घर में रहने वाली औरतें घर की नहीं होतीं?”
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समाज

घर में रहने वाली औरतें घर की नहीं होतीं?”

1. समाज का सबसे बड़ा झूठ: ‘घरेलू महिलाएं कुछ नहीं करतीं’

अगर किसी महिला से आप पूछें —

आप क्या करती हैं?”

और वो कह दे — “मैं घर पर रहती हूं”,

तो अगला सवाल होता है — “घर पर ही? कुछ करती क्यों नहीं?”

यही सवाल देश के करोड़ों घरेलू महिलाओं को रोज़ सुनना पड़ता है।

उनसे कोई ये नहीं पूछता कि वह घर पर क्या-क्या करती हैं?

सिर्फ़ ये मान लिया जाता है कि जो घर पर है, वो निकम्मी है, बेकार है, कामचोर है।

क्या आपने कभी सोचा — कि जिन महिलाओं ने घर को सम्भाला, वह क्यों खुद को हर दिन साबित करती हैं?

2. घर चलाना ‘करियर’ क्यों नहीं माना जाता?

आप ऑफिस जाते हैं — 9 से 5

आपके पास लंच टाइम है, सैलरी है, छुट्टियां हैं।

घर की महिला?

24 घंटे ड्यूटी पर है बिना सैलरी, बिना छुट्टी, बिना ‘thank you’ के।

सुबह सबसे पहले उठना

सबके लिए चाय और नाश्ता बनाना

बच्चों का टिफिन, पति के कपड़े, सास-ससुर की दवा

कपड़े धोना, बर्तन, सफाई, राशन लाना

फिर दोपहर का खाना, फिर मेहमान, फिर बच्चों की पढ़ाई

फिर रात का खाना, सबको सुलाना — और फिर अगली सुबह की तैयारी…

ये काम नहीं है तो फिर क्या है?

घर चलाना क्या किसी मैनेजर का काम नहीं है?

क्या इसका कोई प्रोफेशनल टाइटल नहीं होना चाहिए?

3. पैसा न कमाने वाली औरत की इज़्ज़त क्यों कटौती में दी जाती है?

आज समाज में महिला का वजूद कमाई से तय किया जा रहा है।

जो महिला पैसे लाती है — वो ‘strong woman’ कहलाती है।

और जो घर सम्भालती है — उसे कहा जाता है — “तुम तो dependent हो”

कमाई न करने वाली महिला को decision-making से बाहर रखा जाता है। उसे खर्च मांगते वक्त शर्मिन्दा किया जाता है. और खुद के लिए कुछ लेने से पहले सोचना पड़ता है — “क्या मेरा हक़ है?” इज्ज़त अब contribution से नहीं, cheque से मिल रही है। यह सोच न सिर्फ़ महिलाओं को, बल्कि पूरे समाज को खोखला कर रही है।

4. घरेलू महिलाओं का मानसिक उत्पीड़न — जो हर दिन होता है, हर कोई करता है

एक बात याद रखनी चाहिए कि मानसिक उत्पीड़न हमेशा चिल्लाकर नहीं होता। कई बार ये मुस्कराते हुए कहे गए वाक्यों में छुपा होता है:

तुम तो दिनभर फुर्सत में रहती हो…”

तुम्हारा क्या थकना…”

ज़रा बाहर निकल कर देखो दुनिया क्या है…”

यह बातें छोटे ताने नहीं, एक महिला के आत्मसम्मान को धीरे-धीरे तोड़ने वाले हथियार हैं। कई बार यह मानसिक उत्पीड़न शादी के शुरू में नहीं दिखता, लेकिन सालों बाद वही महिला डिप्रेशन, anxiety, isolation में जी रही होती है, बिना किसी को बताए। उसकी सबसे बड़ी बीमारी यही होती है कि उसे कोई बीमारी समझता ही नहीं।

5. समाज का दोहरा चरित्र: पहले रोकते हैं, फिर दोष देते हैं

जब कोई महिला शादी के बाद कहे —मैं अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती हूं”

तो जवाब मिलता है — “अब घर सम्भालो”

जब वही महिला कुछ साल बाद कहे —

मुझे अब नौकरी करनी है”

तो जवाब मिलता है — “अब क्या ज़रूरत है?”

