दीपावली : घर के साथ दिल की सफ़ाई भी ज़रुरी
प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या को पूरे भारतवर्ष में मनाया जाने वाला दीपोत्सव अपने अंदर एक प्राचीन इतिहास को संजोए हुए है। मुख्य रूप से यह भगवान श्री राम के अयोध्या आगमन पर राज्याभिषेक की स्मृति में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। यह त्यौहार बुराई पर अच्छाई की विजय प्रतीक के रूप में आज तक भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। भारतीय संस्कृति परंपरा में दीपक को ज्ञान और सकारात्मक का प्रतीक माना गया है और दीपोत्सव का सांस्कृतिक व आध्यात्मिक महत्व है। वेदों में कहा गया है" तमसो मां ज्योतिर्गमय "अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलो।
दिवाली संस्कृत शब्द दीपावली से आया है जिसका शाब्दिक अर्थ है दीपकों की पंक्ति। ऐतिहासिक परिपेक्ष्य में भी यह अपना एक विशेष महत्व रखता है। भारतीय ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ में देखा जाए तो यह त्यौहार मां लक्ष्मी जो धन की देवी कही जाती हैं, उनके स्वागत के लिए मनाया जाता है। मां लक्ष्मी जो धन की देवी है हमें अर्थ (धन) प्रदान करती है और हमारे जीवन को सरलता सहजता प्रदान करती है।
किंतु इस धन का आज वर्तमान संदर्भ में लोग केवल दिखावे के लिए दुरूपयोग कर रहे हैं। यहां तक कि कर्ज लेकर दिखावे के लिए इस अवसर पर पैसा बर्बाद करते हैं। यही कारण है कि मां लक्ष्मी हमसे दूर होती जा रही है। सच्चा त्यौहार वही होता है जो हमें मानसिक शांति और आत्मिक प्रसन्नता प्रदान करे। किंतु आजकल त्यौहार केवल दिखावा और स्टेटस सिंबल बन कर रह गए हैं। जो जितना ज्यादा महंगा उपहार और महंगा वस्त्र पहनेगा वह अधिक संपन्न कहा जाएगा।
दिखावा और फिजूल खर्ची से त्यौहार की जो मूल भावनाएं हैं वह समाप्त हो जाती है। आज आधुनिक युग में दिवाली का स्वरूप प्राचीन युग से काफी हद तक विकृत हो गया है। पहले जिस सादगी, सरलता विनम्रता से इस त्यौहार को मनाया जाता था ..वैसा आज बिल्कुल भी नहीं है। यह पावन पर्व अब केवल दिखावे की अंधी प्रतिस्पर्धा बन गया है।
दीपावली पर एक समस्या और उत्पन्न होती है वह है पटाखे की अत्यधिक खरीददारी। पटाखों का अत्यधिक प्रयोग हमारी प्राकृतिक सुंदरता को भी नष्ट करता जा रहा है और अत्यधिक धन खर्च हमारे भविष्य को अनिश्चित बना रहा है। किंतु मूर्ख मनुष्य इन बातों को सोचे बगैर केवल होड़ में धन को नष्ट करता है जो हमारे लिए बहुत ही ज्यादा दुखदायी और चिंतनीय विषय है।
पारंपरिक मान्यता अनुसार मां लक्ष्मी को स्वच्छता एवं सुंदरता प्रिय है। किंतु हम साफ सफाई कर घरों में स्वच्छता तो लाते हैं पर हम स्वभाव की जो कठोरता है उसका परित्याग नहीं करते। मन की सफाई घर की सफाई से ज्यादा आवश्यक है। मनुष्य के हृदय में जो बैर व द्वेष की भावना है उसकी सफाई जब तक नहीं होगी तब तक कुछ सही नहीं होगा।
