महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और इस्लाम
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स्वास्थ्य

महिलाओं का मानसिक स्वास्थ्य और इस्लाम


“दो नेमतें ऐसी हैं जिनके बारे में बहुत से लोग गफलत में रहते हैं – अच्छी सेहत और खाली समय।“- (सहीह बुख़ारी)

जब मैंने यह हदीस पहली बार पढ़ी, तो मुझे महसूस हुआ कि हम वास्तव में अपने स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही बरतते हैं, विशेषरुप से हम महिलाएं। हम घर, परिवार, बच्चों, रिश्तेदारों और ज़िम्मादारियों में इतने उलझ जाते हैं कि अपने शरीर और मानसिक स्वास्थ्य को पीछे छोड़ देते हैं। जबकि इस्लाम हमें याद दिलाता है कि हमारी सेहत एक अमानत है, और अमानत का हक़ अदा करना हमारी ज़िम्मेदारी है।

स्वास्थ्य क्या है?

आमतौर पर हम स्वास्थ्य को सिर्फ शारीरिक तंदुरुस्ती से जोड़ते हैं—बीमार न होना, टेस्ट नॉर्मल आना या डॉक्टर के पास ना जाना। लेकिन वास्तव में स्वास्थ्य का अर्थ है शारीरिक संतुलन, मानसिक शांति और भावनात्मक स्थिरता। शरीर और मन एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अगर मन परेशान है तो उसका असर शरीर पर पड़ता है, और अगर शरीर अस्वस्थ है तो मन भी प्रभावित होता है। फिर भी हम ज़्यादातर शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान देते हैं, जबकि मानसिक स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर देते हैं।

एक महिला का जीवन 

महिला का जीवन सचमुच एक जटिल और बहुआयामी यात्रा है। वह पहले एक बेटी होती है, फिर पत्नी बनती है, फिर माँ बनती है, और समय के साथ कई रिश्तों की ज़िम्मेदारी उठाती है। यह सिर्फ सामाजिक भूमिकाएँ नहीं हैं, बल्कि उसके शरीर में भी निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं—किशोरावस्था (प्यूबर्टी), मासिक धर्म, गर्भावस्था, प्रसव (डिलिवरी) और रजोनिवृत्ति (मेनोपॉज)। इन सभी चरणों में हार्मोनल बदलाव होते हैं, जो उसके मूड, भावनाओं और मानसिक स्थिति पर प्रभाव डालते हैं। 

इसके साथ-साथ घर की ज़िम्मेदारियाँ, बच्चों की परवरिश, आर्थिक निर्भरता या नौकरी का तनाव, और सामाजिक कारण जैसे घरेलू हिंसा, परिवार के सदस्यों की मृत्यु, बचपन का आघात (ट्रॉमा) भी मानसिक तनाव के कारण बन सकते हैं। कई बार हम खुद समझ नहीं पाते कि हम इतनी भावनात्मक या थकी हुई क्यों महसूस कर रही हैं। 

जब यह समस्याएँ लंबे समय तक बनी रहती हैं, तो एंग्जाइटी, डिप्रेशन या अन्य मानसिक विकार विकसित हो सकते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, हमारे समाज में मानसिक बीमारी को अभी भी कलंक की तरह देखा जाता है। मानसिक बीमारी एक वास्तविक स्वास्थ्य समस्या है, और इसका इलाज भी उतना ही ज़रूरी है जितना शारीरिक बीमारी का।

मानसिक सेहत का महत्व और इस्लाम की शिक्षा

इस्लाम इंसान की मानसिक सेहत को बहुत ऊँचा दर्जा देता है, क्योंकि एक संतुलित और स्वस्थ जीवन के लिए दिमाग का स्वस्थ होना ज़रूरी है। अपने धार्मिक और नैतिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए एक मज़बूत और संतुलित मन आवश्यक है।

इंसान भावनाओं से बना है—खुशी, ग़म, डर, उम्मीद, निराशा—ये सब स्वाभाविक हैं। इस्लाम हमसे “सुपरह्यूमन” होने की उम्मीद नहीं करता। स्वयं नबी मुहम्मद ने अपनी पत्नी हज़रत ख़दीजा (रज़ि.) और अपने चाचा अबू तालिब की मृत्यु के बाद गहरा दुख अनुभव किया। उस वर्ष को “आम-उल-हुज़्न” यानी “ग़म का साल” कहा गया। यह इस बात का प्रमाण है कि दुख, अवसाद या मानसिक पीड़ा ईमान की कमी का संकेत नहीं है।

फिर भी मुस्लिम समाज में मानसिक बीमारी पर बात करना एक तरह का “टैबू” बना हुआ है। कई लोग मानते हैं कि मानसिक बीमारी किसी जिन्न का असर है या अल्लाह की सज़ा है। कुछ लोग यह भी समझते हैं कि अगर किसी को डिप्रेशन या एंग्जाइटी है तो वह “कमज़ोर ईमान” वाला है। यह एक ग़लतफ़हमी है। इस सोच के कारण यह विषय अनदेखा रह जाता है।

अच्छी मानसिक सेहत के लिए आत्म-ज्ञान (Self-Knowledge) और आत्म-जागरूकता (Self-Awareness) अत्यंत आवश्यक हैं। जब हम अपने विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को समझना शुरू करते हैं, तब हम अपने मानसिक संतुलन को बेहतर बना पाते हैं। मॉडर्न साइकोलॉजी के अनुसार, आत्म-जागरूकता अच्छी मानसिक सेहत की कुंजी है, और इसे माइंडफुलनेस (Mindfulness) के माध्यम से विकसित किया जा सकता है। 

