लज्जा : इस्लाम द्वारा स्त्री को दिया हुआ बहुमूल्य गहना
बीते दिनों एक सामाजिक माध्यम देखते समय एक वीडियो पर मेरी उंगली रुक गई। सहज मन में आया, “देखते हैं, क्या है इसमें?”
वीडियो में सड़क किनारे दो छोटी बच्चियाँ खड़ी थीं। दोनों अपना गृहकार्य याद करने में मग्न थीं। उनकी वेशभूषा से ऐसा महसूस हो रहा था कि वे मुस्लिम परिवार से हैं। उनकी उम्र भी अधिक नहीं थी। शायद दस वर्ष से भी कम।
अचानक एक बच्ची का ध्यान गया कि कोई उनका चित्रण कर रहा है। उसने तुरंत अपनी सहेली को इसकी जानकारी दी। दोनों ने कैमरे की ओर देखा और क्षण भर की भी देरी किए बिना सिर पर का दुपट्टा ठीक करते हुए चेहरे पर ले लिया। वे कुछ भी बोले बिना शांतिपूर्वक वहाँ से चली गईं।
उन्होंने कुछ भी नहीं कहा, लेकिन उनका मौन बहुत कुछ कह गया।
उस छोटी-सी क्रिया में उनके घर के संस्कार, मन की लज्जाशीलता और अपनी प्रतिष्ठा की जागरूकता दिखाई दी।
इस्लाम में हया (लज्जाशीलता) का अर्थ केवल लज्जित होना नहीं है। हया का अर्थ है शालीनता, आत्मसंयम, अपनी प्रतिष्ठा के प्रति सतर्कता और अल्लाह के सामने अपनी जवाबदेही का एहसास।
पैगंबर मुहम्मद (सल्ल.) ने बताया, “हया ईमान का एक हिस्सा है।” (सहीह अल-बुखारी, सहीह मुस्लिम)
इसलिए लज्जा कमजोरी नहीं है। वह स्त्री को पीछे रखने वाली चीज नहीं है। इसके विपरीत, अपनी सीमाओं को जानकर उन्हें सुरक्षित रखने की सतर्कता ही हया है। लाखों की भीड़ में भी हया वाली स्त्री आसानी से पहचानी जा सकती है। उसके सिर पर केवल दुपट्टा नहीं होता, उसके व्यक्तित्व पर हया का मुकुट होता है।
पर्दे के बारे में समाज में कई गलतफहमियाँ पाई जाती हैं। इस्लाम ने स्त्री को चार दीवारों के भीतर बंद करके रखने को नहीं कहा है। स्त्री बाजार नहीं जा सकती, बाहर घूम नहीं सकती, शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकती, डॉक्टर या पायलट नहीं बन सकती, पर्दे का अर्थ यह नहीं है।
यदि स्त्री को चार दीवारों के भीतर ही रखना होता, तो पर्दे की आवश्यकता ही क्या थी?
पर्दे का उद्देश्य स्त्री को दुनिया से दूर रखना नहीं, बल्कि बाहरी दुनिया में रहते हुए उसकी शालीनता, प्रतिष्ठा और मर्यादा को सुरक्षित रखना है। वह शिक्षा प्राप्त कर सकती है, अपनी क्षमता के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर सकती है और समाज के विकास में योगदान दे सकती है। लेकिन उसकी वेशभूषा और व्यवहार में इस्लामी शालीनता होनी चाहिए।
पर्दा बंधन नहीं, लज्जा के साथ जीने की शिक्षा है।
कुरआन ने लज्जाशीलता और निगाहों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल स्त्री पर नहीं डाली है।
अल्लाह सबसे पहले मोमिन पुरुषों से कहता है, “मोमिन पुरुषों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें और अपनी शर्मगाहों की हिफाजत करें।” (सूरह- 24:30)
इसके बाद मोमिन स्त्रियों को संबोधित करते हुए कहा गया है,
“और मोमिन स्त्रियों से कहो कि वे अपनी निगाहें नीची रखें, अपनी शर्मगाहों की हिफाजत करें और अपनी शोभा प्रकट न करें...”
