AI युग: स्कूल पुराना, सवाल नए, समय कम..
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AI युग: स्कूल पुराना, सवाल नए, समय कम..


प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग और AI की मदद से चमकाई गई डोमेन एक्सपर्टीज़ यक़ीनन ज़रूरी हैं, लेकिन इसके साथ ही डेटा लिटरेसी भी उतनी ही अहम है। एक चार्ट या ग्राफ़ को पढ़ने, उसके बुनियादी फ़ॉर्मूलों पर सवाल उठाने, और यह पहचानने की क्षमता कि कब कोई आंकड़ा जानकारी देने के बजाय गुमराह करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। 

इसी तरह सिस्टम्स थिंकिंग भी ज़रूरी है: यह समझना कि किसी संगठन के एक हिस्से में AI के ज़रिए लिया गया फ़ैसला उससे जुड़े बाक़ी तमाम सिस्टम्स में किस तरह लहरें पैदा करता है। ये कोई छोटी-मोटी स्किल्स नहीं हैं; ये उस पेशेवर वर्ग की बुनियादी महारतें हैं जो 2030 के दशक में संस्थानों की बागडोर संभालेगा।

इस टाइमलाइन पर पूरी संजीदगी और ध्यान से गौर कीजिए, क्योंकि यह अति महत्वपूर्ण है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की 'फ़्यूचर ऑफ़ जॉब्स रिपोर्ट 2025' ने 2030 को वह साल तय किया है जब तक 92 मिलियन नौकरियां ख़त्म हो चुकी होंगी और 170 मिलियन नए अवसर पैदा हो चुके होंगे। अर्थात वह साल जब यह पूरी उथल-पुथल बड़ी हद तक पूरी हो चुकी होगी। भारत में जो छात्र इस समय दसवीं कक्षा में है, वह 2028-29 के आसपास अपना ग्रेजुएशन पूरा करेगा और ठीक उसी ऐतिहासिक मोड़ पर नौकरी के बाज़ार में क़दम रखेगा। वह इस बदलाव को किसी दर्शक की तरह किनारे से नहीं देख रहा होगा; वह अपनी पहली नौकरी के इंटरव्यू में ऐन इस बदलाव के तूफ़ान के बीचोंबीच खड़ा होगा।

इसी रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक वैश्विक वर्कफ़ोर्स के 59 प्रतिशत हिस्से को बड़े पैमाने पर दोबारा ट्रेनिंग की ज़रूरत होगी—और उनमें से लगभग 120 मिलियन कर्मचारी मध्य-वधि में बेरोज़गार होने के ख़तरे से जूझ रहे हैं क्योंकि इस बात का डर है कि उन्हें समय रहते यह ट्रेनिंग नहीं मिल सकेगी। मैकिन्ज़ी ग्लोबल इंस्टीट्यूट की रिसर्च बताती है कि 2030 तक मौजूदा काम के घंटों के 30 प्रतिशत तक के काम ऑटोमेटेड हो सकते हैं—एक ऐसा रुझान जिसे जेनरेटिव AI ने बेहद तेज़ कर दिया है—और इसकी सबसे करारी चोट दफ़्तरी, क्लेरिकल, डेटा प्रोसेसिंग और एंट्री-लेवल के तकनीकी पदों पर पड़ेगी जहाँ ग्रेजुएट छात्र ऐतिहासिक रूप से सबसे पहले क़दम रखते आए हैं। ये किसी दूरदराज़ के भविष्य की चेतावनियाँ नहीं हैं। उस छात्र के लिए जो आज दसवीं या ग्यारहवीं में है, 2030 सिर्फ़ चार साल की दूरी पर है। बारहवीं का जो छात्र इस साल बोर्ड की परीक्षा दे रहा है, वह तब तक अपनी दूसरी नौकरी के रास्ते तलाश कर रहा होगा।

सही हुनर हासिल करने का यह दरवाज़ा—इससे पहले कि जॉब मार्केट इस बदलाव को पूरी तरह अपने अंदर समेट ले—इस समय स्पष्ट रुप से खुला है। लेकिन यह उतनी ही तेज़ी से बंद भी हो रहा है। वे छात्र जो अगले दो से तीन वर्षों में क़दम उठाएंगे, वे कोई "अर्ली अडॉप्टर्स" नहीं कहलाएंगे। वे, इस पड़ाव पर, "सही समय पर पहुँचने वाले" माने जाएंगे। जो लोग इस इंतज़ार में बैठे हैं कि उनके कॉलेज का सिलेबस इस बदलाव का साथ देगा, उन्हें शायद तब होश आए जब सिलेबस तो उन तक पहुँच जाए, मगर गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म से छूट चुकी हो!



