सच्ची दोस्ती
"मै आ गई माँ"
सोनम ने स्कूल से आते ही माँ को उत्साह से पुकारा और माँ उसके स्वर की मिठास को समझ गई, फिर माँ के गले में बाहें डाल कर सोनम पूरा हाल बयान करने लगी।
"माँ, पता है अब हम सभी सहेलियों के पास एक जैसा पेंसिल बॉक्स हो गया है।"
वह उस बॉक्स के बारे में बता रही थी जिसको ख़रीदने के लिए वह 4-5 दिन से ज़िद कर रही थी और माँ उसे यह कह कर टाल रही थी कि “बिटिया, तुमने अभी कुछ दिनों पहले ही अपनी पसंद से पेंसिल बॉक्स लिया था, अभी तुमको क्या ज़रूरत है।“
लेकिन सोनम मुँह बना कर कहती कि “माँ, मेरी सभी सहेलियों ने उसी तरह का लिया है तो मैं भी वैसा ही लूँगी।“
माँ उसे समझाते हुए कहती कि “उनको ज़रूरत होगी तो उन्होंने ले लिया, तुम्हारे पास तो पहले से ही इतना महँगा और तुम्हारी पसंद का बॉक्स है...” पर वह न मानी और अंत में माँ ने हार मानते हुए उसको बॉक्स दिलवा ही दिया। आज उसी की ख़ुशी है सोनम को।
"माँ, हम सब सहेलियों में बहुत अच्छी दोस्ती है, हम सब चीज़ें एक-सी लेती हैं और साथ में ही खेलती हैं।" सोनम उत्सुकता के साथ माँ को बताए जा रही थी। माँ मन ही मन सोच रही थी, 'चलो, एक बॉक्स ही तो है, बिटिया ख़ुश हो गई, पुराना बॉक्स किसी ज़रूरतमंद को दे दूँगी।'
ऐसे ही रोज़ स्कूल से आते ही वही दिन भर की बातें और अपनी सहेलियों की दोस्ती के क़िस्से माँ को सुनाते नहीं थकती। माँ मुस्कुराकर अपनी बिटिया की मासूम बातें सुनती रहती।
फिर एक दिन सोनम ने कहा, "कल मैं लंच में डोनट ले जाऊँगी, मेरी सारी सहेलियाँ लाएँगी।" माँ यह सुनकर बोली, "बिटिया, कल नहीं, फिर कभी दे दूँगी बनाकर। अभी तबियत ठीक नहीं है और बाज़ार से सामान भी लाना होगा डोनट बनाने का।"
यह सुन कर सोनम उदास हो गई और ज़िद करती हुई बोली, "माँ, मुझे चाहिए, आप तो बना देना।" माँ ने तबियत सही न होते हुए भी उसको शांत कराते हुए बोल दिया कि सुबह देख लूँगी। लेकिन सुबह माँ ना उठ सकी और सोनम को बिना डोनट लिए उदास मन के साथ स्कूल जाना पड़ा।
जब लंच का समय आया तो सारी सहेलियों ने डोनट निकाला और साथ बैठ कर एक दूसरे का टिफ़िन देखने लगीं। सोनम ने झिझकते हुए अपना लंच बॉक्स खोला, जिसमें पोहा था। सारी सहेलियाँ एक साथ बोल पड़ीं, "ये क्या लाई हो सोनम... क्या तुम हमारी सहेली नहीं हो?"
