मैं लूज़र नहीं हूं
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साहित्य

मैं लूज़र नहीं हूं

आतिफा! तुम ने फिर वही हरकत की! शर्म से सिर झुका दिया हमारा, तुम्हे ज़रा सा भी ख्याल है कि किस परिवार से संबंध है तुम्हारा? उसकी मां की आंखों में खून उतर चुका था।

कभी देखा है कि हममें से किसी ने अम्मी अब्बू को परेशान किया हो? उसकी बड़ी बहन ने जलती पर तेल छिड़का।

और आतिफा खामोश..बहुत खामोश! मासूम सी सूरत लिए बारह वर्ष की बच्ची अपनी खूबसूरत बड़ी बड़ी पलकों वाली आंखों में दो कतरे लिए अपराधी बनी खड़ी थी। उसका दुर्गभाग्य था कि वह कभी क्लास में अच्छे नंबर से पास नहीं हुई थी, और इस बार तो हद हो गई, गणित के पर्चे में ग्रेस देकर पास किया गया था, और प्रमोट किया गया था।

कहां है वह नालायक.. एक और गरजती हुई आवाज़ उसके कानों में पड़ी और उसके ख़ौफ में इज़ाफा हो गया। खाला....वह...मैं....मुझे....माफ.. वह कुछ नहीं कह सकी।

तुम वैसी की वैसी ही रहोगी...चाहे मैं कितना मेहनत से तुमको पढ़ाऊं 

कोई ज़रुरत नहीं खाला..इस लूज़र को पढ़ाने की!! यह सिर्फ आपका नाम खराब करेगी। अदीबा ने उनके गुस्से में इज़ाफा किया।

अदीबा जो कि आतिफा की बड़ी बहन थी, हमेशा टॉप करती थी और वह अब पीएचडी की तैयारी कर रही थी।

मैं क्या करूं बाज़ी! माफ कर दे मुझे मैं इसे नहीं पढ़ा सकती। यह अदीबा कभी नहीं बन सकेगी।

अब आतिफा के सब्र का बांध टूट चुका था, वह चीख उठी बस कर दीजिए आप लोग..नहीं बनना मुझे अदीबा, मैं आतिफा हूं। खुदा का शुक्र है कि मैं आतिफा हूं और मैं हमेशा आतिफा ही रहूंगी।

चटाख..!! उसकी इस जुर्र्त पर एक ज़ोरदार तमाचा उसकी मां ने उसके गाल पर मारा। वह सिसकते हुए अपने कमरे में चली गई।

यह हर साल का तमाशा था, जो उस घर में होता। आतिफा के रिज़ल्ट कभी भी अच्छे ना होते और इस तरह उसकी मायूसी और एहसास कमतरी में हर साल इज़ाफा होता। 

वह पीछे..... हादिया बोली और आतिफा की आंखों में आंसू आ गए। उसने अपना सिर अंजाने डर के तहत मेज़ पर झुका दिया। फिर बच्चों की चहल पहली बढ़ गई, शोर हो रहा था यकायक बिल्कुल खामोशी छा गई और किसी की आवाज़ कानों में गूंजी शायद क्लासटीचर आ चुकी थीं। वह डर के मारे झुकी रही, कि अगर मैडम ज़ोहा को मालूम हुआ मैं यहां हूं तो उन्हें याद आ जाएगा कि मैं गणित में फेल थी। उसे कदमों की चाप अपने करीब सुनाई देने लगी और उसने आंखे बंद कर लीं।

गुड़िया!!! एक मीठी सी आवाज़ उसके कानों में पड़ी, वह एक झटके से उठी और खड़ी हो गई। अस्सलामो अलैकुम मैडम.. 

वालैकुम सलाम सिलिपिंग ब्यूटी। उन्होंने मुस्कुरा कर कहा। फिर वह मुड़ी और पूरे क्लास से मुखातिब हुईं तो बच्चों मैं हूं आपकी नई दोस्त! मेरा नाम हानिया है और हम लोग अब रोज़ साथ में मस्ती करेंगे। खेलेंगे और थोड़ा सा पढ़ भी लेंगे, अगर दिल चाहा तो।

बच्चों ने एक कहकहा लगाया....मैम आप हमारी क्लास टीचर हैं?” एक बच्ची बोली। 

जी बिल्कुल! क्यों मैं पसंद नहीं आयी?” 

नहीं...नहीं..मैम आप तो बहुत अच्छी हो।

अभी से पता लग गया?”

क्या पता थोड़ी देर बाद मेरी सींगे निकल आए।...

बच्चों ने ज़ोरदार कहकहा लगाया और उनकी नई टीचर ने इसी तरह हल्के फुल्के माहौल में पढ़ाना शुरु किया। ब्रेक के समय सब बच्चे बाहर चले गए और आतिफा वहीं बैठी रही। थोड़ी देर बाद हानिया मैम उसके पास आयीं क्या हुआ गुड़िया तुम्हें लंच नहीं करना?” 

