अमेरिका और इज़रायल की मज़बूत जोड़ी पर भारी ईरान
एक ऐसा देश जो समूचे विश्व में इस समय बिल्कुल अलग-थलग पड़ा हुआ है, जिस पर अनेकों प्रतिबंध लगे हुए है, जिस पर बमबारी हुई और जो चारों ओर से दुश्मनों से घिरा हुआ है। इन सबके बावजूद वह इतना शक्तिशाली कैसे है? यह एक ऐसी पहेली है जिसने दुनिया के बड़े बड़े विशेषज्ञों को भी उलझा कर रख दिया है। ईरान अपने अनोखे अंदाज़ में एक अलग ही खेल खेलता है, जिसे समझना मुश्किल है।
जहाँ वाशिंगटन और तेल अवीव टैंकों, लड़ाकू विमानों और परमाणु हथियारों पर ही अपना सारा ध्यान लगाए रहते हैं, वहीं तेहरान ने चुपचाप कुछ ऐसा तैयार कर लिया है जो कहीं ज़्यादा असरदार है: प्रॉक्सी (छद्म) गुटों का एक जाल, मिसाइलों का एक ऐसा ज़खीरा जो कभी नहीं थमता, और एक ऐसी विचारधारा जो कभी हार नहीं मानती!
यह महज़ किस्मत की बात नहीं है। यह एक सोची-समझी, नपी-तुली रणनीति है। और यह काम करती है।
“आप बम से किसी पहाड़ को तो तबाह कर सकते हैं, लेकिन आप समुद्र की लहरों को आने से नहीं रोक सकते।”
आइए, ईरान के मज़बूत स्तंभों के बारे में जानें, और उसकी इस अद्भुत शक्ति को समझने की कोशिश करें:
प्रतिरोधी साम्राज्यः अधिकांश देश युद्ध में अपने सैनिक भेजते हैं, वहीं ईरान ने एक अलग ही खेल में महारत हासिल की हुई है। बिना युद्ध के मैदान में कदम रखे ही नियंत्रण बनाए रखना। प्रतिरोध की धुरी (Axis of Resistance) बनाकर। जो हिज्बुल्लाह और हूती जैसे गुटों का विशाल नेटवर्क है और जिसे तेहरान ने प्रॉक्सी साम्राज्य के रुप में खड़ा किया है।
ये कोई ऐसे-वैसे गुट नहीं हैं; ये बेहद अनुशासित और अच्छी तरह से वित्तपोषित छोटी-छोटी सेनाएँ हैं। यह रणनीति ईरान को पूरे मध्य-पूर्व में अपने दुश्मनों पर दबाव बनाने का मौका देती है, और साथ ही उसकी अपनी सीमाओं को भी सुरक्षित रखती है। यह एक "बेहतरीन चाल" है—एक सोची-समझी रणनीति—जिसे रोकने में अरबों डॉलर के टैंक और लड़ाकू विमान भी नाकाम साबित होते हैं।
“आप उस दुश्मन को कभी नहीं हरा सकते जो अपनी पूरी आत्मा से लड़ता हो, जबकि आप सिर्फ़ अपने हथियारों के दम पर लड़ रहे हों।”
ऐसी ज़मीन जो अपनी हिफ़ाज़त स्वयं करती हैः जब हम ईरान के भूगोल पर नज़र डालते हैं, तो हमें वहाँ सिर्फ़ सीमाएँ और पहाड़ ही नज़र नहीं आते। हमें वहाँ एक दिव्य दुर्ग दिखाई देता है—जिसे अल्लाह ने अपने लोगों की रक्षा करने और अपनी विरासत को सहेजकर रखने के लिए ही बनाया है।
कैस्पियन सागर और फ़ारसी खाड़ी के बीच बसा हुआ ईरान, हर साल खरबों डॉलर के व्यापारिक मार्गों पर अपना नियंत्रण रखता है। इसका ऊबड़-खाबड़ इलाका—यानी ज़ाग्रोस और अल्बोर्ज़ पर्वतमालाएँ—हर हमलावर को उसकी औकात याद दिलाकर उसे विनम्रता का पाठ पढ़ा चुका है। इराक, सीरिया और लेबनान जैसे पड़ोसियों के बीच, ईरान सिर्फ़ एक देश के तौर पर ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय ताकत और इस्लामी एकजुटता के एक मज़बूत स्तंभ के तौर पर खड़ा हुआ है।
हर ऐतिहासिक हमलावर - सिकंदर महान से लेकर सद्दाम हुसैन तक - ने यह बात बहुत भारी कीमत चुकाकर सीखी है। यहाँ का ऊबड़-खाबड़ इलाका सप्लाई लाइनों को तोड़ देता है, सेनाओं को निगल जाता है, और हमले को विनम्रता का एक सबक बना देता है। यहाँ का भूगोल अभेद्य बना हुआ है, और यहाँ की सत्ता, भले ही उसे चोट पहुँची हो, फिर भी मज़बूती से खड़ी है।
ईरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर भी नियंत्रण रखता है; यह एक संकरा रास्ता है जहां से दुनिया का लगभग 20% तेल गुज़रता है। जब 2026 का युद्ध बढ़ा, तो ईरान ने इस जलडमरूमध्य को पूरी तरह से बंद कर दिया, जिससे वैश्विक तेल बाज़ारों में हड़कंप मच गया। इसके चलते ट्रंप को यह धमकी देनी पड़ी कि अगर इसे दोबारा नहीं खोला गया, तो वे बिजली संयंत्रों और पानी को मीठा बनाने वाले (desalination) संयंत्रों पर हमले करेंगे। इस नाकेबंदी ने वह बात ज़ाहिर कर दी जो रणनीतिकार लंबे समय से जानते थे: ईरान का सबसे बड़ा भौगोलिक हथियार उसके पहाड़ नहीं हैं। बल्कि, उसकी पकड़ वैश्विक ऊर्जा की नब्ज़ पर है।
मिसाइल और ड्रोन: 1980 का दशक बहुत ही क्रूर था। इराक के साथ ईरान के विनाशकारी युद्ध के दौरान, एक कड़वी सच्चाई सामने आई: हवाई ताकत (air superiority) को हमेशा उसी के बराबर की ताकत से नहीं हराया जा सकता। कभी-कभी, आपको उससे आगे निकलना पड़ता है।
ईरान अपने दुश्मनों का मुकाबला करने लायक हवाई सेना नहीं बना सकता था। इसलिए, उसने कहीं ज़्यादा रणनीतिक कदम उठाया: उसने मिसाइलों और ड्रोनों का एक ऐसा ज़बरदस्त ज़खीरा तैयार किया जिसे रोकना नामुमकिन था। इन्हें बीच में रोकना (intercept) बहुत मुश्किल होता है, और बड़े पैमाने पर किए गए हमलों (saturation attacks) में ये बेहद असरदार साबित होते हैं।
28 फरवरी, 2026 को, जिनेवा में परमाणु वार्ता का तीसरा दौर बिना किसी समझौते के खत्म होने के बाद, अमेरिका और इज़रायल की सेनाओं ने ईरान पर बड़े पैमाने पर हमले शुरू कर दिए। इस बार उन्होंने सिर्फ़ ठिकानों को ही नहीं, बल्कि सीधे-सीधे वहाँ की सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाया। हमलों की पहली ही लहर में सर्वोच्च नेता अली खामेनेई मारे गए। इस्लामी गणराज्य की विदेश नीति के 86 वर्षीय शिल्पकार—वह व्यक्ति जिसने तीन दशकों तक प्रतिबंधों, युद्धों और क्रांतियों का डटकर मुकाबला किया था—अब इस दुनिया में नहीं रहे।
पूरी दुनिया की साँसें थम गईं। ईरान के संविधान के अनुसार, जब तक 'विशेषज्ञों की सभा' (Assembly of Experts) किसी नए नेता का चुनाव नहीं कर लेती, तब तक सर्वोच्च नेता के सारे अधिकार राष्ट्रपति, न्यायपालिका और 'गार्जियन काउंसिल' को सौंप दिए गए। सर्वोच्च नेता के बेटे, मोजतबा खामेनेई, उनके संभावित उत्तराधिकारी के तौर पर सामने आए। नए कमांडर मोहम्मद बाकर ज़ोलघाद्र के नेतृत्व में IRGC और भी मज़बूत हो गया। हिज़्बुल्लाह ने ख़ामेनेई की हत्या को एक "रेड लाइन" (अंतिम सीमा) घोषित कर दिया और अपने ऑपरेशन्स को और तेज़ कर दिया। इन हमलों के जवाब में ईरान ने न सिर्फ़ इज़रायल पर, बल्कि सऊदी अरब, UAE, बहरीन, क़तर, कुवैत, जॉर्डन, इराक़ और ओमान पर भी मिसाइलें और ड्रोन दागे; और साथ ही अमेरिकी सैन्य ठिकानों और नागरिक इंफ्रास्ट्रक्चर को भी निशाना बनाया। जिसके परिणामस्वरुप इस क्षेत्र के तीन सबसे बड़े एयरलाइन हब - अबू धाबी, दुबई और दोहा - बंद कर दिए गए। कई हवाई क्षेत्र बंद हो गए। कमर्शियल बंदरगाहों पर भी काम-काज रोक दिया गया।
इसके बावजूद, अपने सर्वोच्च नेताओं को खोने और भारी नुकसान झेलने के बाद भी, ईरान टूटा नहीं है। अभी भी वह अपनी शर्तों को सामने रख महाज़ पर डटा हुआ है।
सहर नज़ीर
स्वतंत्र पत्रकार, बरेली, उत्तर प्रदेश