‘ईर्ष्या’ एक ऐसी सामाजिक बुराई जो महिलाओं की सफलता में रुकावट
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परिवार

‘ईर्ष्या’ एक ऐसी सामाजिक बुराई जो महिलाओं की सफलता में रुकावट

रज़िया मसूद

 भोपाल, मध्य प्रदेश

इस्लाम जीवन के सभी पहलुओं में महिलाओं की ज़िम्मेदारी और महत्व पर ज़ोर देता है, जिसमें परिवार, समाज और धर्म में उनकी गरिमापूर्ण भूमिकाएं शामिल हैं। कुरआन और हदीस की कुछ आयतें इसे स्पष्ट करती हैं।

1. सामाजिक और नैतिक कर्तव्य: “ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएं एक-दूसरे की सहयोगी हैं। वे सही काम करने का आदेश देते हैं और गलत काम करने से रोकते हैं” (9:71)। महिलाएं परिवारों और समाज में न्याय और नैतिकता को बनाए रखकर समाज में सांप्रदायिक सद्भाव के लिए समान रूप से ज़िम्मेदार हैं।

2. शिक्षा और ज्ञान  "अल्लाह तुममें से ईमान वालों और जिन्हें ज्ञान दिया गया है, उन्हें क्रमशः ऊंचा उठाएगा” (58:11)। यह आयत महिलाओं को समाज और परिवार में शिक्षा के लिए समान रूप से ज़िम्मेदार बनाती है।

3. आर्थिक और कानूनी अधिकार: “जो कुछ मर्दों ने कमाया है उसके अनुसार उनका हिस्सा है और जो कुछ औरतों ने कमाया है उसके अनुसार उनका हिस्सा है" (4:32)।  यह आयत पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान अधिकारों का संकेत देती है। 

4. आध्यात्मिक समानता और ज़िम्मेदारी: "वास्तव में, मुस्लिम पुरुष और मुस्लिम महिलाएं, ईमान वाले पुरुष और ईमान वाली महिलाएं, आज्ञाकारी पुरुष और आज्ञाकारी महिलाएं, सच्चे पुरुष और सच्ची महिलाएं, धैर्यवान पुरुष और धैर्यवान महिलाएं अल्लाह ने उनके लिए क्षमा और महान प्रतिफल तैयार किया है।" (सूरह अहज़ाब-33:35)। यह आयत धार्मिक प्रक्रियाओं और पालन में समानता प्रदान करती है।

सामान्यतः मुस्लिम समाज को इन निर्देशों के अनुसार अपने जीवन को मार्गदर्शित और अपने चरित्र में सुधार करने का आदेश दिया गया है।

अब बात अगर औरत के चरित्र की हो तो जिस औरत ने इस्लाम को अपने जीवन का आदर्श मान लिया है और यह निर्णय कर लिया है कि अब वे इसके अनुसार ही जीवन व्यतीत करेगी, उसके भीतर इस्लाम द्वारा दी गई सोच और जीवनशैली के विरुद्ध अब कोई प्रतिरोध नहीं रह जाता, बल्कि उसने आज्ञाकारिता और उसका अनुसरण करने का मार्ग चुन लिया है। क़ुरआन और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) द्वारा दिखाया गया विचार और कर्म का मार्ग सीधा और सही मार्ग है, और इसका अनुसरण करना ही मनुष्य के लिए समृद्धि का एकमात्र रास्ता है।

अब सवाल यह उठता है जिसके पास समृद्धि के लिए सीधा रास्ता मौजूद है, समानता के सारे अधिकार हैं, जिसके पास ज्ञान है, जो अपने हर कर्म के लिए ज़िम्मेदार और जवाबदेह है फिर वह बुराई के रास्ते पर कैसे चल पड़ता है। यह एक स्वाभाविक बात है कि हर इंसान के अंदर ख़ुद के लिए छुपा हुआ प्यार या महान बनने की चाहत होती है। कई बार हम इसे देख नहीं पाते, लेकिन अगर हम किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व की जांच करें, तो यह कहीं न कहीं परिलक्षित होता है। दूसरों से बेहतर दिखने की स्वार्थी इच्छा। अल्लाह ने यह इच्छा मनुष्य के अंदर सिर्फ़ इसलिए नहीं डाली कि वह भौतिक और शारीरिक सुख के लिए प्रयास करे, बल्कि इसलिए डाली कि मनुष्य अपने नैतिक मूल्यों में सुधार करे। नैतिकता का संबंध बाहरी दिखावे से नहीं, बल्कि दिल से है और कोई भी बुराई सबसे पहले दिल में ही उत्पन्न होती है।

