क्या हर साल रावण वास्तव में जल जाता है?
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समाज

क्या हर साल रावण वास्तव में जल जाता है?


दशहरे की शाम थी, शहर के दशहरा मैदान में जैसे पूरा शहर ही उमड़ आया था। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं पुरुष, हर आयुवर्ग और हर तबके के लोग उस भीड़ का हिस्सा थे। मौका था रावण दहन का। एक ऐसा मौका, जिसके साथ बरसों से यह यक़ीन जुड़ा हुआ है कि आज बुराई पर अच्छाई की विजय होगी।

चारों ओर रौशनी थी, आतिशबाज़ी थी, बच्चों की आँखों में चमक और मैदान के बीचों-बीच दस सिरों वाला रावण अपनी पूरी शान से खड़ा था। फिर आग लगी, देखते ही देखते रावण का पुतला धू-धू करके जलने लगा। ऊँची लपटें उठीं, पटाखे फूटे, शोर हुआ, नारे लगे और भीड़ ने उस आग को बुराई के अंत की तरह देखा। चेहरों पर जोश था, माहौल में जश्न था और हर तरफ़ यही एहसास था- बुराई हार गई, अच्छाई जीत गई।

हर साल यही होता है। रावण जलता है, भीड़ देखती है, तालियाँ बजती हैं और हम मान लेते हैं कि बुराई पर अच्छाई की जीत हो गई।

लेकिन उसी शाम, उसी शहर में, उसी दशहरा मैदान से कुछ दूर किसी चारदीवारी के भीतर कोई महिला चुप बैठी होती है। किसी भी उम्र की हो सकती है वह, शायद किसी के शब्दों से घायल हुई हो, शायद कोई डरी हुई हो, शायद कोई रिश्ते में घुट रही हो, शायद कोई किसी के गलत बर्ताव का शिकार हुई हो, शायद समाज और लोगों के डर से खुद को रोक रही हो या शायद किसी फैसले के लिए अब भी किसी की अनुमति की तलाश में हो।

उसके हिस्से के रावण का कोई पुतला नहीं होता, जिसे आग लगाकर राख किया जा सके। उसके रावण का कोई एक चेहरा नहीं होता। वह रोज़ उसके सामने किसी न किसी शक्ल में खड़ा होता है। कभी पति बनकर, कभी परिवार की पितृसत्तात्मक सोच बनकर, कभी कार्यस्थल के शोषण की शक्ल में, कभी किसी की घूरती हुई निगाह बनकर, कभी रिश्तों के नाम पर लगाई गई पाबंदी बनकर और कभी उस डर के रूप में, जो इतने सालों में उसके भीतर ही घर बना चुका है।

उसका दशहरा नहीं होता, और सवाल यही है—हर साल रावण जलता है, फिर भी महिला अपने हिस्से के रावण आखिर कब तक झेलती रहेगी?

रावण आखिर कौन है? क्या रावण सिर्फ़ वही है जिसके दस सिर हों? क्या बुराई का कोई एक चेहरा होता है? मैं कहूँगी कि शायद नहीं। महिला के लिए रावण कई शक्लों में सामने आता है। कभी दहेज की माँग बनकर, कभी घरेलू हिंसा बनकर, कभी बेटी और बेटे के बीच किए जाने वाले अंतर के रूप में, कभी “लोग क्या कहेंगे” के नाम पर उसकी हर इच्छा का गला घोंटते हुए। 

कभी उसकी आज़ादी की सीमा तय करते हुए, कभी कार्यस्थल पर असहज निगाह, अनचाही टिप्पणी या अनुचित अपेक्षा बनकर, कभी उसका पीछा किए जाने के रूप में, कभी जज़्बाती तौर पर उसे अपने हिसाब से चलाने की कोशिश में, कभी उसके किरदार को उसके कपड़ों, दोस्तों और फैसलों से तौलते हुए, कभी सोशल मीडिया पर उसे निशाना बनाते हुए और कभी शादी के नाम पर उस पर दबाव बनाते हुए।

