बचपन बचाना है, भविष्य बनाना है
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बाल दिवस विशेष

बचपन बचाना है, भविष्य बनाना है


बच्चों का भविष्य केवल भाषणों, नारों और उत्सवों से नहीं बदल सकता। इसके लिए सरकार, समाज और परिवार-तीनों को अपनी जिम्मेदारियां ईमानदारी से निभानी होंगी। यदि सरकार योजनाएँ बनाए, लेकिन उनका लाभ जरूरतमंद बच्चों तक न पहुँचे, यदि समाज बच्चों की समस्याओं को देखकर भी अनदेखा करे और यदि परिवार बच्चों की भावनाओं को न समझे, तो बच्चों का उज्ज्वल भविष्य केवल एक सपना बनकर रह जाता है। इसलिए बाल दिवस के अवसर पर हमें इन तीनों की जिम्मेदारियों को समझना और उन्हें पूरा करने के लिए ठोस कदम उठाना होगा। 

1. सरकार की जिम्मेदारी : हर बच्चे को मिले शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान

किसी भी देश की प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन इस बात से होना चाहिए कि वहाँ के बच्चों का जीवन कितना सुरक्षित और खुशहाल है। बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें और आर्थिक विकास तभी सार्थक हैं, जब देश का प्रत्येक बच्चा शिक्षा प्राप्त कर सके, उसे पौष्टिक भोजन मिले और वह बिना किसी डर के अपना बचपन जी सके।

सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराई जाए। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की पर्याप्त व्यवस्था, अच्छी पढ़ाई, स्वच्छ पेयजल, साफ शौचालय और सुरक्षित  वातावरण उपलब्ध हो। गरीब परिवारों के बच्चों को उपलब्ध छात्रवृत्तियों, पाठ्यपुस्तकों और अन्य शैक्षणिक सुविधाओं का लाभ समय पर मिले। आर्थिक तंगी के कारण किसी बच्चे को अपनी पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर न होना पड़े। 

बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण देखभाल की पर्याप्त सुविधा हो। भूखा और कुपोषित बच्चा न तो ठीक से पढ़ सकता है और ना ही उसका संपूर्ण विकास हो सकता है। इसलिए स्कूलों में भोजन की गुणवत्ता, बच्चों के स्वास्थ्य की जाँच और जरूरतमंद परिवारों तक पोषण संबंधी सुविधाएँ पहुँचाने की व्यवस्था हो।

बच्चों को हर प्रकार के शोषण और अत्याचार से मुक्त रखना भी सरकार का कर्तव्य है। बच्चों के साथ होने वाले शारीरिक, मानसिक और यौन शोषण की शिकायतों पर संवेदनशीलता से कार्रवाई होनी चाहिए। बाल संरक्षण से जुड़ी संस्थाओं को प्रभावी ढंग से काम करना चाहिए और पीड़ित बच्चों को सुरक्षा, उचित सहायता तथा न्याय मिलना चाहिए।

सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि बेटियों को शिक्षा और विकास के समान अवसर मिलें, दिव्यांग बच्चों को उनकी जरूरतों के अनुसार सुविधाएँ मिलें, किसी भी बच्चे के साथ जाति, धर्म, लिंग या आर्थिक स्थिति के आधार पर भेदभाव न हो।

2. समाज की जिम्मेदारी : संवेदनशील बनें, मूकदर्शक नहीं


बच्चों का भविष्य बनाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। समाज का प्रत्येक व्यक्ति भी इसके लिए जिम्मेदार है। हम अक्सर बच्चों की समस्याओं पर चर्चा तो करते हैं, लेकिन जब हमारे सामने कोई बच्चा भूखा, असहाय या शोषण का शिकार दिखाई देता है, तो कई बार हम उसे देखकर भी आगे बढ़ जाते हैं।

क्या किसी बच्चे का दर्द देखकर हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती? क्या किसी गरीब बच्चे का शिक्षा से वंचित रहना केवल उसके परिवार की समस्या है? क्या किसी बच्चे को काम करते देखकर हम यह सोचकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं कि यह हमारे घर का बच्चा नहीं है? एक संवेदनशील समाज इन सवालों से मुँह नहीं मोड़ सकता।

