मिसेज- एक ऐसी फिल्म जो मर्दों को देखना ज्यादा जरुरी है
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समीक्षा

मिसेज- एक ऐसी फिल्म जो मर्दों को देखना ज्यादा जरुरी है

फिल्म- मिसेज 

निर्देशक: आरती कदव

कलाकार: सान्या मल्होत्रा, कंवलजीत सिंह, निशांत दहिया


पिछले महीने 8 मार्च को हमने जोर शोर से महिला दिवस मनाया। बड़े बड़े मंच पर महिलाओं को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हुई, सोशल मीडिया, फेसबुक, व्हाटसअप और इन्स्टा स्टोरी पर महिलाओं के कसीदे पढ़े गये। लेकिन जितनी बातें होती है, क्या हकीक़त में भी हमारे समाज में महिलाओं की उतनी इज्जत होती है। हम बहुत दूर न जा कर अपने घरों में ही देख लें हम यहां अभी समानता की बात नहीं करेंगे, वर्क प्लेस पर उसके साथ कैसा बर्ताव होता है उसकी बात भी नहीं करेंगे, हम आज उसके श्रम की बात करेंगे। वह श्रम जो एक महिला अपने घर में सुबह से उठकर रात में बिस्तर पर जाने से पहले तक करती है। उसका श्रम और घर के लोगों द्वारा उसके श्रम के सम्मान की बात करेंगे। यह घर की बात है, लोग कहेंगे कि इस पर क्या ही बात करना, पर यह बहुत बड़ा मुद्दा है, जिस पर कभी गंभीरता से बात ही नहीं होती। खुद महिलाओं को भी नहीं पता है कि इस पर बात होनी चाहिए, वह तो इसे नियति समझती हैं। 

इस पर बात करने के लिए हम एक फिल्म का जिक्र करेंगे, जो हाल ही में ओटीटी प्लेटफोर्म ज़ी5 पर रिलीज हुई है। फिल्म का नाम है 'मिसेज', जो एक मलयालम मूवी 'द ग्रेट इंडियन किचन' का हिंदी रीमेक है। यह फिल्म ऐसी नहीं है कि जिसमें दिखाया गया है कि पति बहुत अत्याचारी है, सास सौर नन्द बहु को प्रताड़ित कर रही हैं, या मारपीट किया जा रहा है, या दहेज़ के लिए सताया जा रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। यह पढ़े लिखे 'सभ्य और समझदार' लोगों का परिवार है। जो शरीर पर नहीं मन पर चोट देते हैं।

फिल्म की मुख्य किरदार ऋचा (सान्या मल्होत्रा) जिसका गायनो पति दिवाकर (निशांत दहिया) और उसके ससुर (कंवलजीत सिंह), जो ताज़े फुल्के (रोटी नहीं") चाहते हैं, चक्की पर बनी चटनी, हाथ से धुले कपड़े और ये सब करने के लिए घर पर रहने वाली महिलाएँ हैं, जिनमें उनकी पत्नी हैं जो इसमें रम बस गई हैं, और उन्हें जरा भी इसका एहसास नहीं होता, वही बात कि उन्होंने इसे नियति ही समझ लिया है, ये तो महिलाओं का काम ही है, जो हर घर में बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है। वह बहु लाते हैं, और उसे भी इसी ढर्रे में ढालना चाहते हैं।


ससुर जी पूरी फिल्म में अपनी बहु को बेटा जी और 'आप' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके बेहद स्नेह से बुलाते दिखते हैं। लेकिन इस स्नेह के साथ हिंसा को इस तरह से मिश्रित कर दिया गया है कि जिसके साथ ऐसा रवैया अपनाया जा रहा है, वो भी इस बात को समझ नहीं पाती। रोटी पहले बनाकर रख दी, लेकिन गरम फुल्के चाहिए, बहु दौड़ दौड़ कर किचन में जाये और रोटी फुलाकर लाये। मिक्सी नहीं सिल बट्टे की चटनी चाहिए। बिरयानी अगर कुकर में बना दी तो वह पुलाव हो गया। सभी चीजें टाइम पर चाहिए। इस पर भी बहु हर चीज प्यार से बना रही है कि पति और ससुर को पसंद आ जाये तो कोई तारीफ नहीं। ऊपर से कुछ ऐसी बातें बोल देना जो मन पर गहरी चोट कर दे। ससुर अपना कोई काम खुद नहीं करते, पत्नी करे, और पत्नी नहीं तो बहु, यहां तक कि खुद से चप्पल भी निकाल कर नहीं पहन पाते। जबकि न वह बीमार हैं न बूढ़े। बहु को डांस का शौक है वह पार्ट टाइम जॉब में डांस सिखाना चाहती है, पर वह भी मना कर दिया जाता है। यहां महिलाओं को सिर्फ घर के कामों में देखने की आदत है, यही उसका काम है, जॉब सिर्फ पुरुष करेंगे।