कभी गालियाँ उसके हिस्से आती हैं, कभी घटिया शब्द। कभी उसके कपड़ों पर सवाल होता है और कभी उसके चाल-चलन पर। कभी उसके हँसने का अंदाज़ तक किसी की चिंता बन जाता है और कभी उसके ख़ामोश रहने को भी उसके खिलाफ़ इस्तेमाल किया जाता है।

ये उस रावण के कुछ चेहरे हैं, जो दिखाई तो देते हैं, लेकिन समाज कई बार उन्हें रावण मानने से ही इनकार कर देता है। क्योंकि हर हिंसा शरीर पर चोट के निशान नहीं छोड़ती। कुछ हिंसा महिला के हौसले पर निशान छोड़ती है। कुछ उसके स्वयं पर भरोसे को धीरे-धीरे खा जाती है। कुछ उसके सपनों को छोटा कर देती है और कुछ उसके भीतर ऐसा डर बैठा देती है कि एक दिन वह स्वयं को ही कटघरे में खड़ा करने लगती है।

यही कारण है कि महिला के हिस्से का रावण पहचानना इतना आसान नहीं है।

अगर हम अस्सी के दशक की महिला से आज की महिला तक के सफ़र को देखें, तो तस्वीर में बहुत कुछ बदला हुआ नज़र आता है। पहले महिला के लिए पढ़ने-बढ़ने के रास्ते सीमित थे। अपने मन की बात कहना, अपना मत रखना, अपने फैसले स्वयं लेना - इन सबको कई जगह उसकी ज़िंदगी का हिस्सा ही नहीं माना जाता था। उसे अक्सर सिखाया जाता था - “घर संभालना सीखो!” और वह घर संभालते-संभालते कई बार खुद को ही संभालना भूल जाती थी।

समय बदला, महिलाएं पढ़ीं, आगे बढ़ीं, नौकरी की, अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाई, अपने पैरों पर खड़ी हुईं। उन्होंने अपने लिए जगह बनाई, और यह बदलाव छोटा नहीं था। इसके पीछे न जाने कितनी पीढ़ियों की मेहनत, कितनी महिलाओं की ख़ामोश लड़ाइयाँ और कितनी आवाज़ों की कीमत थी।

लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है - क्या समाज का वह रावण खत्म हुआ?

मैं कहूँगी - बिल्कुल नहीं।

समय के साथ, रावण ने भी अपना रूप बदल लिया है। आज आर्थिक रूप से स्वतंत्र महिला भी मानसिक और जज़्बाती दबाव झेल रही है। नौकरी करने वाली महिला को भी अपने कार्यस्थल पर असहज परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। पढ़ी-लिखी महिला भी ऐसे रिश्ते में फँस सकती है जहाँ उसकी आवाज़ की कोई कीमत न हो और सोशल मीडिया ने तो उत्पीड़न के कुछ नए रास्ते खोल दिए हैं। 

यानी बदलाव आया है, लेकिन कहानी पूरी नहीं बदली। समय ने महिला के हाथ में डिग्री, नौकरी और मोबाइल तो दे दिया, लेकिन हर जगह अपने फैसले लेने की पूरी आज़ादी अभी भी सवाल बनी हुई है।

घर देर से आए तो सवाल। शादी नहीं करना चाहती तो सवाल। शादी कर ली तो अगला सवाल, बच्चा नहीं हुआ तो सवाल। बच्चा हो गया तो- “नौकरी क्यों करती हो?” नौकरी छोड़ दे तो - “इतनी पढ़ाई किस काम की?” और नौकरी करे तो - “घर कौन संभालेगा?”