सोनम धीरे से बोली, "मेरी माँ बीमार हो गई थीं..." एक सहेली ने थोड़ा इतरा कर बोला, "तो क्या हुआ, मेरी माँ भी बीमार थीं पर मैंने ज़िद की और मना लिया।"
दूसरी सहेली ने बोला, "मैं तो बाज़ार से ही ले आई, लेकिन ले आई... आख़िर को हम सहेलियों को सेम टू सेम करना था ना।"
इसी बीच एक और ने बोला, "जो सेम टू सेम नहीं करेगा, उससे हमारी दोस्ती ख़त्म।"
अब सोनम से रुका न गया, आँखों में आँसू लिए वह चुपचाप वहाँ से आकर क्लास की बेंच पर बैठ गई। उसको मन ही मन अपनी माँ पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा था। बस यही सोचती, क्या हो जाता अगर माँ डोनट बना कर दे देतीं, सब माँ की वजह से हुआ है। अब उसकी हिम्मत न थी उनसे बात करने की... वह छुट्टी तक चुप्पी लिए रही और फिर रूठे मन और ग़ुस्से से भरे दिमाग़ के साथ घर आ गई।
सोनम चुपचाप अपने कमरे में चली गई, अपना सामान अपनी जगह रखा, और पोहा से भरा टिफ़िन किचन में पटका, और कमरे में आकर लेट गई। माँ को सोनम का व्यवहार कुछ अलग लग रहा था लेकिन कुछ कहा नहीं।
जब माँ किचन में खाना लेने गई तो देखा कि टिफ़िन तो पूरा भरा हुआ है। माँ से अब रहा न गया, वह सोनम से पूछ बैठी, "बिटिया, तबियत तो ठीक है? तुमने आज लंच नहीं किया?"
अब क्या था, सोनम जो पहले से भरी बैठी थी, अब फट पड़ी, "सब आपकी वजह से हुआ है, मेरी सारी सहेलियाँ मुझसे नाराज़ हो गईं। क्या हो जाता अगर आप डोनट दे देतीं? उन सब ने मुझसे दोस्ती ख़त्म कर दी, मेरा मज़ाक भी बनाया, सब आपकी वजह से हुआ है..."
जो आँसू इतनी देर से रोके हुई थी, अब माँ के सामने न रोक पाई और फूट-फूट कर रोने लगी। माँ ने जल्दी से मासूम बच्ची को गले लगा लिया। सोनम जब जी भर के रो ली तो उसका मन शांत होने लगा था।
माँ ने भी जल्दी-जल्दी उसको दिलासा देने के लिए वादा कर लिया, "कल पक्का दूँगी डोनट..." जबकि माँ जानती थी कि सोनम को कुछ ख़ास डोनट पसंद नहीं, बस वह सहेलियों के कारण ले जाना चाह रही थी।
फिर कुछ दिन इन्हीं सब खट्टी-मीठी रूठने-मनाने जैसी छोटी-छोटी ज़िद भरी बातों में बीत गया। माँ को अजीब तो लगता, लेकिन अगले पल सोचती, 'अभी तो बचपना है, बड़े होकर सही हो जाएगी।' लेकिन वह यह भी जानती थी कि वह अभी जो कर रही है वही उसकी आदत बन सकती है और ऐसी आदत वालों को बहुत कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सोनम समय के साथ बड़ी होती जा रही थी... कभी एक जैसे कपड़े, कभी जूते, कभी साथ घूमने जाना, हर रोज़ नया कुछ। सोनम और सारी सहेलियाँ एक साथ ट्यूशन भी जाती थीं। ट्यूशन के बाद साथ में काफ़ी समय बिताने लगीं। अब माँ को बहुत चिंता रहने लगी।
वह बस यही सोचती, 'अगर अब सोनम को न रोका तो यह अपने स्वभाव को बिगाड़ने के साथ-साथ दोस्ती का सही अर्थ भी नहीं समझ सकेगी, और न ही अच्छे दोस्त कभी बना पाएगी।'
माँ बस एक अवसर का इंतज़ार कर रही थी, और वह अवसर माँ को जल्दी ही मिल गया। सोनम ने फिर एक फ़रमाइश की, "माँ, एक इंटरनेट वाला गैजेट है जो मेरी सभी सहेलियों के पास है, वो सब ऑनलाइन गेम खेलती हैं साथ में, मुझे भी दिला दो ना माँ।"