(सूरह -24:31)
इससे स्पष्ट होता है कि शालीनता स्त्री और पुरुष दोनों की जिम्मेदारी है। पर्दा केवल सिर पर लिए गए वस्त्र का नाम नहीं है। वह पहले मन में पैदा होता है, फिर व्यवहार में दिखाई देता है और उसके बाद वेशभूषा में व्यक्त होता है।
वस्त्र शालीन हो लेकिन निगाहों में संयम न हो, बोलने में मर्यादा न हो और व्यवहार में शालीनता न हो तो पर्दे का व्यापक अर्थ अधूरा रह जाता है। इसलिए सच्चा पर्दा शरीर के चारों ओर के वस्त्र से शुरू होकर व्यक्तित्व के चारों ओर की मर्यादा तक पहुँचता है।
उन दो बच्चियों को शायद पर्दे के बारे में बड़ी-बड़ी परिभाषाएँ मालूम न हों, लेकिन उचित अवसर पर स्वयं को ढकने की जागरूकता उनके मन में थी। यही संस्कारों की ताकत है। बच्चों को संस्कार केवल किताबों से नहीं मिलते। घर का वातावरण, माता-पिता का व्यवहार और रोज़ की छोटी-छोटी सीख उनके मन पर अंकित होती रहती हैं।
उन बच्चियों ने कैमरा देखते ही दुपट्टा चेहरे पर ले लिया, यह उनके माता-पिता द्वारा दिए गए पालन-पोषण की एक छोटी-सी गवाही लगती है। ऐसे संस्कारों के लिए बड़े-बड़े भाषणों की आवश्यकता नहीं होती। उचित अवसर पर की गई छोटी-सी क्रिया ही घर के मूल्यों की पहचान करा देती है।
आज बाहरी सुंदरता का प्रदर्शन, अत्यधिक दिखावा और स्वयं की ओर ध्यान आकर्षित करने की प्रवृत्ति को कई बार आधुनिकता और फैशन के नाम पर स्वीकार किया जाता है।
कुरआन मोमिन स्त्रियों को अपनी शोभा अनावश्यक रूप से प्रकट न करने का मार्गदर्शन करता है। इसलिए बेपर्दगी को केवल फैशन या आधुनिकता मानने से पहले उसे इस्लामी मूल्यों के दृष्टिकोण से देखना आवश्यक है। इस्लाम स्त्री की सुंदरता को नकारता नहीं, वह उसे शालीनता और मर्यादा की सीमा देता है।
सच्ची प्रतिष्ठा महंगे कपड़ों में नहीं होती, आभूषण, महंगे वस्त्र या बाहरी दिखावा मनुष्य की वास्तविक कीमत तय नहीं करते। सच्ची प्रतिष्ठा हया, चरित्र और शालीनता में होती है। हया कोई पुरानी सोच नहीं है। वह स्त्री के व्यक्तित्व की कमजोरी नहीं है। अपनी प्रतिष्ठा की जागरूकता रखते हुए अपने मूल्यों के अनुसार जीने का सामर्थ्य ही लज्जा है।
कितनी भी सामाजिक विघटनकारी शक्तियाँ प्रयास करें, फिर भी जिन बच्चियों के मन में ईमान और हया के संस्कार जड़ें जमा चुके हैं, उनसे इन मूल्यों को आसानी से छीना नहीं जा सकता। उनके सिर पर केवल दुपट्टा नहीं होता, वह हया का मुकुट होता है।
उन बच्चियों ने किसी को सीख नहीं दी, कोई भाषण नहीं दिया। उन्होंने केवल कैमरा देखा, दुपट्टा चेहरे पर लिया और शांतिपूर्वक वहाँ से चली गईं। कभी-कभी शब्दों की आवश्यकता नहीं होती। संस्कार व्यवहार से बोलते हैं। हया व्यवहार से दिखाई देती है और पर्दा उस हया का दृश्य रूप बन जाता है। यही उन दो छोटी बच्चियों ने अपने मौन से दी हुई सुंदर सीख है।
परविन खान
पुसद, महाराष्ट्र