अर्थात महिला की ज़िंदगी शुरू होने से पहले ही उसे समाज के तराज़ू पर रखकर तौला जाने लगता है। उसके हिस्से की ज़िंदगी से पहले ही समाज उसके हिस्से के सवाल तय कर देता है।

अब अगर पूछा जाए कि पढ़ी-लिखी और अनपढ़ महिला के लिए रावण अलग है या एक जैसा, तो मेरा जवाब होगा - रावण के चेहरे अलग हो सकते हैं, लेकिन उसकी जड़ एक ही है, वह है असमानता की सोच।

शिक्षा ज़रूरी है, बेहद ज़रूरी। शिक्षा महिला को अपने अधिकार पहचानने की ताक़त देती है। सवाल पूछने का हौसला देती है। अपने पैरों पर खड़े होने का रास्ता खोलती है। लेकिन सिर्फ़ महिला को पढ़ा देने से समाज की सोच नहीं बदलती। क्योंकि अगर घर वही है, परवरिश वही है, बेटा-बेटी का अंतर वही है और महिला की आज़ादी को लेकर रवैया वही है, तो डिग्री दीवार पर टंगी रह सकती है, मगर सोच वहीं की वहीं रह जाती है। 

यदि महिला के हिस्से के इन रावणों की एक छोटी-सी फेहरिस्त बनाई जाए तो सबसे पहला रावण शायद घर की चारदीवारी में मिलेगा। एक ही घर में बेटा और बेटी हों, लेकिन दोनों के लिए आज़ादी के मायने अलग हों। बेटा देर से आए तो - “लड़का है!” बेटी देर से आए तो - “तुम्हें समझदार होना चाहिए, तुम्हें समझना चाहिए!”, “तुम्हें संजीदा होना चाहिए, आख़िर लड़की हो तुम!”

दूसरा रावण है शादी, शादी को अगर महिला की ज़िंदगी की मंज़िल मान लिया जाए, तो यहीं से समझौते का रावण जन्म लेता है। “थोड़ा सह लो” “सबको करना पड़ता है” “बच्चों के लिए चुप रहो” “पति है, गुस्सा तो करेगा ही” “तुम ही थोड़ा समझ लिया करो”

पति की रोक-टोक को प्यार समझना, बेइज़्ज़ती को रिश्ते का हिस्सा मान लेना, हिंसा को गुस्सा कहकर टाल देना और संस्कार के नाम पर महिला की आवाज़ को चुप करा देना - दो लोगों की साझेदारी से बनने वाली शादी को एक तरफ़ा समझौते में बदल देना ही तो दूसरा रावण है।

तीसरा रावण है - नौकरी और कार्यस्थल का, महिला घर से बाहर निकली, अपने पैरों पर खड़ी हुई, आत्मनिर्भर बनी। लेकिन क्या बाहर की दुनिया हर जगह उसके लिए सुरक्षित और बराबरी वाली हो गई?

किसी की अनचाही टिप्पणी, किसी का अनुचित स्पर्श, किसी की असहज निगाह, काम के बदले रखी गई अनुचित अपेक्षा - और सबसे मुश्किल सवाल, “आवाज़ उठाऊँ या चुप रहूँ?”

क्योंकि आवाज़ उठाने से पहले ही कई बार उसके मन में डर खड़ा हो जाता है। क्या लोग उसे ही गलत समझेंगे? क्या उसके काम पर असर पड़ेगा? क्या उसके किरदार पर सवाल उठेंगे? गलत बर्ताव करने वाले से पहले अगर सवाल उस महिला से किया जाने लगे जिसने आवाज़ उठाई है, तो वहाँ एक और रावण खड़ा हो जाता है।

चौथा रावण है समाज का,

“कपड़े ऐसे क्यों पहने?”

“इतनी देर तक बाहर क्यों थी?”

“छत पर इतनी देर किससे बात कर रही थी?”

“शादी कब होगी?”

“बच्चा कब होगा?”

“बच्चा हो गया तो नौकरी क्यों?”

और अगर महिला जवाब दे दे तो सवाल बदल जाता है - “इतना बोलती क्यों हो?”

