मैं भी किसी की उम्मीद हूं
पहाड़ों के बीच बसे एक छोटे से गांव में बारह साल का एक लड़का रहता था जिसका नाम था आरव।
आरव को आसमान से बहुत प्यार था। हर रात वह अपनी छत पर लेटकर तारों को देखता और सोचता, “काश मैं एक दिन ऐसा कुछ करूं कि मेरी वजह से किसी की ज़िंदगी में रौशनी आ जाए।”
लेकिन गांव के लोग उसकी बात सुनकर हंसते थे। और कहते थेः-
“पहले अपनी कक्षा में अच्छे नंबर तो ले आओ, फ़िर दुनिया बदलने के सपने देखना!”
आरव पढ़ाई में ठीक था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी परेशानी थी कि वह जल्दी हार मान लेता था। कोई काम पहली बार में ना हो, तो उसे लगता कि शायद वह उस काम के लायक ही नहीं है।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसे पुराने बरगद के नीचे एक छोटी सी दुकान दिखाई दी। दुकान पर एक बूढ़ी महिला बैठी थीं। उनके सामने कांच की छोटी-छोटी बोतलें रखी थीं। हर बोतल में हल्की सुनहरी रौशनी चमक रही थी।
आरव ने हैरानी से पूछा, “दादी, क्या इन बोतलों में तारे हैं?”
बूढ़ी महिला मुस्कुराईं और बोलीं – “हां, लेकिन इन्हें खरीदने के लिए पैसे नहीं, हिम्मत चाहिए।”
“मुझे एक सितारा चाहिए!” आरव तुरंत बोला।
दादी ने उसे एक खाली बोतल देते हुए कहा, “इसे अपने पास रखो। जब भी तुम किसी की मदद करोगे, कोई नई चीज़ सीखोगे या डर के बावजूद सही काम करोगे, इसमें एक सितारा चमकेगा। लेकिन याद रखना – दूसरों को छोटा दिखाकर हासिल की गई चमक इसमें कभी नहीं आएगी।”
आरव बोतल लेकर घर आ गया। उसने बहुत कोशिश की कि उसमें सितारा चमक जाए। उसने किताबें खोलीं, छत पर आसमान देखा और यहां तक कि आईने के सामने खड़े होकर खुद को बहादुर भी कहा। मगर बोतल खाली ही रही। अगले दिन स्कूल में विज्ञान प्रदर्शनी की घोषणा हुई। विषय था – “मेरे सपनों का भविष्य।”
आरव ने सोचा कि वह ऐसा उपकरण बनाएगा जिससे बिजली जाने पर भी गांव की गलियों में रौशनी रहे। उसके गांव में अकसर बिजली चली जाती थी और रात में बुज़ुर्गों तथा बच्चों को चलने में परेशानी होती थी।
उसने पुराने टॉर्च, बेकार तार, एक छोटी सौर-पट्टिका और टूटी खिलौना गाड़ी के पहिए इकट्ठे किए। तीन दिन तक कोशिश करता रहा, लेकिन उसका मॉडल बार-बार बंद हो जाता।
गुस्से में उसने सारे सामान को एक ओर फेंक दिया।
“मैं नहीं कर सकता! कुछ लोग ही विशेष होते हैं, मैं उनमें से नहीं हूं।” वह रोते हुए बोला।
तभी उसकी छोटी बहन मीरा वहां आई। उसने चुपचाप बिखरा सामान उठाना शुरु कर दिया।
आरव ने पूछा, “तुम मेरी मदद क्यों कर रही हो? यह तो बेकार है।”
मीरा ने मासूमियत से जवाब दिया, “भैया, अगर पहली बार में सब हो जाता, तो सीखने की ज़रुरत ही क्या थी?”