और जब वो आर्थिक रूप से निर्भर होती है तो कहा जाता है — “तुम कुछ करती क्यों नहीं?”

ये समाज पहले महिलाओं को रोकता है, फिर उन्हीं पर उंगली उठाता है। ये सिर्फ़ क्रूरता नहीं ये योजनाबद्ध अपमान है।

6. विधवा और तलाकशुदा महिलाएं — जो समाज के ‘दर्दनाक मज़ाक’ का हिस्सा बन चुकी हैं

जब किसी महिला का पति गुजर जाता है, या शादी टूट जाती है तो समाज सबसे पहले उसकी “हँसी” को छीनता है। उसे बार-बार याद दिलाया जाता है कि —

अब तुम अकेली हो”

अब तुम्हें संभल कर चलना होगा”

अब ज़्यादा हँसना मत, लोगों को गलत लगेगा”

उसे अब एक इंसान नहीं, ‘हदों में बंधी हुई विधवा/तलाकशुदा’ माना जाता है। अगर वो दोबारा प्यार करे, तो उस पर उंगली उठती है। अगर वो अकेली रहे, तो उसे दया की नज़र से देखा जाता है। कोई उसे बराबरी का इंसान नहीं मानता। जो महिला कभी अपने पूरे परिवार की रीढ़ थी अब वो समाज की नज़र में बस एक अधूरी कहानी बन जाती है।

7. घरेलू महिलाएं सिर्फ़ खाना नहीं बनातीं — वो रिश्ते, घर, संस्कार और समाज गढ़ती हैं

आपने कभी गौर किया है?

अगर घर में बच्चा संस्कारी है — तो कहा जाता है, “माँ ने अच्छी परवरिश दी”

अगर पति समाज में सफल है — तो कहा जाता है, “बीवी ने साथ निभाया”

लेकिन फिर वही महिला जब खुद के लिए इज्ज़त मांगे तो कहा जाता है — “तुमने किया ही क्या है?”

ये कैसा समाज है जो अपनी सफलता का श्रेय उसी को देता है, जिसे कभी सम्मान नहीं देता?

 समाधान: अब वक्त सिर्फ़ समझने का नहीं, सुधार करने का है

अब बहुत हो गया। अब वक्त है कि हम घरेलू महिला शब्द को ‘बेकार’ की श्रेणी से निकालें,और उसे सम्मान की कुर्सी पर बिठाएं।

क्या किया जाना चाहिए?

घरेलू महिलाओं के लिए पेंशन योजना लागू होनी चाहिए।

उनके लिए mental health support line होनी चाहिए — जहां वो चुपचाप बात कर सकें।

उनके बच्चों और पति को sensitization training मिले — ताकि परिवार में बराबरी आ सके।

औरत की कमाई से नहीं, उसके योगदान से इज्ज़त मापना सिखाया जाए।

फिल्मों, किताबों, पाठ्यक्रमों में घरेलू महिलाओं को ताक़तवर, निर्णायक और बुद्धिमान दिखाया जाए।

आख़िर में — एक औरत जो चुप है, इसका मतलब ये नहीं कि वो टूटी हुई है वह औरत जो घर में चुपचाप सबकी थाली भरती है जरूरी नहीं कि उसके अपने हिस्से की रोटी पूरी हो। वह औरत जो हर दिन बच्चों को स्कूल भेजती है जरूरी नहीं कि किसी ने उसे कभी स्कूल भेजा हो। वह औरत जो सबका हौसला बढ़ाती है जरूरी नहीं कि किसी ने उसे कभी थाम कर कहा हो:

तुम बहुत क़ीमती हो।”

अब वक्त है, हम उस औरत से नज़र मिलाकर कहें —

तुम सिर्फ़ हमारी मां, पत्नी या बहन नहीं हो — तुम हमारी रीढ़ हो। और तुम्हारा होना ही हमारी असल ताक़त है।”

खुशबू अख्तर

प्रधान संपादक (पल पल न्यूज़)

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