कभी-कभी महिला अपने फैसले लेने से पहले यह नहीं सोचती कि उसे क्या चाहिए। वह पहले सोचती है -“समाज क्या सोचेगा?” यही सोच धीरे-धीरे उसके अपने वजूद से बड़ी होती चली जाती है।

पाँचवाँ रावण है डिजिटल दुनिया का, डिजिटल दुनिया ने हमें बहुत कुछ दिया है। दुनिया को हमारी हथेली पर ला दिया है, लेकिन इसी दुनिया ने रावण के कुछ नए चेहरे भी पैदा कर दिए हैं - अनचाहे संदेश, फर्जी प्रोफाइल, मॉर्फ्ड तस्वीरें, ऑनलाइन धमकियाँ, पीछा करना, सोशल मीडिया की प्रोफाइल देखकर किसी के किरदार का फैसला कर देना और किसी महिला को निशाना बनाकर उसकी समाजी छवि खराब करने की कोशिश करना। 

स्क्रीन के पीछे छिपा यह रावण दिखाई नहीं देता, लेकिन उसके शब्द किसी के मन में बहुत देर तक गूंजते रहते हैं। कभी-कभी एक स्क्रीन के पीछे छिपी आवाज़ किसी इंसान के भीतर गहरा अंधेरा छोड़ जाती है।

और छठा रावण है भीतर बसा हुआ डर, शायद सबसे ख़ामोश रावण यही है।

“मैं बोलूँगी तो क्या कहेंगे?”

“परिवार की इज़्ज़त का क्या होगा?”

“मुझे ही गलत समझा जाएगा।”

“शादी टूट जाएगी।”

“नौकरी चली जाएगी।”

“रिश्ते खत्म हो जाएंगे।”

ऐसे न जाने कितने सवाल हैं, जो धीरे-धीरे महिला के भीतर डर का घर बना लेते हैं, और फिर एक दिन वह अपनी आवाज़ सुनना ही भूल जाती है। उसे दूसरों की आवाज़ें इतनी साफ़ सुनाई देती हैं कि अपनी आवाज़ कहीं बहुत पीछे छूट जाती है। यह रावण बाहर नहीं रहता, यह भीतर बैठ जाता है, और शायद यही उसका सबसे ख़तरनाक रूप है।

ये तो सिर्फ़ कुछ चेहरे हैं। लेकिन बदलते समय की तस्वीर में आज भी ये सवाल मौजूद हैं - आख़िर दशहरे में हमारे इन रावणों का अंत कब होगा?

यहाँ एक बात साफ़ करना भी ज़रूरी है कि इस पूरे लेख का मतलब यह बिल्कुल नहीं कि हर पुरुष रावण है। - नहीं, बिल्कुल नहीं! हर पुरुष हिंसा करने वाला नहीं है। हमारे समाज में ऐसे पिता हैं, जो बेटियों को बेटों से कम नहीं समझते। ऐसे भाई हैं, जो बहन की आज़ादी का सम्मान करते हैं। ऐसे पति हैं, जो पत्नी को अपनी संपत्ति नहीं, अपना बराबर का साथी समझते हैं। 

ऐसे पुरुष भी हैं, जो गलत होता देखकर चुप नहीं रहते। जिन्होंने अपने घर की महिला को केवल किसी रिश्ते के नाम से नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में देखा है। उसकी आज़ादी को अपनी मेहरबानी नहीं समझा, उसके फैसलों को महत्व दिया और उसके अस्तित्व का सम्मान किया।

इसलिए यह लड़ाई पुरुष बनाम महिला की नहीं है। यह लड़ाई उस सोच के खिलाफ़ है, जो किसी इंसान को दूसरे इंसान से कमतर समझती है। रावण को पुरुष मान लेना आसान है, लेकिन रावण वाली सोच को पहचानना ज़रूरी है।

क्योंकि यह सिर्फ़ किसी एक महिला का नुकसान नहीं करती। यह पूरे समाज को भीतर से कमज़ोर करती है।

तो अब सवाल यह है - आख़िर असली दशहरा कब होगा?