मैम मेरे पास टिफिन है मैं यहीं कर लूंगी।

क्यूं बाहर मैदान में नहीं जाना? तुम्हारे दोस्तों के साथ

मेरा कोई दोस्त नहीं है मैम

क्यों उसकी पलकों में फिर दो कतरे आकर रुक गए। 

हानिया मैम बोलीं गुड़िया क्या हुआ? मुझे बताओ

क्योंकि मैं उनके बराबर नहीं हूं, मैं एक लूज़र हूं और वह फूट फूटकर रोने लगी।

हानिया हैरत से उस मासूम को देख रही थी जो अभी अपना बचपन भी खत्म नहीं कर पायी थी कि ज़माने ने उसे लूज़र होने का यकीन दिला दिया था। उन्होंने उसके आंसू पोछे और कहा ऐसे नही कहते बेटा, आने दो उन सबको मैं अभी बताती हूं।

नहीं मैंम मुझे अपनी हैसियत मालूम है, मैं उनके जैसी ज़हीन नहीं हूं।

उनके जैसी का क्या मतलब? कोई किसी के जैसा नहीं होता..अल्लाह तआला सबको अलग अलग सलाहियतों के साथ पैदा करता है। तुमको उनके जैसा बनना भी नहीं चाहिए। तुम आतिफा हो और अल्लाह की नज़र में तुम आतिफा ही अच्छी थी, इसीलिए तुम्हें आतिफा बनाया,ना कि हिफ्ज़ा या हादिया

वह हैरत से हानिया मैम को देखने लगी और उसे वह तमाचा याद आया जो यही बात कहने पर उसे पड़ा था। 

और यह क्या है? जो तुम लिख रही थी

वह बोली यह मेरी पर्सनल डायरी है देख लें मगर किसी को बताइएगा मत...प्लीज़

हानिया ने उसे खोला तो देखा आधे से ज़्यादा पेज भरे हुए थें और उसमें कहानियां थीं, नज़्में थीं, ज़्यादातर नज़्में शायरी वगैरह और हर नज़्म में आखिर में आतिफा का नाम लिखा था। उन्होंने हैरत से पूछा यह तुमने लिखा है?” 

हम्म

और तुम कह रही थी कि तुम लूज़र हो

अम्मी कहती हैं शेर ओ शायरी अच्छी बात नहीं, और मैं पिछले साल गणित में फेल हुई थी। उसने सरगोशी वाले अंदाज़ में कहा।

हानिया मुस्कुराई और कहा मैं भी एक बार हुई थी बचपन में......

लेकिन आप तो टीचर हैं?”

तो क्या टीचर फेल नहीं हो सकते?...देखो बेटा एक बात हमारी हमेशा याद रखना कि कोई कुछ भी कहे मगर यह सच है कि तुम्हारे एग्ज़ाम का रिज़ल्ट यह तय नहीं करता कि तुम कामयाब हो या नाकाम। काबिल हो या लूज़र। तुम्हारा रिज़ल्ट सिर्फ इतना बताता है कि इस एग्ज़ाम में हमने कितनी मेहनत की। या उस साल तुमने कितना सीखा, तुम्हारी असल सलाहियत बताती है कि तुम कितनी काबिल हो..जैसे कि यह तुम्हारी डायरी मुझे बता रही है कि तुम एक ज़बरदस्त लेखक ही नहीं एक छोटी सी शायरा भी हो।

घंटी बज गई और बच्चे वापस आने लगे मगर यह छोटी सी तकरीर व नसीहत आतिफा के ज़ेहन में बस गई और वह हानिया मैम की फैन हो गई। दिन गुज़रते गए और समय समय पर हानिया मैम से बातें शेयर करते करते उन दोनों की अच्छी दोस्ती हो गई। कुछ महीने बाद वह घर में थी अपने कमरे में कि उसे अदीबा की आवाज़ आई आतिफा नीचे आओ किसी का फोन है

वह दौड़ते हुए आयी यह सोचते हुए कि मेरे लिए किसका

पता नहीं कोई साहब है किसी एकेडमी से

हैलो अस्सलाम अलैकुम

वालैकुम असस्लाम..आप आतिफा अहमद बात कर रही हैं?” 

उसने डरते डरते जवाब दिया जी

बहुत बहुत मुबारक हो! मुझे आपको यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि आपका लेख इंटरनेशनल नज़्म नस्र एकेडमी ने नेशनल अवार्ड के लिए सेलेक्ट कर लिया है जो जुनियर लेखकों में से आपको यह इनाम दिया जा रहा है.... आपको अगले रविवार को नई दिल्ली के हमारे ऑफिस में यह अवॉर्ड लेने आना होगा। हम आपका इंतज़ार करेंगे। आप चाहें तो अपने अभिभावक को साथ ला सकती हैं।

वह...लेकिन मैंने तो इस तरह के किसी मुकाबले में हिस्सा नहीं लिया

जहां तक मुझे मालूम है आपका आर्टिकल किसी हानिया फातिमा की ईमेल से मिला था। अच्छा खुदा हाफिज़

आतिफा हैरत से फोन को कुछ देर तक देखती रही फिर कुछ सोचकर फौरन किसी को कॉल लगाई उधर से आवाज़ आई हैलो मेरा बच्चा वही मीठा लहज़ा।

मैम मैं लूज़र नहीं हूं, मैं आतिफा हुं, अल्लाह ने मुझे सलाहियत देकर पैदा किया, मैं आतिफा हूं...मैम आप बहुत अच्छी हैं। शुक्रिया मैम वह रो रही थी या शायद हंस रही थी मगर बेहद खुश थी, फोन के दूसरी तरफ भी शायद जज़्बात से भरे आंसू निकल रहे थे यकीनन। आज हानिया ने अध्यापिका होने का हक जो अदा कर दिया था।

  • मोमिना अफ़्फ़ाफ़ तैय्बाती

कानपुर, उत्तर प्रदेश

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