मज़दूर दिवस और इस्लाम
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दिव्य ज्योति

मज़दूर दिवस और इस्लाम


फिर अगर वह तुम्हारे लिए (बच्चे को) दूध पिलाएं तो उनको उनका प्रतिफ़ल (उजरत) दो, और भले तरीके से (उजरत का मामला) आपसी बातचीत से तय कर लो। (6 : 65)

मई का महीना मज़दूर दिवस के रुप में मनाया जाता है, जबकि इस्लाम ने मज़दूरों के अधिकार की कल्पना चौहद सौ साल पहले ही पेश कर दी थी। इस्लाम श्रम का सम्मान करता है, मज़दूर को भाई करार देता है और उसके श्रम का प्रतिफ़ल तुरंत देने का आदेश देता है कि मज़दूर की मज़दूरी किस प्रकार, कब और क्यों दी जाती है?

इस्लाम मेहनत को इबादत के समान करार देता है। नबी करीम सल्ल० ने कहाः अल्लाह मेहनत करने वाले को पसंद करता है। इस्लाम ने मालिक और मज़दूर के बीच संतुलन स्थापित किया है। ना तो मज़दूर पर अधिक बोझ डाला जाए और ना ही उसका हक मारा जाए। कुरआन में कहा गया है कि अल्लाह किसी जान को उसकी क्षमता से अधिक दुख नहीं देता। इससे पता चलता है कि मज़दूर से उसकी क्षमता से अधिक काम ना लिया जाए। अगर ज़्यादा काम लिया जा रहा है तो उसे अलग से मुआवज़ा दिया जाए।

कुरआन में स्पष्ट रुप से उजरत का उल्लेख मिलता है। जैसा कि सूरह तलाक़ में कहा गया हैः फिर अगर वह तुम्हारे लिए (बच्चे को) दूध पिलाएं तो उनको उजरत (प्रतिफ़ल) दो, और भले तरीके से (उजरत का मामला) आपसी बातचीत से तय कर लो। (6 : 65) यह आयत तलाक के नियमों के दौरान आयी है कि यदि एक महिला तलाक के बाद बच्चे को दूध पिलाने के लिए तैयार हो गई है तो पिता को यह आदेश दिया गया है कि उसे उचित प्रतिफ़ल दे। इस आयत से कुछ नियम स्पष्ट रुप से सामने आते हैः

काम के बदले वेतन आवश्यक है।

यह वेतन उचित और सही प्रकार से दिया जाए।

वेतन में देरी ना हो।

तफ़्सीर के विद्वान (उलेमा) कहते हैं कि यह आयत सामान्य मज़दूरों से भी संबंधित है। जिस प्रकार दूध पिलाने वाली मां को उसकी मेहनत का मुआवज़ा तुरंत दिया जाना चाहिए, उसी प्रकार हर मज़दूर, कारीगर या नौकर को उसकी मेहनत का हक समय पर मिलना चाहिए। इस आयत से यह भी पता चलता है कि इस्लाम महिलाओं के काम (जैसे दूध पिलाना) को भी आर्थिक रुप से स्वीकार करता है और उसे वेतन या प्रतिफ़ल लेने का अधिकार देता है।

इसी प्रकार वादा निभाने की ताकत से संबंधित एक आयत सूरह बनी इस्रायल में मिलती हैः और वादा पूरा करो, बेशक वादे के बारे में पूछा जाएगा। मज़दूर से काम लेना एक प्रकार का वादा (अनुबंध) है। जब आप मज़दूर को काम पर रखते हैं तो आप उस से वादा करते हैं कि काम के बदले में उसे वेतन मिलेगा। इसी वादे को पूरा ना करना या देर करना वादा तोड़ने के समान है जिसका हिसाब कयामत के दिन होगा।

सूरह अल बक़रा में कहा गया हैः उजरत ना देना या उसमें टाल मटोल करना बातिल माल खाने के समान है।

पसीना सूखने से पहले मज़ूदरी दोः कुरआन की हिदायत को नबी करीम सल्ल० ने अपनी सुन्नत से साबित कर दिखाया। आप सल्ल० ने कहाः “मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो।” (रिवायतः सुन्नन इब्न माजा) यह हदीस अपने अंदर गहराई समेटे हुए है। पसीना सूखने से पहले का मतलब यह है कि जैसे ही काम समाप्त हो जाए, मज़दूर थका हो और पसीने से तर बतर हो, उसकी मज़दूरी तुरंत दे दो। देरी ना करो, चाहे वह एक दिन का मज़दूर हो या महीने का वेतन पाने वाला।

एक अन्य हदीस में नबी करीम सल्ल० ने फरमाया कि “अल्लाह तआला कयामत के दिन तीन लोगों के ख़िलाफ़ खुद मुद्दई होंगे, उनमें से एक वह है जिसने मज़दूर से काम लिया मगर उसे मज़दूरी ना दी।” (सही बुख़ारी)

निष्कर्षः

मज़दूर की मज़दूरी उसका हक है, सदका नहीं। उसे कम देना या ना देना ज़ुल्म है। आजकल हम अपने आसपास देखते हैं कि कारखानों में, दुकानों में या घरों में नौकरों का वेतन महीनों देरी से दिया जाता है जो कि कुरआन व सुन्नत के ख़िलाफ़ है। वेतन समय पर देने के साथ-साथ उनके साथ अच्छा बर्ताव करना भी इस्लामी शिक्षा का अभिन्न अंग है। आप सल्ल० ने फरमायाः “तुम्हारे अधीन मज़दूर तुम्हारे भाई हैं। उन्हें वही खिलाओ जो खुद खाते हो, वही पहनाओ जो खुद पहनते हो।” 


नीलोफ़र इक़बाल

महाराष्ट्र

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