एक लड़की को सबसे ज्यादा उम्मीद अपने पति से होती है। लेकिन यहां पति भी अपनी पत्नी की ज़रूरतों से बेखबर और अपने पिता की सुविधा पर पूरी तरह से ध्यान केंद्रित है। उसे समय पर खाना मिलना चाहिए, ऑफिस जाने से पहले कपड़े मिलने चाहिए और रात में सेक्स। किचन में पत्नी को क्या परेशानी हो रही है उस पर ध्यान नहीं। रात में उसे पत्नी से इंटिमेट होना है, यहां भी वह अपनी सुविधा और जरुरत देखता है। पत्नी काम करके थकी है उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वह अपना काम तो बताता है कि हॉस्पिटल में इतने पेशेंट देखें, थक गया हूँ। बासी खाना नहीं खिलाओ, गर्म फुल्के बनाओ, तुम्हें दर्द हो रहा है तो दवा खा लो, पर सेक्स करो। और जब पत्नी कहे कि उसकी भी कुछ जरूरतें और एक्सपेक्टेशन है तो यह कह दे कि तुम्हारे शरीर से किचन और मसालों की बास आती है। 

एक बुआ जी और ताऊ जी के बेटे भी हैं, जो यह दिखाते हैं कि हर घर में ऐसे रिश्तेदार भी होते हैं जो आपकी परेशानियों को और बढ़ा देते हैं। बुआ जी कहती हैं कि खाना बनाते वक़्त चुगने की आदत ठीक नहीं, पति के लिए करवा चौथ का व्रत रखना कितना जरुरी है, चाहे पति उसे समझे ही न। व्रत वाले दिन भरपेट स्वादिष्ट भोजन करते हुए पुरुष इस बात पर चर्चा करते हैं कि व्रत कितना जरुरी है। वहीं ताऊ जी के बेटे परफेक्ट शिकंजी न बनाने पर तंज कसते हैं। ऋचा का सोशल मीडिया अकाउंट देखते हैं और ऋचा के पति को उसका डांस स्टेप बताते हैं। दिवाकर अपनी पत्नी से वीडियो डिलीट करने को बोलता है, तो ऋचा मना कर देती है, क्योंकि हर चीज बर्दाश्त करने की एक सीमा होती है।

यहां सबसे समझने वाली बात ये है कि पूरी फिल्म में मौजूद मेल कैरेक्टर्स भी इस बात को नहीं समझ पाते कि वो परिवार के नए सदस्य का असल में शोषण कर रहे हैं। पूरी फिल्म में इसे डायलॉग से समझाने के बजाय छोटी-छोटी घटनाओं से समझाया गया है और ये बात समझ में भी आती है। 'बहू हमारी बेटी जैसी है...इतना कहने के बाद उसे खाना बनाने के तरीकों पर सवाल उठाना, सिलबट्टे पर चटनी पिसवाना और यहां तक बिरयानी को पुलाव बोलकर पूरी तरह से खारिज कर देना। कभी किसी काम की सराहना न करना।  

यहं फिल्म पैरेंटिंग का भी मुद्दा उठाती है। ऋचा जब अपने पति पर पानी फेंक कर मायके आती है तो मां उसे समझाती है और कहती है कि बेटा वापस चली जाओ, छोटी छोटी बात पर ससुराल नहीं छोड़ते। मां कहती है कि खुद भी पानी पी और भाई को भी दे। ऋचा बोलती है कि भाई को वह पानी क्यों दे। हर घर में लड़कों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है। भाई है उसे खाना दे दो पानी दे दो। लड़कों को क्यों नहीं सिखाया जाता कि खुद से खाना लो पानी लो, यह भी कि दूसरों को भी दो। बड़े होने पर यही लड़के पुरुषवादी सोच के बनते हैं। जैसे ऋचा के पति और ससुर हैं।

फिल्म में दिखाए गए पुरुष न तो राक्षस हैं और न ही वो कोई ऐसी हरकत करते दिखते हैं जिससे उन्हें शैतान कहा जाए। लेकिन उन्हें पता ही नहीं होता है कि वो गलत कर रहे हैं। पुरुषों को लगता है कि कुछ कपड़े, गहने या खाना देने से या फिर कुछ मीठी बातें कर लेने से वो महिलाओं को सम्मान देने वाली खानापूर्ति कर दे रहे हैं। लेकिन सम्मान सिर्फ यहीं तक तो सीमित नहीं होता है। और अंत में महिलाओं से भी यह बात कहना चाहेंगे कि जहां आपके काम को, आपके प्यार को, आपके समर्पण को सम्मान न मिले तो ऋचा की तरह ही पति के मुंह पर पानी फेंक कर चले आइये। और इसके लिए भी जरुरी है कि आप इतनी सशक्त हों, और आत्मनिर्भर हों।

रज़िया अंसारी 

(जर्नलिस्ट, असिस्टेंट न्यूज़ एडिटर, दूरदर्शन पटना )


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