“गैजेट्स हमारे सेवक या हम उनके?"
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“गैजेट्स हमारे सेवक या हम उनके?"


आज का युग विज्ञान और तकनीक का युग है। मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्ट वॉच, टेलीविज़न और इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान, तेज़ और सुविधाजनक बना दिया है। कुछ दशक पहले जिस काम में घंटों या कई दिन लग जाते थे, आज वह काम कुछ मिनटों में हो जाता है। हम दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से तुरंत बात कर सकते हैं, घर बैठे पढ़ाई कर सकते हैं, ऑनलाइन टिकट बुक कर सकते हैं और कुछ ही सेकंड में किसी विषय की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि गैजेट्स आधुनिक जीवन की बड़ी ज़रूरत बन चुके हैं।

लेकिन इसी सुविधा के बीच एक गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा है—क्या हम गैजेट्स का इस्तेमाल कर रहे हैं या धीरे-धीरे गैजेट्स हमारा इस्तेमाल करने लगा है?

गौर कीजिए, सुबह आँख खुलते ही बहुत से लोगों का पहला हाथ मोबाइल की तरफ जाता है। रात को सोने से पहले आखिरी बार भी मोबाइल ही देखा जाता है। बीच में बार-बार नोटिफिकेशन देखने की आदत, सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करना, वीडियो देखना और बिना किसी खास काम के स्क्रीन पर समय बिताना हमारी रोज़मर्रा की आदत बन चुका है। कभी हम मोबाइल केवल पाँच मिनट के लिए उठाते हैं, लेकिन पता चलता है कि आधा घंटा बीत गया।

गैजेट्स हमारे सेवक हैं, मालिक नहीं

गैजेट्स अपने आप में बुरे नहीं हैं। असल समस्या उनके गलत और जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल की है। जैसे चाकू से फल भी काटा जा सकता है और किसी को नुकसान भी पहुँचाया जा सकता है। गलती चाकू की नहीं, उसके इस्तेमाल के तरीके की होती है। ठीक उसी तरह मोबाइल और इंटरनेट हमारे लिए ज्ञान, शिक्षा और सुविधा का माध्यम हैं, लेकिन जब उनका नियंत्रण हमारे हाथ से निकल जाता है, तो वही सुविधा परेशानी बन जाती है।

एक विद्यार्थी का उदाहरण लें। उसे अगले दिन परीक्षा की तैयारी करनी है। वह कहता है, “मैं सिर्फ दस मिनट मोबाइल पर एक वीडियो देखकर पढ़ाई शुरू करूँगा।” वीडियो समाप्त होता है तो दूसरा वीडियो सामने आ जाता है। फिर तीसरा, चौथा और धीरे-धीरे एक घंटा निकल जाता है। अंत में विद्यार्थी किताब खोलकर बैठता है, लेकिन उसका ध्यान पढ़ाई में नहीं लगता। वह थकान महसूस करता है और सोचता है कि आज पढ़ाई नहीं हो पाई। असल में समय की कमी नहीं थी, बल्कि समय का एक बड़ा हिस्सा गैजेट ने छीन लिया।

क्या हम हर छोटी बात के लिए तकनीक पर निर्भर हो गए हैं?

आज हमें बहुत-सी छोटी चीज़ें भी अपने दिमाग से करने की आदत कम होती जा रही है। रास्ता याद रखने के बजाय GPS, सामान्य गणना के लिए कैलकुलेटर और छोटी-सी जानकारी के लिए सर्च इंजन का सहारा लिया जाता है।

मान लीजिए किसी व्यक्ति को किसी जगह कई बार जाना है। वह रास्ता याद करने की कोशिश करने के बजाय हर बार GPS खोलता है। एक दिन फोन की बैटरी खत्म हो जाए तो वही परिचित रास्ता भी मुश्किल लगने लगता है। इसी तरह यदि हम हर छोटी गणना कैलकुलेटर से करने लगें, तो मानसिक गणना की हमारी आदत धीरे धीरे कमज़ोर पड़ने लगती है।

यह बात केवल सुविधा की नहीं, आत्मनिर्भरता की भी है। तकनीक हमारी क्षमता बढ़ाए, यह अच्छी बात है; लेकिन यदि तकनीक के बिना हम सामान्य काम भी न कर पाएँ, तो हमें रुककर सोचना चाहिए।

परिवार पास होकर भी दूर क्यों हो रहा है?

