गज़ा में जारी नरसंहार सभ्य समाज पर कलंक
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वैश्विक परिदृश्य

गज़ा में जारी नरसंहार सभ्य समाज पर कलंक

मनुष्य पशु प्राणियों से विभिन्न होते हैं, वे समाज के साथ रहते हैं। स्पष्ट है कि जब सामूहिक अस्तित्व का प्रश्न आता है, तो कुछ नीतिगत नियम और कानून बनाए जाने होते हैं, क्योंकि हर कोई अपनी मनमानी नहीं कर सकता। यदि किसी व्यक्ति या वर्ग को यह स्वतंत्रता दे दी जाए कि वह जवाबदेही की भावना से मुक्त हो, तो यह स्थिति समाज को अराजकता और विनाश की ओर ले जाएगी। समाज की संरचना को सुंदर और मजबूत बनाने के लिए कानून के प्रति जवाबदेह होना आवश्यक है। यह मानवता और नैतिकता का एक महत्वपूर्ण कदम है।

संसार में जो कुछ है वो उसकी विशेषता से पहचाना जाता है। जैसे, सूर्य की पहचान उसकी चमक और गर्मी से की जाती है, और फूल को उसके रंग और सुगंध से पहचाना जाता है। यदि वे अपनी विशेषता को नष्ट कर देते हैं, तो उनका अस्तित्व बेकार हो जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य की वास्तविक पहचान मानवीय मूल्यों द्वारा की जाती है। यह किसी भी समाज का एक सामान्य न्यूनतम मापदंड है। यदि ये मूल्य जीवित नहीं हैं तो प्राणी और मनुष्य के बीच कोई अंतर बाकी नहीं रहता। यह वस्तु प्रत्येक संस्कृति, सभ्यता, धर्म, पंथ, आस्तिक और नास्तिक सभी लोगों के बीच समान और सार्वभौमिक हैं। हर बुद्धिमान एवं जिम्मेदार व्यक्ति को उन्हें संरक्षित करना चाहिए।

 अपने वर्चस्व और साम्राज्य को स्थापित करने या विस्तरित करने की मानसिकता मनुष्य में प्राचीन काल से ही रही है। इसी कारण से, समूहों और देशों के बीच हुए युद्धों का एक लंबा इतिहास लिखा गया है। लेकिन हर युग में इन युद्धों के लिए भी नियम बनाए गए थे। और सभी राज्यो या पक्षों को इसका अनुपालन करना पड़ता था। 20 वीं शताब्दी के मध्य तक दो विश्व युद्ध खेले गए, बड़े स्तर पर मानव जीवों का ह्रास हुआ। लाखों महिलाएं विधवा हो गईं, लाखों बच्चे अनाथ हो गए और करोड़ो नागरिक बेघर हुए। इस परिस्थिति से संज्ञान लेकर संयुक्त राष्ट्र ने 1948 में मानवाधिकार घोषणापत्र पारित किया। जिसमें सभी को जीवन, स्वतंत्रता और सुरक्षा का अधिकार दिया गया। प्रत्येक व्यक्ति के लिए सम्मान और गरिमा को सुरक्षित किया गया और बिना किसी भेदभाव के कानून के समक्ष समान रूप से जिम्मेदार ठहराया गया। लेकिन शक्तिशाली देशों ने कभी इनका अनुपालन नहीं किया जिसके कारण न्याय और शांति की स्थापना मात्र एक स्वप्न बनी रही। वर्तमान में, इज़राइल जो इन शक्तिशाली देशों द्वारा समर्थित है, वह इन मूल्यों का उल्लंघन कर रहा है, और संयुक्त राष्ट्र केवल बयानों पर बयान देकर अपनी "सत्ता की शक्ति" दिखा रहा है। हर कोई जानता है कि इज़राइल ने अतिक्रमण, अपहरण, , बच्चों, महिलाओं, युवाओं और वृद्धों की हत्या का एक क्रूर इतिहास रचा है।

