एक नया कानून, एक पुरानी पॉलिसी
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चर्चा

एक नया कानून, एक पुरानी पॉलिसी


30 मार्च 2026 को इज़रायल की संसद नेसेट ने एक विवादस्पद कानून पास किया। इस कानून का नाम है "Penal Law Bill (Amendment No. 159) (Death Penalty for Terrorists), 2025“

जिसे आम भाषा में "मौत की सज़ा कानून" कहा जा रहा है। यह कानून उन फ़िलिस्तीनियों पर लागू होगा जो हमलों में दोषी पाए जाएं, लेकिन यह इज़रायल के यहूदी नागरिकों पर लागू नहीं होता।

इस बिल को नेसेट में 62-48 के वोट से पारित किया गया। राष्ट्रीय रक्षा मंत्री इतमार बेनगवीर और उसके समर्थकों ने वोटिंग के दौरान सुनहरे फाँसी के फंदे के निशान वाले बैज पहने हुए थे। बिल पास होने के बाद बेनगवीर ने शैंपन की बोतल लहराई और अपने साथियों के साथ जश्न मनाया।

इस नए कानून के तहत वेस्ट बैंक में किसी इज़रायली नागरिक की हत्या के दोषी पाए गए व्यक्ति को मिलिट्री कोर्ट मौत की सज़ा सुनाएंगी। वहीं, किसी इज़रायली नागरिक पर वेस्ट बैंक में ग़ैरकानूनी हत्या का आरोप लगने पर उन्हें इज़रायल की सिविल कोर्ट में पेश किया जाएगा।

एक ही ज़मीन पर, दो अलग-अलग लोगों के लिए दो अलग-अलग कानून। इस कानून के तहत सज़ा पाए फ़िलिस्तीनियों को 90 दिनों के भीतर फाँसी दी जाएगी, और मृत्युदंड पाने वालों के परिजनों को मिलने की भी अनुमति नहीं होगी।

हालांकि अदालतें दोषसिद्धि के आंकड़े जारी नहीं करती लेकिन फिर भी जो आंकड़े उपलब्ध हैं उनके आधार पर फ़िलिस्तीनियों पर अदालतों में दोष-सिद्धि की दर 99.74 प्रतिशत है। इसके विपरीत, 2005 से 2024 के बीच पश्चिमी तट में अपराध करने वाले इज़रायली नागरिकों की दोष-सिद्धि दर सिर्फ़ 3 प्रतिशत रही।

आंकड़ों के मुताबिक़ वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसा करने वाले सेटलर्स में से 93.8 प्रतिशत के खिलाफ बिना किसी चार्जशीट के जाँच बंद कर दी गई।

फिलीस्तीनियों के लिए मृत्युदंड का ये क़ानून मूल रूप से एक रंगभेद क़ानून है। ऐसे और भी कानून हैं जो यहूदियों और फ़िलिस्तीनियों के बीच भेदभाव करते हैं। इस तरह के कानूनों का बनना 1948 में इज़रायल की स्थापना और 1967 में वेस्ट बैंक पर कब्ज़े के बाद से चला आ रहा है।

इज़रायल के नस्लवादी समाज में फ़िलिस्तीनियों को इंसान से कम दर्जे पर देखने की सोच इतनी गहरी हो चुकी है कि मृत्युदंड का कानून न सिर्फ बिना विरोध के पास हो गया, बल्कि संसद के सदस्यों ने इसे खुलेआम जश्न के साथ मनाया।

1948 में इज़रायल की स्थापना के बाद से ऐसे कई कानून पास हुए हैं जिन्होंने फ़िलिस्तीनियों और इज़रायलियों के बीच असमानता को क़ानूनी रूप दिया है।

इनमें 1950 का Absentees' Property Law शामिल है जिसने 1948 में विस्थापित फ़िलिस्तीनियों की ज़मीन और घरों पर कब्ज़ा करने का रास्ता खोला, और 2003 का Citizenship and Entry into Israel Law जिसने फ़िलिस्तीनी परिवारों के पुनर्वास को प्रभावी रूप से रोक दिया।

2018 में नेतन्याहू सरकार ने Nation-State Law पास किया जिसने यहूदियों के प्रभुत्त्व को संवैधानिक दर्जा दिया, अरबी भाषा का दर्जा घटाया और यहूदी आत्म स्वतत्रता को प्राथमिकता दी।

मृत्यदंड के इस क़ानून के तहत अपील पर प्रतिबंध और 90-दिन की फाँसी की समय-सीमा लगाई गई है, जिससे ये समझ में आता है कि यह कानून फ़िलिस्तीनी बंदियों को कम जाँच-पड़ताल के साथ तेज़ी से मारने का लक्ष्य रखता है।

जबकि अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत इज़रायल की संसद को वेस्ट बैंक के लिए कानून बनाने की अनुमति नहीं है, क्योंकि यह क्षेत्र इज़राइल का हिस्सा नहीं है।

यह कानून उस समय लाया गया है जब इज़रायल ने सिर्फ एक महीने पहले उन सैनिकों के खिलाफ सभी आरोप वापस ले लिए जिन पर फ़िलिस्तीनी बंदियों के साथ सामूहिक यौन हिंसा का आरोप था। इस तरह इज़रायल एक ओर संगठित यौन हिंसा के लिए दण्ड से मुक्ति को कानूनी रूप दे रहा है और दूसरी ओर फ़िलिस्तीनियों के लिए 90 दिनों में फाँसी का प्रावधान कर रहा है।

मृत्युदंड के इस कानून का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि यह किसी के खिलाफ हिंसा को नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीनी होने की राजनीतिक स्थिति को ही आपराधिक बना देता है क्योंकि जो व्यक्ति अपने गाँव को हथियारबंद सैटलर्स से बचाने की कोशिश करेगा है, वह खुद मौत की सज़ा का पात्र बन जाएगा।

मृत्युदंड कानून, Settlements का Legalization, मिलिट्री कोर्ट, बुलडोजर से घरों को ढहाने के आदेश, ये सब इज़रायल की अलग-अलग नीतियाँ नहीं हैं, बल्कि एक ही प्रोजेक्ट के अलग-अलग हथियार हैं और वो प्रोजेक्ट है फ़िलिस्तीनी ज़मीन पर पूरा कंट्रोल।

लेकिन असल बात तो ये है कि एक ऐसे समाज में जहाँ संसद के सदस्य फाँसी के चिन्ह पहनकर वोटिंग करें और शैंपेन से जश्न मनाएं, वहाँ सवाल कानून का नहीं, इंसानियत का है।


मोहम्मद इक़बाल

स्वतंत्र लेखक, बिहार

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