गैजेट्स का सबसे दिखाई देने वाला प्रभाव हमारे रिश्तों पर पड़ा है। कभी परिवार के सदस्य शाम को एक साथ बैठकर दिनभर की बातें किया करते थे। आज कई घरों में लोग एक ही कमरे में बैठे होते हैं, लेकिन हर व्यक्ति अपनी अलग स्क्रीन में व्यस्त होता है।

कल्पना कीजिए—एक माँ अपने बच्चे से बात करना चाहती है, पिता दिनभर की कोई बात साझा करना चाहते हैं, भाई-बहन कुछ बताना चाहते हैं; लेकिन सामने बैठा व्यक्ति बार-बार मोबाइल की स्क्रीन देख रहा है। वह शरीर से परिवार के बीच मौजूद है, लेकिन उसका ध्यान कहीं और है।

कभी-कभी हमें यह भी एहसास नहीं होता कि सामने बैठा इंसान हमसे सिर्फ एक मिनट की बातचीत चाहता है। हम कहते हैं, “बस एक मिनट, पहले यह देख लेने दो।” लेकिन वही एक मिनट कई बार दस मिनट बन जाता है। और धीरे-धीरे बातचीत कम होती जाती है।

सोशल मीडिया की चमक और वास्तविक जीवन

सोशल मीडिया ने दुनिया को करीब लाने का काम किया है, लेकिन कभी-कभी यह हमें अपने ही जीवन से दूर कर देता है। हम दूसरों की तस्वीरें देखते हैं, उनकी यात्राएँ देखते हैं, उनकी उपलब्धियाँ देखते हैं और अनजाने में अपने जीवन की तुलना उनसे करने लगते हैं।

किसी ने नई जगह घूमने की तस्वीर डाली, किसी ने पुरस्कार जीता, किसी ने कोई शानदार कार्यक्रम साझा किया। हमें लगता है कि सबकी ज़िंदगी बहुत अच्छी है और केवल हम पीछे रह गए हैं। जबकि सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली ज़िंदगी अक्सर पूरी कहानी नहीं होती। लोग अपनी खुशियों की तस्वीर दिखाते हैं, अपनी परेशानियों का पूरा बोझ नहीं।

इसलिए हमें याद रखना चाहिए कि दूसरों की स्क्रीन देखकर अपनी वास्तविक ज़िंदगी का मूल्य तय नहीं किया जा सकता।

समाधान क्या है?

समाधान यह नहीं है कि हम मोबाइल, इंटरनेट या तकनीक को पूरी तरह छोड़ दें। आज के समय में ऐसा करना व्यावहारिक भी नहीं है। समाधान है—तकनीक का इस्तेमाल करें, लेकिन उसकी सीमा तय करें।

कुछ छोटे नियम हमारी आदतों को बदल सकते हैं—

- जरूरी काम के बाद मोबाइल को एक तरफ रख दें।

- पढ़ाई के समय अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद रखें।

- भोजन के समय परिवार के साथ बिना मोबाइल बैठने की कोशिश करें।

- सोने से पहले कुछ समय स्क्रीन से दूरी रखें।

- रोज़ कुछ समय किताब, खेल, व्यायाम या प्रकृति के साथ बिताएँ।

- परिवार और दोस्तों से आमने-सामने बातचीत करें।

- समय-समय पर अपना स्क्रीन टाइम देखें और खुद से पूछें—“क्या मैंने आज इस समय का सही इस्तेमाल किया?”

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें अपने आप से ईमानदार होना होगा। अगली बार जब हम बिना किसी काम के मोबाइल उठाएँ, तो एक पल रुककर पूछें—“मुझे सच में इसकी जरूरत है या यह केवल मेरी आदत बन चुकी है?”


यासमीन तरन्नुम"कवंल"

जबलपुर, मध्य प्रदेश


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