यहां तक कि वर्तमान युद्ध में तो इज़राइल ने मानवता के सभी पहलुओं को समाप्त कर दिया है। और गंभीर प्रकार के युद्ध अपराध में शामिल है फिर भी बड़े देशों की आंखें नहीं खुलती। या जान बुझ कर कोई कठोर कदम उठाना नहीं चाहते। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने नेतान्याहू को एक अपराधी घोषित किया है लेकिन उसके अमानवीय व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया। युद्ध विराम की मांग दुनिया भर में उठ रही हैं, न्यायसंगत और मानवता प्रिय लोग प्रदर्शन कर रहे हैं, फिर भी फिलीस्तीन के निर्दोष नागरिकों पर इजरायल के हमलों में कोई कमी नहीं आई है। युद्ध समाप्त करने के लिए अमेरिका से कोई विशेष दबाव नहीं बनाया जा रहा है। मानवीय सहायता प्रदान करने वालों को भी बाधित किया जा रहा है। जिसमें दो घटनाओं ने दुनिया को आकर्षित किया है। 

प्रथम, द फ्रीडम फ्लोटिला गठबंधन ने यूके-फ्लैग्ड शिप मेडलिन द्वारा गाजा के लिए एक नया सहायता मिशन शुरू किया, जिसका उद्देश्य इजरायली नौसेना की नाकाबंदी को चुनौती देना और मानवीय आपूर्ति प्रदान करना था। 12 सदस्यों पर आधारित क्रू में यूरोपीय सांसद रीमा हसन और पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थानबर्ग भी शामिल थी। रीमा एक बहादुर महिला है,उसने न केवल इज़राइल पर गाजा में "नरसंहार" का आरोप लगाया है, बल्कि उसे "फासीवादी औपनिवेशिक अस्तित्व" और "हर दिन झूठ बोलने" वाले "नामहीन दानव" के रूप में भी उल्लेख किया है। थनबर्ग भी एक प्रसिद्ध कार्यकर्ता है, उसने एक युवा-नेतृत्व स्वीडिश कार्यकर्ता समूह के 600 से अधिक युवाओं के साथ, स्वीडन में जलवायु निष्क्रियता के लिए स्वीडिश सरकार के विरुद्ध स्टॉकहोम जिला अदालत में एक मुकदमा दायर किया था। वह गाजा की समर्थक हैं, उसने फिलिस्तीनियों और असरग्रस्त सभी नागरिकों के लिए न्याय और स्वतंत्रता के लिए एक बयान दिया था। उस मानवतावादी जहाज का इजरायल कमांडोस द्वारा "अपहरण" कर लिया गया।

इसी प्रकार, दुनिया भर के मानवतावादी लोगों ने 'ग्लोबल मार्च टू गाजा' (GMTG) का आयोजन किया। जो मिस्र के आरिश से फिलिस्तीन में गाजा पट्टी की रफह सीमा तक कूच करने के लिए एक नागरिक-अग्रणी अंतर्राष्ट्रीय पहल थी। जो 15 जून को शुरू होने वाली थी। उन्होंने मिस्र की सीमा की ओर एक विरोध शिविर स्थापित करने की योजना बनाई थी। जिसका उद्देश्य गाजा पर इजरायल की नाकाबंदी को शांतिपूर्ण तरीके से तोड़ना,गाजा पट्टी को मानवीय सहायता प्रदान करना, गाजा में नरसंहार को रोकना, मानवीय सहायता के लिए एक कॉरिडोर खोलना और इज़राइली युद्ध अपराधों का पर्दाफाश करना था। लेकिन इजरायल के रक्षा मंत्री काट्ज ने प्रदर्शन का कड़ा विरोध किया और घोषणा की कि जरूरत पड़ने पर इजरायल उसपर भी सैन्य कार्रवाई करेगा। हालांकि, मिस्र में हिरासत और अनुमति न मिलने के कारण आयोजकों को मार्च रद्द करना पड़ा। 