अब क्या था, माँ तो पहले से ही मन में कुछ ठान रखा था। माँ ने साफ़ मना कर दिया, "मैं नहीं दिलाऊँगी।"
फिर क्या, सोनम का वही रूप सामने आया, ज़िद और ग़ुस्से से बात मनवानी चाही। माँ को कोई फ़र्क़ न पड़ा। सोनम रोई भी, रूठी भी, लेकिन माँ ने इस बार बिलकुल भी कान न धरा। माँ का यह रूप देख कर सोनम ने रोना-धोना छोड़ दिया। उसको समझ आ गया इससे कोई फ़ायदा न होगा।
लेकिन उसने ज़िद में आकर कह दिया, "अब से मैं स्कूल और ट्यूशन नहीं जाऊँगी," और मन ही मन सोचने लगी अब तो माँ मान जाएगी... पर वह माँ ठहरी, बड़े आराम से माँ ने कहा, "मत जाना।"
अब सोनम माँ के इस स्वभाव से असहज हुई। समझ गई इस बार तो माँ नहीं मानने वाली। उसने स्कूल का मना तो कर दिया लेकिन उसको पता था कि नुक़सान उसी का है, बहुत सारा काम छूट जाएगा। अब क्या कर सकती थी, वह अब अपने कहे से हट तो नही सकती थी।
2 दिन बीत गए, माँ ने एक बार भी पढ़ने की बात न की। अब सोनम को पछतावा होने लगा, लेकिन वह माँ के सामने नहीं जता सकती थी। जब तीन दिन बीत गए, चौथे दिन ख़ुद स्कूल जाने को तैयार हुई और चुपचाप चली गई। हुआ वही जिसका सोनम को डर था, उसका काम बहुत सारा छूट गया। ट्यूशन भी न जाने से वह कुछ समझ भी नहीं पाई।
अब फिर स्कूल से आकर चिंता में डूबी हुई सोनम बस यही सोच रही थी कि इम्तिहान आने वाला है, कैसे होगा... माँ ने उसकी परेशानी भाँप ली। बड़े प्यार से पूछा, "सोनम बिटिया, क्या बात है, किस बात की चिंता है तुमको?" उसने माँ को सारी बात बता दी।
फिर माँ से पूछा, "आप मेरी मदद करवा दोगी क्या काम पूरा करने में?" माँ ने झट से बोला, "बिटिया, तुम शाम में जब ट्यूशन जाना तो अपनी सहेलियों से छूटा हुआ काम माँग लेना, वह तुम्हारी पक्की सहेलियाँ हैं, वो तुम्हारी मदद कर देंगी।" सोनम को भी यह बात सही लगी।
शाम में जब वह ट्यूशन से आई तो सोनम कुछ परेशान लगी। माँ समझ तो गई थी, फिर भी पूछा, "क्या हुआ बिटिया?"
सोनम बोली, "किसी ने भी मुझको अपनी कॉपी नहीं दी।"
माँ ने पूछा, "क्यों नहीं दिया?"
सोनम नीचे सिर किए धीरे से बोली, "किसी का काम नहीं हुआ, कोई अपनी कॉपी नहीं देता, किसी की मम्मी ने मना किया है, क्या-क्या बताऊँ माँ, सबने अलग-अलग बातें कहीं।"
"मतलब किसी ने भी तुम्हारी सहायता नहीं की," माँ ने उदास चेहरे को नज़रअंदाज़ करके बोला।
सोनम ने धीरे से सिर हिला दिया।
माँ ने उसके हाथ पर मोबाइल रख कर बोला, "इसमें तुम्हारी कई सहेलियों के नंबर हैं, तुम चाहो तो उनसे बात करके अपना काम करवा लो।"
सोनम को एक-दो नाम याद आए, उसने कॉल लगाया लेकिन वे भी कहीं व्यस्त होने के कारण उसकी सहायता करने को तैयार न हुईं।
सोनम ने बुझे सुर में बोला, "माँ, मेरी किसी भी सहेली ने सहायता नहीं की।"
अब माँ ने उससे मोबाइल लेकर एक नंबर मिलाया। घंटी बजी, उधर से एक आवाज़ आई, "हेलो सीमा, इतने दिनों बाद तुमको याद आई मेरी! कैसी हो मेरी प्यारी सहेली?"