पॉलिसी, हक़ीक़त, और उनके बीच की खाई

शैक्षणिक सत्र 2026-27 से, सीबीएसई ने तीसरी से आठवीं कक्षा तक के लिए 'कंप्यूटेशनल थिंकिंग' और 'आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस' को एक अनिवार्य विषय बना दिया है—यह कोई ऑप्शनल सब्जेक्ट नहीं है, कोई पायलट प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि देश भर के हर मान्यता प्राप्त स्कूल के लिए एक ज़रूरी शर्त है। आठ साल के बच्चे अब राष्ट्रीय शिक्षा नीति और नेशनल करिकुलम फ़्रेमवर्क 2023 के तहत बाक़ायदा एल्गोरिद्म के अंदाज़ में सोचना सीख रहे हैं।

यह पॉलिसी बिल्कुल सही और समय की ज़रूरत है। लेकिन जिस चीज़ से इसका सामना होता है, वह है बुनियादी ढांचा। सरकार के 'UDISE+' आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत के सिर्फ़ 57.2 प्रतिशत स्कूलों में चालू हालत में कंप्यूटर मौजूद थे। 2024-25 में यह संख्या सुधरकर 64.7 प्रतिशत हो गई है—जो कि एक असली प्रगति है—लेकिन इसका अब भी यही मतलब है कि भारत के एक-तिहाई से ज़्यादा स्कूलों को उस हार्डवेयर के बिना AI की शिक्षा देने को कहा जा रहा है जिस पर यह शिक्षा दी जानी है! जिन राज्यों में शिक्षक-छात्र अनुपात लगातार 40:1 से ऊपर रहता है—जो कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तय 30:1 के लक्ष्य से कहीं ज़्यादा है—वहाँ व्यक्तिगत और तकनीक पर आधारित पढ़ाई का विचार बेहतरीन हालात में भी एक हसीन ख़्वाब से ज़्यादा कुछ नहीं है।

पॉलिसी के इरादों और क्लासरूम की हक़ीक़त के बीच की यह खाई निराशा की कोई वजह नहीं है; असल में यह उस मसले की ऐन परिभाषा है जिसे हल करने की ज़रूरत है। कम संसाधनों वाले स्कूलों के छात्रों के लिए, अपनी मदद आप के तहत डिजिटल शिक्षा—दीक्षा पोर्टल के ज़रिए, मुफ़्त ऑनलाइन कोर्स के ज़रिए, और उपलब्ध किसी भी इंटरनेट कनेक्शन के ज़रिए—तब तक सबसे भरोसेमंद पुल बन सकती है जब तक कि बुनियादी ढांचा इस कमी को पूरा नहीं कर लेता। वे छात्र जो सिस्टम के इंतज़ार में बैठे बिना, ख़ुद इस खाई को पाट लेते हैं, ये ऐन वही नौजवान हैं जिन्हें नौकरी देने के लिए कल की कंपनियाँ एक-दूसरे से होड़ लगा रही होंगी।

स्रोत: सीबीएसई सीटी एंड एआई करिकुलम गाइडलाइंस 2026-27, cbse.gov.in; UDISE+ 2023-24 और 2024-25, शिक्षा मंत्रालय; टाइम्स ऑफ़ इंडिया, शिक्षकों की कमी और पीटीआर का विश्लेषण, 2025



इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में जो बुनियादी सवाल है, वह यह नहीं है कि AI आपका साथी है या दुश्मन। यह नज़रिया तो इस ग़लतफ़हमी पर टिका है कि आप एक जगह स्थिर खड़े हैं जबकि AI तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। असली सवाल तो यह है कि जब तक यह तकनीक आपके स्थान तक पहुँचेगी, तब तक आप किस तरह के इंसान बन चुके होंगे?

