मैं समाज से बेहयाई दूर करूंगी
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अगले अंक का सवाल

मैं समाज से बेहयाई दूर करूंगी


आजकल फैशन और आज़ादी के नाम पर बेहयाई का ट्रेंड चल गया है, लोग हया का ज़ेवर उतार कर तमाम तरह की बुराईयों में लीन होते जा रहे हैं। इसलिए यदि मुझे कोई बुराई दूर करने का अवसर मिले तो मैं समाज से बेहयाई दूर करना चाहूंगी।    

इस्लाम में बेहयाई को बहुत बुरा माना गया है और हया अर्थात शर्म को दीन का महत्वपूर्ण अंग करार दिया गया है।

हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का कथन है" 

हर दीन की एक सिफत (विशेषता) होती है और इस्लाम की सिफत अच्छे अख़लाक (व्यवहार) और हया है। (इब्न-ए-माजा 4181)

एक अन्य हदीस में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फरमाया “जब तुझ में हया ना रहे तो जो चाहे कर।” ( बुखारी :3483) 

इस हदीस से यह पता चलता है कि हया ही वह चीज है जो इंसान को गुनाहों से और बुराइयों से रोकती है। हया दो प्रकार की होती है, एक अल्लाह से हया और दूसरी लोगों से हया।

अल्लाह से हया: अल्लाह से हया का आश्य यह है कि कुछ भी गलत काम करते समय यह ध्यान रहे कि कोई देखे या ना देख मुझे मेरा रब देख रहा है। 

लोगों से हया: बेहूदा अर्थात असभ्य बातों और कामों से बचना।

आज के इस प्रगतिशील दुनिया मे हया समाप्त होती जा रही है और उसकी जगह पर बेशर्मी को फैशन बना कर उस पर गर्व किया जा रहा है। हया हर चीज में होनी चाहिए। मतलब बातचीत में अगर हया होगी तो इंसान बदतमीजी और गाली गलौज नहीं करेगा, कमाई में अगर हया होगी तो इंसान सही और गलत में अंतर समझेगा, उसी प्रकार अगर नज़र में हया होगी तो वह इंसान को बुरे कर्म करने से रोकेगी। 

हया केवल अच्छे कपड़े पहनना और पर्दे में रहने का नाम नहीं है। अल्लाह ताला ने कुरान में सूरह नूर आयत नंबर 30'31 में मोमिनो मर्दों और औरतों को अपनी निगाहों को नीचे रखने का हुक्म दिया है। 

आज के युग में आधुनिक बनने की होड़ में लोग अपनी मूल संस्कृति और नैतिक मूल्यों को भूलकर बाहरी चकाचौंध को अपनाकर बेहयाई अपना रहे हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट का दुरुपयोग करके उसमें अश्लील सामग्री को पसंद करके अपनी मानसिकता खराब कर रहे हैं इसके कारण नैतिकता भी समाप्त होती चली जा रही है और मर्यादाओं का उल्लंघन हो रहा है। सम्मान कम हो रहा है परिवार में बिखराव जन्म ले रहे हैं। अगर सही मार्गदर्शन और नैतिक सीमाओं को ध्यान में रखा जाए तो सुधार हो सकता है। लेकिन उसके लिए अपने जीवन में हया और नैतिकता को लाना ज़रूरी है। 


ज़किया शिरीन

तेलंगाना

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