घर की सफाई करने से पहले अपने हृदय में जो दूषित भावना है औरों के प्रति उसे भी हमें साफ करना होगा। आंतरिक मन में जो दूसरों के प्रति हमने द्वेष पाल रखे हैं हमें उनकी भी तिलांजलि देनी पड़ेगी। जिस प्रकार एक गंदा मैला फर्श हमें बिल्कुल अच्छा नहीं लगता वैसे ही अपने हृदय में जो मैल रुपी बुराइयां पाल रखी है, उसे भी नष्ट करना होगा। हमारे मन की आंतरिक मालीनता बुरे विचारों की गंदगी को भी हमें दूर करके स्वच्छता और सद्भावना को स्थान देना होगा। जिस प्रकार दीपावली आने पर पूरी शिद्दत से यह प्रयास होता है कि हमारा घर स्वच्छ सुंदर बने वैसे ही आचरण की सफाई भी ज़रूरी है।
यह प्रकाश पर्व व्यक्तिगत ही नहीं सामूहिक स्तर पर प्रकाश व जीवन के आनंद का पर्व है। दीपावली का त्यौहार सामाजिक स्तर पर मित्रों, परिवारजनों समाज के लोगों से मिलने व मेलजोल बढ़ाने का अवसर देता है। सभी लोग आपस में मतभेद व मनभेद बुलाकर एक साथ इस त्यौहार को प्रेम से मनाते हैं।
दूसरी ओर यह पर्व व्यक्तिगत स्तर पर आत्म निरीक्षण, आत्म अवलोकन का भी समय देता है। जिसमें हम हमारे हृदय में ज्ञान दास सत्यता का दीपक प्रज्वलित करते हैं और अपना अवलोकन कर देखते हैं कि हमारे हृदय में जो भी कटुता व शत्रुता है, उसको निकाल कर मित्रतापूर्ण प्रेम, दया, करुणा जैसे भावों को स्थान दें।
हमारे इस प्राचीन त्यौहार में श्रद्धा और सादगी के स्थान पर जो फिजूल खर्ची ने अपनी जगह बनाई है, उस फिजूल खर्ची को हमें दूर करना होगा। अपनी सामाजिक स्थिति को देखते हुए दिखावे की जो होड़ चल पड़ी है उससे बाहर निकलना होगा। लोग अपनी जेब से बाहर की क्षमता में जाकर खर्च कर रहे हैं।
अतः हमें जीवन जीने के लिए त्यौहार पर दिखावा ना करके मस्तिष्क से उल्लास पूर्ण जीवन जीना चाहिए और दिखावे की जो यह मानसिकता के हम गुलाम हुए हैं उसे बाहर निकलना चाहिए। आज के दौर में अवसाद, अकेलापन और नकारात्मकता से घिरे समाज के लिए यह दीपोत्सव नई उमंग नई आशा और नई जीवन ऊर्जा का संचार करता है। किंतु वर्तमान में फिजूल खर्ची के कारण हम त्यौहार के वास्तविक अर्थ को भूलते जा रहे हैं।
जो लक्ष्मी जीवन को आधार प्रदान करती है उसका संरक्षण ना करके हम उसका दुरुपयोग अत्यधिक दिखावे और प्रदर्शन की भावना से कर रहे हैं जो कतई सही नहीं है। दिखावे की होड़ में हम हमारी परंपराओं को को भी भूल गए हैं और कृत्रिम, दिखावटी जीवन शैली को अपना रहे हैं जो प्रकाश पर्व के इस महत्व को ओझल कर रही है।
हमें महंगे उत्पादों के बजाय सादगी और सरलता से इस त्यौहार को मनाना चाहिए। जिस प्रकार दिवाली आने पर हमारा पूरी शिद्दत से यह प्रयास होता है कि घर स्वच्छ सुंदर बने और बहुत ही सुंदर लगे वैसे ही हमारा यह भी प्रयास होना चाहिए कि हमारे दिल में जो बुरे विचार हैं उनका हमें उसे कूड़े के भांति त्याग करना है।
दीपोत्सव ही एक ऐसा पर्व है जो हमारे आसपास के वातावरण को निर्मल बनता है, हमारे मन मस्तिष्क पर भी सकारात्मक प्रभाव डालता है। बाहरी साफ-सफाई के साथ हमें अपने हृदय में जमे विचारों और नकारात्मकता की धूल को भी हटाना होगा। स्वयं को नकारात्मक भावना से मुक्त करके सदाचारी और सकारात्मक जैसी भावनाओं से पुष्ट करना होगा। कहा भी जाता है की आंतरिक स्वच्छता बाहरी स्वच्छता से कई गुना अच्छी होती है। अपने दिलों में आशाओं के दीप जलाएं तभी तो हमारे मन में जो निराशा रूपी अंधकार है वह दूर होगा और हम दूसरों के लिए भी कल्याणकारी सिद्ध होंगे।
रेखा शर्मा