ज़ैनब के पिता की कहानी अभी समाप्त नहीं हुई है। एक ऐसा पत्रकार जो वर्षों की मेहनत से अपने भरोसेमंद स्रोत बनाना जानता है, जो यह भांप सकता है कि कब किसी मंत्री का जवाब सवाल का जवाब नहीं बल्कि असली मसले से ध्यान भटकाने की कोशिश है, जो यह समझता है कि असली ख़बर कभी वह नहीं होती जो प्रेस रिलीज़ में लिखी होती है—उस इंसान का विकल्प कोई वायर सर्विस हरगिज़ नहीं हो सकती, चाहे वह कितनी ही तेज़ी से ख़बरें क्यों न फ़ाइल कर ले। उनसे अब जिस चीज़ की माँग की जा रही है, वह पहले से कहीं ज़्यादा कठिन है: यह कि वे पहले से कहीं ज़्यादा स्पष्ट रूप से मानवीय समझ और असाधारण, अपरिहार्य निर्णय-क्षमता का प्रदर्शन करें, जिसकी उन्हें पहले कभी इतनी ज़रूरत नहीं पड़ी थी। यह एक नया मोड़ है, सफ़र का अंत नहीं!

भारत लगभग 1.5 अरब लोगों का देश है, जो दुनिया में सबसे कम उम्र और युवा आबादी है, जहाँ AI में महारत रखने वाले शुरुआती करियर के टेक टैलेंट का सबसे बड़ा जमावड़ा मौजूद है, और एक ऐसी सरकार है जिसने आठ साल की उम्र से ही AI की शिक्षा को अनिवार्य क़रार दे दिया है। बुनियादी ढांचे में नाइंसाफ़ी और असंतुलन ज़रूर है, मगर अवसरों में हरगिज़ नहीं!

वे छात्र जो यह तय करेंगे कि यह तकनीक भारत में क्या रूप लेगी—यह किसकी सेवा करेगी, यह किसके पक्षपातों को बढ़ावा देने के बजाय उन्हें सुधारेगी, और इसे किन मसलों को हल करने के काम में लगाया जाएगा—वे छात्र अभी स्कूलों से पास-आउट भी नहीं हुए हैं।

उनमें से कुछ शायद ठीक इसी पल ये पंक्तियाँ पढ़ रहे हैं!

इरफ़ान वहीद

रिसर्च स्कॉलर एवं भाषाविद, नई दिल्ली



Sources: 

  • World Economic Forum, Future of Jobs Report 2025 (weforum.org); WEF, "Why the AI Economy Demands We Rethink Work as Livelihood," 2026 (weforum.org)

  • McKinsey Global Institute, "Generative AI and the Future of Work in America," 2023 — 30% automation of work hours by 2030 (mckinsey.com); CBSE CT & AI Curriculum Guidelines 2026–27 (cbse.gov.in)

  • NDTV, CBSE AI curriculum coverage; UDISE+ 2023–24 and 2024–25, Ministry of Education (The Hindu, Times of India); Periodic Labour Force Survey 2023–24, literacy data (Economic Times, Firstpost)

  • Times of India, teacher shortage and PTR analysis, 2025; Deloitte Global Gen Z and Millennial Survey 2026, India edition (deloitte.com); Deloitte India, "From Learning to Application," May 2026; Nasscom AI skill penetration data via Coursera

  • Quess Corp India AI Workforce Analysis 2026; Nasscom-McKinsey AI talent projection via Times of India; Economic Times / CII AI salary and jobs data 2026

  • India Today / Indian Express, Gen Z employment anxiety survey, 2025; NDTV, tech layoffs first half 2026; Nasscom-BCG GenAI and gender survey, 2024 (Forbes India)

  • Feminism in India, "Algorithmic Inequalities," February 2026; arxiv.org, "Evaluation of Fairness in Indian Contexts," 2025.



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