यदि हमारे मोहल्ले में कोई बच्चा आर्थिक परेशानी के कारण स्कूल नहीं जा पा रहा है, तो हम उसके परिवार को उचित सहायता और शैक्षणिक सुविधाओं की जानकारी दिलाने में मदद कर सकते हैं। समाज के शिक्षित युवा जरूरतमंद बच्चों को पढ़ाई में सहयोग दे सकते हैं। सामाजिक संस्थाएँ पुस्तकें उपलब्ध कराने, शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और बच्चों को सरकारी योजनाओं से जोड़ने के प्रयास कर सकती हैं। 

समाज की एक बड़ी जिम्मेदारी बच्चों को भेदभाव से मुक्त वातावरण देना है। बच्चों के सामने जाति, धर्म, भाषा और आर्थिक स्थिति के आधार पर किसी का अपमान नहीं करना चाहिए। उन्हें सिखाना चाहिए कि प्रत्येक इंसान सम्मान का अधिकारी है और किसी कमजोर व्यक्ति को सताना बहादुरी नहीं, बल्कि संवेदनहीनता है।

3. परिवार की जिम्मेदारी : बच्चों को केवल सुविधाएँ नहीं, प्यार और संस्कार भी दें

बच्चे का पहला विद्यालय उसका घर होता है और उसके पहले शिक्षक उसके माता-पिता होते हैं। बच्चा अपने आसपास जो देखता है, जो सुनता है और जिस प्रकार का व्यवहार उसके सामने होता है, उससे बहुत कुछ सीखता है। इसलिए बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।

माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बच्चों को खाना, कपड़े और शिक्षा उपलब्ध कराना नहीं है। उन्हें बच्चों की भावनाओं को समझना, उनकी बात सुनना, उनके आत्मविश्वास को बढ़ाना और उन्हें सही दिशा दिखाना भी ज़रूरी है।

आज कई परिवारों में माता-पिता कामकाज और अन्य ज़िम्मेदारियों में इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों के साथ बैठकर बात करने का समय ही नहीं निकाल पाते। बच्चों की हर ज़रूरत पूरी करने के लिए पैसे खर्च किए जाते हैं, लेकिन कभी-कभी उन्हें वह समय और भावनात्मक सहारा नहीं मिल पाता जिसकी उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता होती है।

बच्चों को महँगे खिलौनों से अधिक माता-पिता का साथ चाहिए। उन्हें हर समय उपदेश देने वाले नहीं, बल्कि उनकी बात सुनने वाले माता-पिता चाहिए। उन्हें ऐसा वातावरण चाहिए, जहाँ वे अपनी गलतियाँ स्वीकार कर सकें और अपनी परेशानियाँ बिना डर के बता सकें। 

माता-पिता को बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से नहीं करनी चाहिए। हर बच्चे की क्षमता और रुचि अलग होती है। किसी बच्चे को पढ़ाई में अधिक समय लग सकता है, तो कोई खेल, कला या अन्य गतिविधियों में अच्छा हो सकता है। बच्चों को उनकी क्षमता के अनुसार प्रोत्साहित करना चाहिए।

परिवार का एक और महत्वपूर्ण कर्तव्य बेटा-बेटी में समानता बनाए रखना है। बेटियों की शिक्षा, सुरक्षा और सपनों को उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना बेटों को दिया जाता है। बेटियों पर अनावश्यक पाबंदियाँ लगाने के बजाय उन्हें आत्मविश्वास, सही मार्गदर्शन और आगे बढ़ने के अवसर देने चाहिए।

बच्चों को अच्छे संस्कार देना भी परिवार की जिम्मेदारी है। उन्हें सच बोलना, बड़ों का सम्मान करना, छोटों से प्यार करना, जरूरतमंदों की मदद करना, दूसरों की भावनाओं को समझना और किसी के साथ अन्याय न करना सिखाना चाहिए। ये संस्कार केवल समझाने से नहीं, बल्कि माता-पिता के अपने व्यवहार से भी विकसित होते हैं।


तबस्सुम शेख

पुसद, महाराष्ट्र

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