत बढ़ोतरी देखी गई है।

सरकार ने लोकसभा में इस डेटा को प्रस्तुत किया था, 2014-15 और 2023-24 के मध्य सरकारी स्कूलों की संख्या 11,07,101 से घटकर 10,17,660 रह गई है। जबकि निजी स्कूलों की संख्या 2,88,164 से बढ़कर 3,31,108 हो गई है।

मध्य प्रदेश में 29,410 और उत्तरप्रदेश में 25,126 की गिरावट देखी गई , जो सरकारी स्कूलों में कुल 89,441 गिरावट का 60.9 प्रतिशत है। इनमें सिर्फ प्राथमिक और सेकेंडरी स्कूल ही नहीं बल्कि सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी है।

यह वही सरकार है जो धार्मिक आयोजनों पर करोड़ों खर्च करती है और जब बच्चों की शिक्षा की बात आती है तो स्कूलों को बंद किया जाता है।

इसका कारण सरकार ये बता रही है कि कई स्कूलों में बच्चे 20 या 50 से कम है या वहां इमारत की स्थिति सही नहीं थी और ये भी कहा गया कि जिन स्कूलों को बंद किया जा रहा है उनका विलय दूसरे पास के सरकारी स्कूलों में किया जाएगा। 

एक रिपोर्ट के अनुसार उन सरकारी स्कूलों को भी बंद किया गया जहां 50 से अधिक बच्चे थे और इमारत की स्थिति एकदम सही थी। जहां बंद स्कूलों की दूसरे स्कूल के विलय की बात है वहां ये स्थिति सामने आ रही है कि दूसरी स्कूल में बच्चे 10 में से 2 भी नहीं जा पा रहे। 

कई परिजनों का कहना है कि जो स्कूल उनके पास थी उसमें बच्चे आसानी से जा सकते थे लेकिन बंद होने के कारण बच्चे बिना साधन के दूर नहीं जा सकते। 

परिजनों और बच्चों के लिए सरकार ने एक संकट खड़ा कर दिया जो उन्हें शिक्षित होने से रोक रहा है। गरीब परिवारों का ये भी कहना है कि उनके बच्चे स्कूल में दोपहर का खाना खाते थे उससे उन्हें पालन पोषण में भी आसानी होती थी और खर्चे कम लगते थे। 

अगर भारत में ये स्थिति लगातार बनी रही तो आने वाले 10 सालों में सरकारी स्कूलों के आंकड़े ना के बराबर हो जाएंगे और महंगाई की तरह शिक्षा प्राप्त करना भी उतना ही कठिन होगा जिस तरह आज निम्न वर्ग के लोगों का 2 वक्त पेट भरना मुश्किल होता है। 

ये कहानी सिर्फ बच्चो पर ज़ुल्म की नहीं है बल्कि इससे वो शिक्षक भी प्रभावित होंगे जो इन स्कूलों में पढ़ा रहे है, जिनसे उनका गुजर बसर चल रहा है।

सत्ता के नशे में चूर सरकार को ये सोचना चाहिए कि जिस आम आदमी ने उसे चुना है उसकी सेवा करना उसका सर्वोपरि धर्म है। सरकार को चाहिए था कि कम नामांकन वाले स्कूलों की स्थिति ठीक की जाए और वहां दूसरे बच्चों को लाया जाए। स्कूल की जरजर इमारतों को ठीक करवाया जाए। स्कूलों में ख़ास शिक्षा प्रणाली स्थापित की जाए। शिक्षा बजट में वृद्धि की जाए ताकि भारत के हर नागरिक को उसका अधिकार मिले और देश की आने वाली नस्ल अनपढ़ ना हो बल्कि उनके विवेक का विस्तार हो, नए ज्ञान से वो दुनिया को बदलने की क्षमता रखे

ज़रा सोचें गरीबी भारत की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है जिसपर अपार चर्चा हों सकती है लेकिन इससे भी बड़ी समस्या आज की पीढ़ी को अनपढ़ रखना है, उन्हें शिक्षा से वंचित करना है। शिक्षा से ही मानसिक और आध्यात्मिक विकास होता है तथा अच्छा आचरण व नैतिक चरित्र बनता है। सरकार का ये कर्तव्य है कि देहातो और गांवों के गरीब बच्चों पर ये अत्याचार ना करे, मासूम बच्चों से उनका मौलिक अधिकार ना छीना जाए।

ख़ान शाहीन जाटू

संपादक, आभा ई-मैग्ज़ीन

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