माँ ने जल्दी से उत्तर दिया, "मैं बिलकुल ठीक हूँ, बस तुमसे एक काम था।"
उधर से फिर आवाज़ आई, "हाँ, बिलकुल बताओ क्या काम है।"
माँ ने कहा, "मेरी बेटी को तुम थोड़ा समय दे दो, वो किसी कारण स्कूल और ट्यूशन न जाने की वजह से कुछ विषयों में पीछे रह गई है और इस बात से काफ़ी परेशान भी है।"
उधर से फिर आवाज़ आई, "अरे, तुम निश्चिंत रहो, मुझे इसके स्कूल का सारा विषय अच्छे से आता है, मैं इसको सबसे आगे कर दूँगी।"
माँ ने धन्यवाद देते हुए कहा, "परंतु तुम भी इतना व्यस्त रहती हो, कैसे समय निकालोगी?"
उधर से माँ को थोड़ा डाँटने के भाव से आवाज़ आई, "कोई सहेली ऐसी भी होती है क्या जो अपनी सहेली के लिए समय ही न निकाल पाए? तुम चिंता न करना, सोनम को मेरे पास भेज देना।"
सोनम इन दोनों की बातें चुप्पी साधे सुन रही थी। माँ ने अपनी कुछ बात करके कॉल बंद कर दी, फिर उसके पास आकर बोली, "बिटिया, दोस्ती बहुत ज़रूरी है पर अच्छे लोगों से, जिनको दोस्ती का अर्थ मालूम हो।
दोस्ती एक दूसरे का ख़याल करके, एक दूसरे की सहायता करके, एक दूसरे की प्रशंसा सुन कर, एक दूसरे के लिए निःस्वार्थ भाव से खड़े रहके, एक दूसरे की कमी को छुपा कर उसको आगे बढ़ने में मदद करने से होती है... सहेलियाँ बनने के लिए एक जैसा दिखना ज़रूरी नहीं, एक दूसरे का ख़याल रखना, एक दूसरे की इज़्ज़त करना ज़रूरी है। एक दूसरे की कठिन समय में की जाने वाली सहायता ही पक्की मित्रता पैदा करती है।"
माँ यह कह कर थोड़ा शांत हुई। फिर एक लंबी साँस ले कर सोनम के सिर पर हाथ फेर कर बोली, "दोस्ती बहुत ज़रूरी है, तुम दोस्त भी अच्छे बना लोगी, लेकिन बिटिया, एक बात का हमेशा ध्यान रखना, वो दोस्त से पहले अच्छी इंसान हो। अगर वो बड़ों का आदर करने वाली, सच बोलने वाली होगी तो तुम भी अच्छे से बहुत अच्छी बनती जाओगी। अगर वो दयाहीन होगी, झूठ बोलने वाली, दूसरों का मज़ाक उड़ाने वाली, तो तुम्हारे अंदर भी ये सब बुरी चीज़ें स्वयं आ जाएँगी। इसका मतलब जैसी दोस्ती होगी, वैसा ही लक्षण तुममें पैदा हो जाएगा।"
माँ कुछ मिनट रुक कर बात आगे बढ़ा कर बोली, "मेरी प्यारी बिटिया, तुम ये सारी ख़ूबियों के साथ रहना ताकि तुम्हारी सहेली कह सके कि मेरी दोस्ती बहुत प्यारी लड़की से हुई है। जो तुम्हारे इस व्यवहार की क़द्र करेगी उसी से पक्की दोस्ती होगी। बाक़ी और सारी सहेलियों की बातें व्यर्थ हैं।"
सोनम को समझ आ गया था कि वह जिस दिशा पर थी वो ग़लत थी। अच्छी बात तो यह है कि उसको माँ ने सही दिशा भी दिखा दी। उसके लिए अब बहुत सरल होता दिख रहा था सब।
शिफ़ा उस्मानी
कोटा, राजस्थान