उसकी बात आरव के दिल में उतर गई।
उसने फ़िर से काम शुरु किया। इस बार जब मॉडल खराब हुआ, तो उसने उसे फेंकने के बजाय देखा कि गलती कहां हुई है। उसने अपने विज्ञान के शिक्षक से सलाह ली, पुस्तकालय जाकर किताबें पढ़ीं और अपने दोस्त कबीर से तार जोड़ने का सही तरीका सीखा।
कबीर पढ़ाई में बहुत अच्छा नहीं था, लेकिन उसे बिजली के छोटे उपकरण ठीक करना आता था। आरव ने पहली बार समझा कि हर इंसान के पास कोई ना कोई ऐसी खूबी होती है, जो दूसरों के पास नहीं होती।
आखिरकार, प्रदर्शनी का दिन भी आ गया।
ऑरव का मॉडल मंच पर रखा गया। निर्णायकों ने स्विच दबाया। एक पल के लिए रौशनी जली, फ़िर पूरा मॉडल बंद हो गया।
कुछ बच्चे हंस पड़े।
आरव का चेहरा लाल हो गया। उसकी आंखों में आंसू भर आए। वह चाहता था कि वहां से भाग जाए।
तभी उसे अपनी बोतल याद आई।
उसने जेब से बोतल निकाली। वह अब भी खाली थी।
आरव ने गहरी सांस ली और निर्णायकों से कहा, “मेरा मॉडल अभी पूरी तरह सफ़ल नहीं हुआ है। लेकिन मैंने इससे सीखा है कि समस्या कहां आती है। मैं इसे सुधारुंगा और अगर मुझे दोबारा मौका मिला, तो मैं इसे सचमुच काम करने लायक बनाऊंगा।”
उसने पहली बार अपनी असफ़लता छिपाने के बजाय उसे स्वीकार किया था।
घर लौटते समय रास्ते में तेज़ बारिश शुरु हो गई। गांव की बिजली चली गई। सड़क किनारे एक बुज़ुर्ग व्यक्ति फिसलकर गिर गए। आसपास अंधेरा था और लोग उन्हें देख नहीं पा रहे थे।
आरव ने अपना टॉर्च निकाला, लेकिन उसकी बैटरी लगभग खत्म थी। उसे अचानक अपने मॉडल की सौर-पट्टिका याद आई। उसने उसे टॉर्च की बैटरी के साथ जोड़ने का एक अस्थायी तरीका आज़माया। कुछ देर प्रयास के बाद टॉर्च फ़िर जल उठा।
उसने बुज़ुर्ग के चेहरे पर रौशनी की, दूसरे लोगों को बुलाया और उन्हें सुरक्षित घर पहुंचाने में मदद की।
जब आरव घर पहुंचा, तो उसने जेब से बोतल निकाली।
इस बार उसमें एक नन्हा सा सुनहरा सितारा चमक रहा था।
आरव की आंखें फैल गईं। “यह सचमुच चमक रहा है।”
अगली सुबह वह दौड़ता हुआ बरगद के नीचे पहुंचा, लेकिन वहां कोई दुकान नहीं थी, ना बोतलें थीं, ना बूढ़ी महिला। बस पेड़ के तने पर एक छोटा सा कागज़ चिपका था। उस पर लिखा था –
“जिस दिन तुम दूसरों की रौशनी बनना सीख जाओगे, उस दिन तुम्हें सितारे ढूंढने के लिए आसमान की ओर देखने की ज़रुरत नहीं पड़ेगी।”
आरव देर तक उस कागज़ को देखता रहा।
कुछ महीनों बाद उसने अपने शिक्षक और दोस्तों की मदद से अपने सौर-ऊर्जा वाले मॉडल को बेहतर बनाया। गांव की पंचायत ने भी उसकी योजना में रुचि दिखाई। धीरे-धीरे गांव की कुछ अंधेरी गलियों में सौर लाइटें लगाई गईं।
आरव को कोई बहुत बड़ा पुरस्कार नहीं मिला। अख़बार में उसकी तस्वीर भी नहीं छपी।
लेकिन एक रात उसने देखा कि एक छोटी बच्ची बिना डरे रौशनी वाली गली से अपने घर की ओर जा रही थी। उसके हाथ में किताब थी और चेहरे पर मुस्कान।
आरव ने अपनी पुरानी बोतल निकाली। उसमें अब भी कई सितारे चमक रहे थे।
उसने उनमें से एक सितारे को ध्यान से देखा और मुस्कुराकर कहा, “मैं समझ गया, सितारे जेब में नहीं रखे जाते। उन्हें अपने कामों से जगाया जाता है।”
उस रात आसमान में तारे हमेशा की तरह चमक रहे थे।
लेकिन आरव को पहली बार लगा कि उनमें से एक सितारा उसके भीतर भी है।
और वह सितारा किसी पुरस्कार, किसी तारीफ़ या किसी की अनुमति का इंतज़ार नहीं कर रहा था।
वह बस इतना चाहता था कि आरव कभी कोशिश करना बंद ना करे।
उस दिन आरव समझ गया कि बड़ा बनने के लिए पूरी दुनिया की तालियां ज़रुरी नहीं होती। कभी-कभी एक छोटे से बच्चे का विश्वास ही हमें वह इंसान बना देता है, जो हम हमेशा से बनना चाहते थे।
क्योंकि दुनिया बदलने की शुरुआत हमेशा किसी बड़े अविष्कार से नहीं होती। कभी-कभी वह एक छोटे से दिल में जगाए गए विश्वास से होती है।
“दुनिया में सबसे खूबसूरत सितारा वह नहीं, जो आसमान में चमकता है, बल्कि वह है, जो किसी दूसरे के अंधेरे में रास्ता दिखाता है।”
डॉ. श्वेता जैन
असिस्टेंट प्रोफ़ेसर, राजस्थान