माइंडफुलनेस का अर्थ है—अपने वर्तमान क्षण, विचारों और भावनाओं के प्रति सजग रहना, बिना किसी आलोचना या दबाव के। आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि सजगता तनाव कम करने और मानसिक शांति बनाए रखने में सहायक होती है।

इसका एक सुंदर उदाहरण हमें पैगंबर हज़रत मुहम्मद  के जीवन में मिलता है। वह्य आने से पहले वे अक्सर मक्का के पास स्थित गारे-हिरा में एकांत में समय बिताते थे। वहाँ वे दुनिया की हलचल से दूर रहकर चिंतन करते, मनन करते और जीवन के अर्थ पर विचार करते थे। यह एक प्रकार का गहरा आत्म-चिंतन और सजगता का अभ्यास था। वे अपने आसपास की परिस्थितियों, समाज की स्थिति और अपने अंदर की भावनाओं पर गंभीरता से विचार करते थे। यह दर्शाता है कि किसी बड़े दायित्व को संभालने से पहले मानसिक स्पष्टता, आत्म-जागरूकता और भीतर की शांति कितनी महत्वपूर्ण होती है। 

इस्लामी संदर्भ में माइंडफुलनेस को मुराक़बा कहा जाता है। मुराक़बा का अर्थ है—अल्लाह की उपस्थिति का एहसास रखते हुए स्वयं पर निगरानी रखना। यह गफलत (भूलने) के विपरीत है।

मुराक़बा कैसे करें? (स्टेप-बाय-स्टेप)

  1. समय चुनें:

ऐसा समय चुने जब आप अकेले हों — शायद फज्र से पहले, किसी नमाज़ से पहले, या सोने से पहले। यह आपका और अल्लाह का निजी समय है। पाँच मिनट भी काफी हैं। धीरे-धीरे यह पल आपकी रूह की ज़रूरत बन जाएगा।

  1. आरामदायक मुद्रा:

अब आराम से बैठ जाएँ - कुर्सी पर, ज़मीन पर, या बिस्तर पर। जिस मुद्रा में सुकून मिले, लेकिन इतनी भी ढील नहीं कि नींद आ जाए।

  1. सांस पर ध्यान:

धीरे-धीरे अपनी सांसों पर ध्यान लाएँ,सांस अंदर जा रही है और बाहर आ रही है। महसूस करें की यह सांस आपकी अपनी नहीं, यह अल्लाह की दी हुई अमानत है। इस दौरान अपने हाथ,कंधे और पूरा शरीर को ढीला छोड़ दें। हर सांस के साथ शुक्र का एहसास जगाएँ।

  1. आत्म-जागरूकता:

अब अपने दिल की तरफ़ ध्यान ले जाएँ। इस पल आप क्या महसूस कर रहे हैं- बेचैनी, सुकून, थकान, उलझन? कुछ भी हो उसे बस महसूस करें, जज न करें। सांस को अपना सहारा बनाकर मन को धीरे-धीरे स्थिर होने दें। महसूस करें कि अल्लाह आपको देख रहा है और अपने अंदर की आवाज़ को शांत करने की कोशिश करें।

  1. ज़िक्र को हथियार बनाएं:

जब मन भटकने लगे, तो धीरे से ज़िक्र करें “सुब्हानल्लाहि व बिहम्दिही”, “सुब्हानल्लाहिल अज़ीम”, “ला इलाहा इल्लल्लाह”, “अल्हम्दुलिल्लाह”, इस्तिग़फ़ार (अस्तग़फ़िरुल्लाह)। मन भटकेगा,विचार आएँगे। यह बिल्कुल सामान्य है। खुद को दोष मत दें। हर ज़िक्र आपके दिल को निखारता है। हर शुक्र का एहसास आपके नाम-ए-आमाल में लिखा जा रहा है।

कुछ पल इस सुकून को अपने भीतर उतरने दें। फिर गहरी सांस लेते हुए धीरे से आँखें खोलें,और इस मधुर एहसास को अपने दिल में एक अनमोल अनुभव की तरह संजो लें। यह अभ्यास नियमित रूप से करें। शुरुआत में मन बार-बार भटकेगा, लेकिन हर बार उसे वापस लाना ही अभ्यास की सफलता है। मुराक़बा अल्लाह की निगरानी में खुद को सँवारने की रूहानी थेरेपी है।

मानसिक सेहत कोई ऐशो-आराम की चीज़ नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। इस्लाम हमें हर स्तर पर संतुलन रखना सिखाता है—रूहानी, मानसिक, शारीरिक और सामाजिक। इसलिए ज़रूरी है कि हम इस विषय पर खुलकर बात करें, मदद लें और दूसरों का सहारा बनें। अपनी मानसिक सेहत का ख्याल रखना दरअसल अल्लाह की दी हुई अमानत की हिफ़ाज़त करना है। याद रखिए, आपकी सेहत ही आपके परिवार की ताकत है। आप स्वस्थ रहेंगी, तभी उनका सही मायनों में ख्याल रख पाएंगी।

(डॉ. जॉली खान एक होम्योपैथिक डॉक्टर और मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर हैं, जो वडोदरा, गुजरात में स्थित हैं। वह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए ऑनलाइन कंसल्टेशन प्रदान करती हैं। उनका उद्देश्य सरल और प्रभावी उपचार के माध्यम से लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाना है। अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें: [email protected])


डॉक्टर जॉली ख़ान

मानसिक स्वास्थ्य काउंसलर, वडोदरा


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