हर साल हम पुतला जलाने की परंपरा निभाते हैं। लेकिन क्या हो अगर इस परंपरा को एक सवाल में बदल दिया जाए? क्या हो अगर रावण के पुतले के साथ उसकी सोच को भी जलाने की कोशिश की जाए?

उस सोच को, जो बेटी को सीमित और बेटे को स्वतंत्र करती है। उस सोच को, जो हिंसा को सामान्य मानती है। उस सोच को, जो पीड़ित से ही सवाल पूछती है। उस सोच को, जो महिला की आज़ादी को उसके किरदार से जोड़ देती है। उस सोच को, जो ख़ामोशी को संस्कार और विरोध को बदतमीज़ी कहती है। उस सोच को, जो लड़की को हर कदम पर “संभलकर चलने” की नसीहत देती है, लेकिन लड़के को यह नहीं सिखाती कि सामने वाले के सम्मान की हद कहाँ से शुरू होती है।

शायद तब दशहरा सिर्फ़ एक त्योहार नहीं रहेगा, वह आत्मनिरीक्षण (ख़ुद पर गौर करना) का दिन बन जाएगा।

क्योंकि बुराई हमेशा बाहर नहीं होती, कभी-कभी वह हमारी भाषा में होती है। कभी हमारी परवरिश में, कभी हमारी ख़ामोशी में, कभी उस मज़ाक में, जिस पर हम हँसकर आगे बढ़ जाते हैं और कभी उस सलाह में, जो हम बिना सोचे किसी औरत को दे देते हैं - “सह लो।”

तो इस बार सिर्फ़ दशहरा मत मनाइए, एक नया दशहरा मनाइए।

मैदान वही हो। रावण का पुतला वही हो। भीड़ वही हो। बच्चे, बूढ़े, औरतें, मर्द - सब उसी तरह जमा हों। आतिशबाज़ी हो। शोर हो और रावण का पुतला फिर धू-धू करके जले।

लेकिन इस बार कोशिश कीजिए कि उस आग में सिर्फ़ पुतला न जले।

उसके साथ वह सोच भी जले, जो किसी महिला को उसकी अपनी ज़िंदगी का मालिक बनने से रोकती है। वह सोच जले, जिसमें लड़की को अपने सपनों के लिए इजाज़त माँगनी पड़े। वह सोच जले, जिसमें आज़ादी को किसी की मेहरबानी समझा जाए। वह सोच जले, जिसमें महिला का “ना” उसकी कमज़ोरी समझा जाए। वह सोच जले, जिसमें उसकी सुरक्षा के नाम पर उसकी सीमाएँ तय कर दी जाएँ। वह सोच जले, जिसमें किसी महिला को अपनी आवाज़ उठाने से पहले अपने ही घर, रिश्ते और समाज से डरना पड़े।

शायद असली दशहरा तब होगा, जब किसी लड़की को अपने सपनों के लिए अनुमति नहीं, मौका चाहिए होगा। जब किसी पत्नी को हिंसा सहने की सलाह नहीं, साथ मिलेगा। जब किसी महिला के “ना” को बहस नहीं, जवाब माना जाएगा। जब किसी पीड़ित से पहला सवाल यह नहीं होगा कि - “तुम वहाँ गई ही क्यों थीं?”

और जब किसी महिला को अपनी आवाज़ बचाने के लिए खुद से ही लड़ना नहीं पड़ेगा। 

तो इस दशहरे रावण का पुतला ज़रूर जलाइए, मगर साथ ही अपने अंदर, अपने आसपास, अपने घर और अपने समाज में छिपी उस रावण-रूपी सोच को भी जलाइए, जो किसी महिला की आवाज़, आज़ादी और आत्मसम्मान को जलाती है।

क्योंकि पुतले का रावण हर साल जल जाता है, असली रावण तब मरेगा जब उसकी सोच मर जाएगी।


अर्शी ख़ानम

राजकीय फार्मासिस्ट, जयपुर, राजस्थान

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