महिला व्यवहार का मनोविज्ञान 

जब कोई औरत किसी के घर में बहू बनकर आती है तो अक्सर उसे वह दर्जा नहीं मिलता जिसकी वह हक़दार है। कई घरों में तो उसकी हैसियत नौकरानी से ज़्यादा नहीं होती। संयुक्त परिवार व्यवस्था में उसे किसी न किसी तरह से प्रताड़ित किया जाता है। समाज में यह भी उदाहरण देखा गया है कि बेटे को जन्म देने के कारण उसे सम्मान मिलता है और वह इसे अपने अहंकार का मुद्दा बना लेती है। फिर जब एक महिला अपने बेटे की शादी करके घर में बहू लाती है, तो उसे कहीं न कहीं ऐसा महसूस होने लगता है कि बेटे की माँ बनकर उसे जो सम्मान मिला था, वह कम होता जा रहा है या उसकी जगह बहू ने ले ली है और बेटे को पालने के लिए उसने जो संघर्ष किया, उसका कोई प्रतिफल उसे नहीं मिल रहा है। वह अपने दोनों ही रिश्तो में बैलेंस नहीं कर पाती। हमारे समाज की सामाजिक स्थिति ऐसी है कि पुरुषों के तरफ से भी उसे माँ, पत्नी या बहू के रुप में वह सम्मान और मूल्य नहीं मिल पाता है जो उसे मिलना चाहिए। जबकि पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व) ने फरमाया- "तुम में सबसे अच्छे वो हैं जो अपनी औरतों के साथ सबसे अच्छे हैं"(तिरमिज़ी- 1162)

हालाँकि उसे अपनी बहू से कोई व्यक्तिगत समस्या नहीं होती लेकिन एक असुरक्षा की भावना होती है जो उसे हर समय हीन भावना से ग्रसित रखती है और यहीं से ईर्ष्या और हीन भावना की शुरुआत होती है। कई घरों में देखा गया है कि बचपन से ही लड़की के साथ लड़के के समान व्यवहार नहीं किया जाता, एक उम्र से उसके अंदर कंपैरिजन की भावना मौजूद होती है और उसे बेटों से कम महत्व दिया जाता है।

समाज पर नज़र डालें तो जो लड़कियां खुले माहौल में पली-बढ़ी हैं और जहां बेटे-बेटियों में कोई फर्क नहीं किया जाता, वे लड़कियां कभी ईर्ष्या (हसद) का शिकार नहीं होतीं। घर में यह माहौल महिलाओं द्वारा ही बनाया जाता है, हालांकि कई घरों में पुरुष भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

 सामाजिक बुराइयां 

ईर्ष्या यानी हसद एक ऐसी नैतिक और मनोवैज्ञानिक बुराई है कि जिसमें दूसरों को अल्लाह ने जो नेमत दी है उसे इंसान देखकर यह सोचता है कि या तो यह नेमत मेरे पास आ जाए या उसके पास से भी छिन जाए। ईर्ष्या आत्म-त्याग और बलिदान के विरुद्ध है। ईर्ष्यालु व्यक्ति अल्लाह द्वारा बांटी गई नेमतों से ईर्ष्या करता है। वह परमेश्वर के विभाजन को अस्वीकार करता है। अल्लाह (सु.त) सूरह निसा में फरमाता है- "यह दूसरों से इसलिए हसद करते हैं के अल्लाह ने उन्हें अपने फ़ज़ल से नवाज़ दिया"(4:54)

कोई नेमत अगर किसी को मिली है तो वह अल्लाह ने दी है चाहे ज्ञान, खूबसूरती,धन,भूमि, संपत्ति, साम्राज्य या जो कुछ भी। ईर्ष्या करने वाला इसी पर ईर्ष्या करता है कि वह उसे क्यों मिली है मुझे क्यों नहीं मिली। जबकि अल्लाह की दी हुई नेमतों का हमें शुक्र अदा करना चाहिए।

महिलाओं में असुरक्षा की भावना, एक-दूसरे की कमज़ोरियों और पर्सनल मैटर्स पर उंगली उठाने और टिप्पणी करने की प्रवृत्ति अक्सर देखी जाती है। जबकि अल्लाह(सु.त) सूरह नूर आयत नंबर 21 में फरमाता है- "ऐ लोगों जो ईमान लाए हो शैतान के नक्शे क़दम पर ना चलो, उसकी पैरवी कोई करेगा तो वह उसे अश्लीलता और बुराई ही का हुक्म देगा" (24:21)

