घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य समाज के गंभीर मुद्दे
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संपादकीय

घरेलू हिंसा और मानसिक स्वास्थ्य समाज के गंभीर मुद्दे

खान शाहीन संपादक

प्रत्येक वर्ष 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। इस दिन स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता लाने की ढेरों चर्चाएं होती हैं। लेकिन अपने देश की बात करें तो अब तक एक महत्वपूर्ण मुद्दे को लगभग अनदेखा ही किया जाता रहा है और वह है महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य। यदि हम अपने समाज पर नज़र दौड़ाएं तो आपको हर दूसरी महिला मानसिक स्वास्थ्य से जूझती हुई दिखाई देगी। लेकिन हमारा दुर्भाग्य है कि हमारे देश में मानसिक स्वास्थ्य पर उतनी चर्चा नहीं होती है जितनी होनी चाहिए। कभी किसी का साया, कभी नज़र लगना तो कभी फलां महिला या लड़की बहुत तेज़ है, बहुत झगड़ालु है यह कहकर बात समाप्त कर दी जाती है। यह जानने और समझने की कोशिश ही नहीं होती कि किसी के स्वभाव में बदलाव आय क्यों है? उस पर किन किन चीज़ों का प्रभाव पड़ा है? 

महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को जो चीज़ सबसे ज़्यादा प्रभावित करती है वह है घरेलू हिंसा, या यौन हिंसा  अन्य प्रकार की कोई हिंसा। यह कटु सत्य है कि प्राचीनकाल से ही महिला हिंसा का शिकार रही और वर्तमान समय में भी योजनाबद्ध तरीके से महिलाओं के साथ हिंसा के मामले निरंतर सामने आते रहते है। ज़रा सोचिए एक महिला जो आपके घर को बनाती, संवारती है। ढेरों तिकड़म लगाकर पुरुष की कम आमदनी के बावजूद गृहस्थी के पहिए को खींचती है और फिर उसी घर में कभी वह हिंसा का शिकार बनती है तो कभी किसी प्रकार अपमानित होती है। 

मानसिक अंसतुलन या मनोरग का दंश झेलने वाली अधिकांश महिलाएं वे होती हैं जिनके साथ उनके घरों में दुर्व्यवहार होता है। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर तीसरी महिला घरेलू हिंसा का शिकार है। यह बेहद दुर्गभाग्यपुर्ण है कि एक महिला जो हष्ट पुष्ट है लेकिन भीतर से न जाने कितनी उलझनों और तनाव से ग्रसित है। उसके हंसते चेहरे के पीछे का दर्द उसके करीबी समझते है ना समाज।

यह भी कहा जा सकता है कि घरेलू हिंसा एक वैश्विक स्वास्थ्य संकट है और इससे महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वास्थ्य जगत में मानसिक स्वास्थ्य को निचली श्रेणी हासिल है इसलिए इसे गैर ज़रूरी समझा जाता रहा है। आश्चर्य की बात तो ये है मानसिक उत्पीड़न को आज का पढ़ा लिखा वर्ग समस्या समझता ही नहीं है।

शारीरिक हिंसा के साथ-साथ घर में उसके साथ तिरस्कार, बार बार लान - तान, आत्मसम्मान को ठेस, अपशब्द, नीचा दिखाना, धमकी, विवाहेतर सम्बन्ध आदि मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालता है। इसी कारण महिलाओं में तनाव, डिप्रेशन , एंजाइटी का ग्राफ मर्दों की तुलना में अधिक है। 

एक सर्वे से पता चलता है जिन महिलाओं ने घरेलू हिंसा का दंश झेला उनमें आत्महत्या के विचार आने की संभावना आम महिलाओं की तुलना में 3.5 गुना ज्यादा थी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इस हिंसा को वैश्विक स्तर पर एक तिहाई से ज्यादा महिलाओं को सिर्फ शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी प्रभावित करने वाली एक सार्वजनिक स्वास्थ्य महामारी के रूप में पहचान की है।

किंग्स कॉलेज लंदन और यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के एक शोध के अनुसार यह पाया गया कि प्रसवकालीन अवसाद, चिंता और तनाव के लक्षणों का उच्च स्तर, गर्भावस्था के दौरान या महिला के जीवनकाल में घरेलू हिंसा का अनुभव करने से जुड़ा हुआ था। उन्होंने यह भी पाया कि लगभग 12-13% प्रसवोत्तर अवसाद गर्भावस्था के दौरान घरेलू हिंसा के अनुभवों से जुड़ा हुआ है।

सत्य ये है कि शारीरिक और मानसिक हिंसा झेल रही महिला के लिए दोनों ही मनोवैज्ञानिक रूप से हानिकारक होते हैं। भारत में मार्च 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार हर 10 मिनट में अपने ही लोगों के द्वारा एक महिला मारी जा रही है।

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के शोध से पता चलता है कि 4 में से 1 वयस्क मानसिक विकार से पीड़ित है। 64 से 77 प्रतिशत महिलाएं अवसाद से पीड़ित हैं तथा 38 से 75 प्रतिशत महिलाएं चिंता से ग्रस्त हैं। इसलिए यह कहना अनुचित न होगा कि घरेलू हिंसा झेल रहे व्यक्ति को गंभीर मानसिक समस्याओं का सामना करना पड़ता है। 

यह बात भी मद्देनज़र रहनी चाहिए कि घरेलू हिंसा की वजह से उस घर में पालन - पोषण पा रहे बच्चो पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ता है। एक अध्ययन के अनुसार ऐसे बच्चों में अक्सर न्यूरो डेवलपमेंटल डिसऑर्डर के कारण स्कूल में खराब प्रदर्शन होता है और बच्चे अवसाद, चिंता जैसी मानसिक बीमारियों से जूझते है।

एक अध्ययन से यह भी साबित होता है कि मानसिक स्वास्थ्य एक ऐसी महामारी है जिससे महिलाओं की प्रोडक्टिविटी ख़त्म हो जाती और वो अपने लिए, परिवार , बच्चों और समाज के लिए कुछ अच्छा कार्य नहीं कर सकती।

इन समस्याओं को रोकने के लिए घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम (2005) लागू हुआ, लेकिन यह इतना प्रभावी साबित नहीं हुआ कि महिलाओं को इससे पूर्ण राहत मिल सके। महिला सुरक्षा सिर्फ सरकार या प्रशासन का दायित्व नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है कि महिला को सम्मानजनक स्थान प्रदान करे।

ईश्वर जो सर्वशक्तिमान है उसने किसी व्यक्ति को किसी दूसरे व्यक्ति पर इतना उच्च स्थान नहीं दिया कि वो किसी के साथ अशिष्ट व्यवहार करे और उसका अपमान करे। आदरणीय वही है जो लोगों के साथ भी अच्छा व्यवहार करने वाला हो। हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है हम अपने आस पास, घर में , समाज में कहीं किसी के साथ अन्याय करने वाले न हो। तभी इन अनकहे दुखों का अन्त संभव है।


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