ईद-उल-अज़हा : कुर्बानी, इंसानियत और एकता का पर्व
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इस्लाम दर्शन

ईद-उल-अज़हा : कुर्बानी, इंसानियत और एकता का पर्व


ईद-उल-अज़हा, जिसे आम बोलचाल में बकरा ईद भी कहा जाता है, इस्लाम धर्म का एक पावन त्यौहार है। यह ज़िल-हिज्जा महीने की 10 तारीख को मनाया जाता है। यह त्यौहार त्याग और ईश्वर की उपासना का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह ईद हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत इस्माईल (अ.स.) की अज़ीम कुर्बानी की याद में मनाई जाती है। इसका संदेश केवल जानवर की कुर्बानी करना नहीं, बल्कि इंसानियत, तक़वा और इंसानी जान की हुरमत को समझना है।

असल कुर्बानी: बाप-बेटे की रज़ामंदी  

हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने सपना देखा तो उसे ईश्वर का आदेश मानकर बेटे के पास गए। क़ुरआन में वह मंज़र यूँ बयान हुआ है:  

"फिर जब वह बेटा उनके साथ चलने-फिरने की उम्र को पहुंचा, तो इब्राहीम ने कहा: ऐ मेरे प्यारे बेटे, मैं सपने में देखता हूँ कि मैं तुझे ज़िबह कर रहा हूँ। अब तू बता तेरी क्या राय है? बेटे ने जवाब दिया: अब्बा जान जो हुक्म आपको दिया जा रहा है उसे कर डालिए। इंशा-अल्लाह आप मुझे सब्र करने वालों में पाएंगे" (सूरह साफ़्फ़ात: 102)।  

यह बातचीत ही असल कुर्बानी थी। छुरी चलने से पहले ही बाप ने हुक्म तस्लीम कर लिया और बेटे ने अपनी जान पेश कर दी। न सवाल, न शिकायत, सिर्फ "समीअना व अताअना"। अल्लाह को यही तस्लीम-ओ-रज़ा मतलूब थी। इसीलिए ज़िबह से पहले ही अल्लाह ने फ़रमा दिया: "ऐ इब्राहीम, तूने  सपना सच कर दिखाया" (सूरह साफ़्फ़ात: 105)

 इंसानी कुर्बानी का ख़ात्मा: रहमत का ऐलान

जब हज़रत इब्राहीम (अ.स.) अल्लाह के आदेश पर अपने बेटे को कुर्बान करने लगे, तो अल्लाह तआला ने उनकी वफ़ादारी को क़ुबूल करके आसमान से एक दुम्बा भेज दिया। अल्लाह तआला ने अंत में दुम्बे की कुर्बानी करवाकर क़यामत तक के लिए इंसानी जान की कुर्बानी यानी बली प्रथा को हराम कर दिया। यह ऐलान था कि इस्लाम में इंसान की जान सबसे मुक़द्दस है। अल्लाह को ख़ून नहीं चाहिए, उसे बंदे की नियत और तक़वा चाहिए।

क़ुरआन में फरमाया गया: "अल्लाह को ना उनके गोश्त पहुंचते हैं न ख़ून, बल्कि उसे तुम्हारा तक़वा पहुंचता है" (सूरह हज: 37)। 

 जीवन का उद्देश्य: सब कुछ अल्लाह के लिए 

ईद-उल-अज़हा याद दिलाती है कि मोमिन की पूरी ज़िंदगी अल्लाह के लिए वक़्फ़ है। क़ुरआन का ऐलान है: "कह दो: बेशक मेरी नमाज़, मेरी कुर्बानी, मेरा जीना और मेरा मरना सब अल्लाह रब्बुल आलमीन के लिए है" (सूरह अनआम: 162)।  

हज़रत इस्माईल (अ.स.) ने इसी आयत को अमली शक्ल दे दी। जब जीना-मरना अल्लाह के लिए हो, तो किसी बेगुनाह की जान लेना कैसे जायज़ हो सकता है? यह आयत बताती है कि हमारी हर सांस अल्लाह की अमानत है, और दूसरों की जान भी।

जानवर ज़िबह करना एक ज़ाहिरी अमल है। असल कुर्बानी अपने अंदर के घमंड, हसद, झूठ, लालच और नफ़रत को ज़िबह करना है। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने बेटे को अल्लाह की राह में पेश कर दिया। हमसे तलब यह है कि हम अपनी "मैं" को, अपनी ख़्वाहिशों को अल्लाह के आदेश के अधीन कर दें।

अमन और भाईचारे की दावत  

ईद की नमाज़ में अमीर-ग़रीब, काला-गोरा सब एक सफ़ में खड़े होते हैं। गले मिलकर पिछली रंजिशें मिटाई जाती हैं। यह दिन सिखाता है कि ख़ून बहाना नहीं, इंसान के आंसू पोंछना इबादत है। कुर्बानी का जज़्बा तलवार उठाने में नहीं, हाथ बढ़ाने में है।

जब दुनिया बनाने वाले ने इंसान पर इंसान का खून हराम कर दिया, तो दुनिया में किसी के लिए भी जायज़ नहीं कि जंगों में नाहक खून बहाए, इंसानी बलि दे या ज़ुल्म और क़त्ल करे।

"जिसने किसी एक जान को बिना किसी जान के बदले या ज़मीन में फ़साद फैलाने के अलावा क़त्ल किया, तो मानो उसने सारे इंसानों को क़त्ल कर दिया। और जिसने किसी एक जान को बचाया, तो मानो उसने सारी इंसानियत को बचा लिया।"

(सूरह अल-माइदह:32)