अभी पूरा फिलीस्तीन भोजन, पानी और जीवन जरूरत की वस्तुओं की कमी से बुरी तरह प्रभावित है। भोजन की कमी के कारण एक गंभीर भूख संकट की परिस्थिति का सामना कर रहा है। ह्यूमन राइट्स के मुख्य वोल्कर तुर्कने गाजा में प्रचंड भूखमरी और सूखे की परिस्थिति की निंदा करते हुए कहा कि, भुखमरी और सूखे की स्थिति मानवीय सहायता और इजरायल द्वारा वाणिज्यिक सामानों के प्रवेश और वितरण पर व्यापक प्रतिबंधों का परिणाम है। इतना ही नहीं, इजरायल की निर्दयता और क्रूरता का अंदाजा इससे भी होता है, अगर भूखे लोगों की भीड़ खाद्य वितरण केंद्रों में इकट्ठा होती है, तो उनकी भी हमला करके हत्या की जा रही हैं, और यह कृत्य निरंतर जारी है। उत्तरी गाजा में बेत लाहिया के अल-सलातिन क्षेत्र में अपने क्षतिग्रस्त घर का निरीक्षण करने वाले तीन भाइयों को इजरायली बलों द्वारा मार दिया गया था। फिलिस्तीनी बंधकों के साथ इजरायल का अमानवीय व्यवहार भी जगजाहिर है।

पिछले 20 महीनों में 56,000 से अधिक फ़िलिस्तीनी मारे गए हैं और कम से कम 131,559 घायल हुए हैं, जिनमें से अधिकतर बच्चे और महिलाएँ हैं। एनआरसी ने एक नई रिपोर्ट में कहा है कि बिजली और ईंधन जैसी बुनियादी ऊर्जा से वंचित होना गाजा में अस्तित्व के लिए एक बड़ा ख़तरा है। भोजन बनाने के लिए भी कोई ईंधन उपस्थित नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, बिजली के बिना गाजा में स्वास्थ्य सुविधाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, आपातकालीन सर्जरी विलंबित करनी पड़ी हैं। वेंटिलेटर, इनक्यूबेटर और डायलिसिस मशीनें कार्य नहीं कर पा रही हैं। NORCAP के कार्यकारी निर्देशक बेनेडिक्ट जियावर ने कहा, "गाजा में, ऊर्जा परिवहन के लिए नहीं है - यह अस्तित्व के लिए एक आवश्यकता है।" सोमदीप सैन का कहना है कि “दुनिया मानवता के विरुद्ध अपराधों को तुरंत नहीं देखती। अगर न्याय मिलता भी है, तो हमेशा देरी से। हमें यह स्वीकार करने में कितना समय लगेगा कि ये अपराध मानवता के विरुद्ध अपराध हैं!!! और बड़ा प्रश्न ताकते हुए कहता है कि गाजा में त्रासदी का प्रमाण और नरसंहार के लिए इजरायली सैन्य अभियान स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, फिर भी यह जारी है!! क्यों?"  वर्तमान नरसंहार भी औपनिवेशिक युग की याद दिलाता है।

रेड क्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति (ICRC), एक अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन जो सशस्त्र संघर्ष और अशांति के पीड़ितों की रक्षा और सहायता का प्रयत्न करता है, उसके प्रयासों में भी बाधा डाली जा रही है या उसे सीमित किया जा रहा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी गाजा से फिलिस्तीनियों को निष्कासित करने की योजना का समर्थन किया है। और 85 प्रतिशत इजरायली-यहूदियों भी ट्रम्प की इस योजना का समर्थन करते हैं। नेतन्याहू ने पूरे फिलिस्तीन पर नियंत्रण करने के लिए हर सीमा पार कर दी है। फिलिस्तीनी बच्चे स्नाइपर फायर से मारे जा रहे हैं, स्थानीय और अस्थानीय कवियों और पत्रकारों को लक्षित निशाना बनाया जा रहा है, 87 प्रतिशत स्कूल गोलाबारी से क्षतिग्रस्त या पूरी तरह नष्ट हो गए हैं, UNOSAT के अनुसार, गाजा की 67.6 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि खराब हो गई है, 88,868 संरचनाएं, 50% से अधिक इमारतें नष्ट या क्षतिग्रस्त हो गई हैं, एक हजार से अधिक मस्जिदें नष्ट हो गई हैं, विश्वविद्यालयों का विनाश, पैदल यात्रियों और शरणार्थी शिविरों पर बमबारी, अधिकांश आबादी का विस्थापन, साथ ही महत्वपूर्ण नागरिक बुनियादी ढांचे का विनाश, मानवीय सहायता स्वयंसेवकों की हत्याएं आदि सभी नरसंहार के प्रमाण हैं। इतना ही नहीं, सेव द चिल्ड्रन और यूनिसेफ के अनुसार, अप्रैल 2024 तक, गाजा पट्टी के 36 अस्पतालों में से 30 पर बमबारी की गई थी। 