ईर्ष्या (हसद) जैसी बुराई जो औरतों में ज़्यादा पाई जाती है, इसकी शुरुआत अक्सर संयुक्त परिवार,मोहल्ले और रिश्तेदारों से शुरू होकर समाज तक पहुंच जाती है, परिणाम स्वरूप रिश्तो में खटास और दूरी, किसी को अपने से आगे न बढ़ने देने की होड़ शुरू हो जाती है जो आख़िरकार दुश्मनी का रूप ले लेती है। इसका एक और मुख्य कारण धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का अभाव भी है। जबकि पैगंबर मोहम्मद (स.अ.व) ने फरमाया- "ज्ञान प्राप्त करना हर मुसलमान पर एक दायित्व है"(इब्ने माजा-224)। यानी शिक्षा सभी के लिए अनिवार्य है।

इसी बुराई(चुगली) से एक दूसरी बुराई पैदा होती है जिसे हम ग़ीबत( चुगली) कहते हैं। इस्लाम में चुगली करना गुनाह ए कबीरा (बहुत बड़ा गुनाह) समझा जाता है। इससे न केवल धार्मिक नुकसान होता है, बल्कि महिलाओं के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक विकास में भी बाधा आती है। क़ुरान में सूरह हुजरात आयत नंबर 12 में अल्लाह (सु.त) फरमाते हैं- "ऐ लोगों जो ईमान लाए हो बहुत गुमान करने से परहेज़ करो के बाज़ गुमान गुनाह होते हैं, तजस्सुस(जिज्ञासा) ना करो और तुम में से कोई किसी की ग़ीबत ना करें। क्या तुम में से कोई ऐसा है जो अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाना पसंद करे, तुम ख़ुद उससे घिन खाते हो"। आमतौर पर देखा गया है कि शिक्षा हासिल करने, कोई हुनर सीखने और घरेलू कामों में अपना समय लगाने के बजाय औरतें इस बुराई में अपना समय बर्बाद करती हैं और यही उनकी तरक्की में रुकावट बनती है।

हमें अच्छे उदाहरणों और इस्लामी मूल्यों से मार्गदर्शन लेना चाहिएः-

हज़रत ख़दीजा(र.अ) पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व) की पहली पत्नी थीं और इस्लामी इतिहास में एक उल्लेखनीय हस्ती थीं। अपने असाधारण चरित्र के लिए जानी जाती हैं, जिसके कारण उन्हें "ताहिरा" (शुद्ध महिला) की उपाधि मिली। वह मुस्लिम महिलाओं के लिए एक रोल मॉडल मानी जाती हैं, जिन्होंने अपनी आस्था(ईमान) के प्रति शक्ति, साहस और समर्पण का प्रदर्शन किया, जिन पर अल्लाह ने जिब्रील (अ.स) के ज़रिए सलाम भेजा। वह गरीबों और ज़रूरतमंदों के प्रति अपनी उदारता, करुणा और दया के लिए भी जानी जाती हैं। उनकी मीरास( लिगसी) आज भी दुनिया की लाखों महिलाओं को प्रेरित करती है।

इसी प्रकार हज़रत आयशा (र.अ) जो की एक महान इस्लामिक स्कॉलर थी। वह इस्लामी न्यायशास्त्र में अपनी विशेषज्ञता के लिए जानी जाती थीं और अक्सर पैगम्बर मुहम्मद (स.अ.व) के साथियों को मार्गदर्शन प्रदान करती थीं। ज्ञान,बुद्धि, तार्किक दिमाग (लॉजिकल माइंड), क्षमाशील भाव (दरगुज़र) उनकी विशेषताएं थी। उन्होंने इस्लाम में अटूट आस्था का प्रदर्शन किया और पैगंबर मुहम्मद (से.अ.व) की प्रबल समर्थक थीं।

समाज की इकाई 'घर' है, घर का विकास समाज के विकास के समान है और समाज के विकास के लिए महिलाओं को अपने घरेलू जीवन के मामलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना ज़रूरी है। हमें उम्मुल मोमिनीन और सहाबियत का किरदार देखना चाहिए, उसकी रोशनी में हर औरत को स्वयं का मूल्यांकन करने की कोशिश करना चाहिए तथा उसके अनुसार खुद को ढालना चाहिए ताकि औरत ही औरत की सफलता की आधारशिला बन सके। इस प्रकार पारिवारिक मामलों को सामान्य बनाया जाता है, जिसके परिणाम स्वरुप एक नैतिक रूप से विकसित विनम्र समाज का निर्माण होता है। इस तरह हम न केवल अपने कर्तव्यों का निर्वहन अच्छी तरह से करेंगे बल्कि अन्य महिलाओं को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करेंगे।

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