युद्ध और नरंसहार के दौर में ईद का संदेश 

ऐसे वक़्त में जब दुनिया में युद्ध चल रहा है, मासूमों का क़त्ल-ए-आम हो रहा है, इंसान की जान की हुरमत को समझने के लिए इस ईद के उद्देश्य को समझना सबसे ज़रूरी है। ईद-उल-अज़हा त्याग और अल्लाह की इताअत का सबसे बड़ा प्रतीक है। यह ईद हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत इस्माईल (अ.स.) की महान कुर्बानी की याद में मनाई जाती है। इसका संदेश सिर्फ जानवर ज़िबह करना नहीं, बल्कि इंसानियत, तक़वा और इंसानी जान की हुरमत को समझना है। अल्लाह ने इस्माईल (अ.स.) की जगह दुम्बा क़ुबूल करके इंसानी बली को हमेशा के लिए हराम कर दिया। दुनिया में किसी इंसान के लिए जायज़ नहीं कि वह बेगुनाह इंसानों का ख़ून बहाए।

कुर्बानी का असल मतलब: नफ़्स की कुर्बानी  

जानवर ज़िबह करना ज़ाहिरी अमल है। असल कुर्बानी अपने अंदर के घमंड, हसद और नफ़रत को ज़िबह करना है। हज़रत इब्राहीम (अ.स.) ने बेटे को और हज़रत इस्माईल (अ.स.) ने अपनी जान को अल्लाह के हुक्म पर कुर्बान कर दिया। हमसे तलब है कि हम अपनी "मैं" को कुर्बान करें। जब "मैं" की कुर्बानी होगी, तभी "हम" ज़िंदा रहेंगे।

मानवता और भाईचारे का अनुभव 

कुर्बानी के गोश्त को तीन हिस्सों में बांटने का हुक्म है: एक हिस्सा घरवालों के लिए, दूसरा रिश्तेदारों-दोस्तों के लिए, और तीसरा गरीबों-मिस्कीनों के लिए। यह तरीका समाज में बराबरी और भाईचारे को बढ़ाता है। ईद का दिन हमें याद दिलाता है कि जो हमारे पास है, उसमें दूसरों का भी हक़ है। जब दुम्बे की कुर्बानी से एक इंसानी जान बच गई, तो हमारा फ़र्ज़ है कि हम भी ज़िंदा इंसानों को बचाएं। भूखों को खाना खिलाएं, ज़रूरतमंदों की मदद करें और मज़लूमों को ज़ुल्म से बचाएं। क्योंकि हमारा जीना भी अल्लाह के लिए है, तो मख़लूक़ की ख़िदमत भी अल्लाह के लिए है।

यह दिन इस तरह लोगों को खाना खिलाने का, दस्तरख़्वान वसी करने का और मिलकर ख़ुशी मनाने का दिन भी बन गया। अल्लाह ही है जिसने तुम्हारे लिए चौपाए बनाए ताकि तुम उनमें से कुछ पर सवार हो और कुछ को खाओ। (सूरह ग़ाफ़िर:79)

आज जब दुनिया में नफरत और खुदगर्ज़ी बढ़ रही है, ईद-उल-अज़हा हमें रोककर सोचने को कहती है:

- क्या हम सिर्फ रस्म निभा रहे हैं या कुर्बानी के असल जज़्बे को समझ रहे हैं?  

- क्या हमारी कुर्बानी से किसी गरीब के चेहरे पर मुस्कान आई?  

- क्या हमने अपने गुस्से, हसद और बदगुमानी को भी कुर्बान किया?  

कुर्बानी का जानवर ज़िबह करना आसान है, लेकिन अपने अंदर की बुराइयों को ज़िबह करना असल इम्तिहान है।

ईद-उल-अज़हा का संदेश स्पष्ट है: अल्लाह की राह में सब कुछ कुर्बान कर दो, मगर इंसानियत को ज़िंदा रखो। जरूरतमंदों का ख्याल रखो, दिलों को जोड़ो और अमन का पैगाम फैलाओ। यही असल ईद है। "मेरा जीना और मेरा मरना अल्लाह के लिए है" — इस आयत को दिल में बसाकर हम हर अमल को इबादत बना सकते हैं।  

आज हम दिखावे की कुर्बानी तो कर लेते हैं, मगर दिल से नफरत, हसद, बदगुमानी कुर्बान नहीं करते। बड़े जानवर की फोटो स्टेटस पर लगाना आसान है, मुश्किल है अपनी "मैं" को ज़िबह करना। ईद-उल-अज़हा का तक़ाज़ा है कि:

- झूठ बोलना छोड़ें — ज़ुबान की कुर्बानी

- रिश्वत छोड़ें — हराम माल की कुर्बानी  

- किसी का दिल न दुखाएं — गुस्से की कुर्बानी

ईद-उल-अज़हा हमें "देने वाला" बनाती है — समय देने वाला, दौलत देने वाला, माफ़ी देने वाला, दुआ देने वाला। यही संदेश है: अल्लाह के लिए झुको, इंसान के लिए रुको और बुराइयाँ छोड़ दो!

अल्लाह तआला ने दुम्बे को भेजकर इंसानी जान को जो हुरमत बख़्शी, उसे क़यामत तक क़ायम रखना हर इंसान की ज़िम्मेदारी है। हिंदुस्तान जैसे देश में जहां गंगा-जमुनी संस्कृति है, ईद का त्यौहार सभी धर्मों के लोगों को जोड़ने का स्त्रोत बनता है।

ईद-उल-अज़हा मुबारक। तक़ब्बल अल्लाहु मिन्ना व मिंकुम।

नौशीन फातिमा खान

भोपाल, मध्य प्रदेश

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