फिलीस्तीन का विनाश या विस्थापन का विचार नेतान्याहू पर पागलपन की सीमा तक पहुंच गया है। अभी तक इजरायल गाजा पट्टी पर 100,000 टन बारूद फेंक चुका है। भुखमरी की उसकी नीति के तहत, इजरायल ने 29 खाद्य दान रसोई और 37 सहायता केंद्रों सहित 66 राहत सुविधाओं पर हमला किया है, जबकि दो महीने पहले सीमा पार पूरी तरह से बंद करने के बाद 37,400 सहायता और ईंधन ट्रकों को रोक दिया गया था। इजरायली राजनेताओं के सार्वजनिक बयानों और कार्यों से यह स्पष्ट है कि उनका लक्ष्य फिलीस्तीन में जातीय सफाई है।

युद्ध के कानूनों का उल्लंघन युद्ध अपराध होता है। जो युद्ध में लड़ाकों द्वारा किए गए कार्यों के लिए व्यक्तिगत आपराधिक कृत्यों को जन्म देते हैं, जैसे कि जानबूझकर नागरिकों की हत्या करना या युद्ध के कैदियों की जान लेना, उन्हें यातना देना, नागरिकों को बंधक बनाना, नागरिकों की संपत्ति को बिना कारण नष्ट करना, विश्वासघात द्वारा धोखाधड़ी, युद्ध के दौरान यौन हिंसा और लूटपाट, और सामूहिक हत्या (नरसंहार या जातीय सफाई सहित), आत्मसमर्पण करने में विफलता आदि करने का कोई भी प्रयास आदि। इन सभी अपराधों में इज़राइल शामिल है। वह सुरक्षा के बहाने मानवीय सहायता रोक रहा है। अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने पिछले नवंबर में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके पूर्व रक्षा मंत्री योव गैलेंट के लिए गाजा में युद्ध अपराधों और मानवता के विरुद्ध अपराधों के लिए गिरफ्तारी वारंट जारी किया था। और एक नरसंहार का मामला भी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के समक्ष लंबित है।

यह आश्चर्यजनक है कि एक यहूदी समुदाय जो नाजी जर्मनों द्वारा तथाकथित नरसंहार से बच गया है, एक सिद्धांतवादी और भौतिक रूप से कमजोर समुदाय का नरसंहार करने के लिए अमानवीयता, अनैतिकता और शैतानवाद के इतने निचले स्तर पर कैसे गिर सकता है? यह अकल्पनीय है! लेकिन आठ दशक बाद, ज़ायोनिस्ट 'ग्रेटर इज़राइल' के लिए गाजा में फ़िलिस्तीनियों के साथ वही कर रहे हैं। यह नरसंहार और जनसंहार औपनिवेशिक ताकतों की संलिप्तता को दर्शाता है। 

'भोजन के अधिकार' पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत माइकल फखरी ने कहा कि "गाजा में जितने लोग भूख, कुपोषण और बीमारी से मर रहे हैं उतने गोला-बारूद से नहीं मर रहे।" संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश की गई इस खुफिया रिपोर्ट के अनुसार: "इज़राइल गाजा और वेस्ट बैंक में रहने वाले 23 मिलियन फ़िलिस्तीनियों को भूखा मरने या मारने का एक अभियान जानबूझकर चला रहा है। इसलिए, नरसंहार की रोकथाम के लिए कन्वेंशन 1948 के अनुसार, अन्य देशों को मानवता के विरुद्ध इस अपराध को रोकने में अपनी भूमिका निभानी चाहिए। गाजा में मानवीय सेवाओं की निर्बाध डिलीवरी सुनिश्चित करना आवश्यक है। सामूहिक भुखमरी को रोकने और शांति और न्याय स्थापित करने का यही एकमात्र तरीका है। इस समस्या का स्थायी एवं टिकाऊ समाधान ढूंढना समय की महत्वपूर्ण मांग है। अन्यथा इससे पूरी दुनिया बुरी तरह प्रभावित होगी।

शकील अहमद राजपूत

अहमदाबाद, गुजरात

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