जगमगाते कॉरपोरेट कल्चर के पीछे का ‘अंधेरापन
article-image
संपादकीय

जगमगाते कॉरपोरेट कल्चर के पीछे का ‘अंधेरापन


उचित परिश्रमिक और सम्मान की मांग को लेकर विगत दिनों में नोएडा में एक बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ जिसमें हज़ारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे और कॉरपोरेट सेक्टर में वेतन वृद्धि एवं न्यूनतम मज़दूरी की मांग की। कॉरपोरेट सेक्टर में व्यापत शोषण एवं असमानता के विरुद्ध प्रदर्शनकारियों का कहना था कि 12 हज़ार रुपये से कम वेतन पर उनसे दस से 12 घंटे तक काम करने को कहा जाता है। टॉस्क पूरा ना होने पर अपमानित किया जाता है, दस मिनट के लिए वॉशरुम जाने पर भी आपत्ति जताई जाती है। 

प्रदर्शनकारी सरकार से मांग कर रहे थे कि न्यूनतम मज़दूरी दर 18 से 20 हज़ार हो, साथ ही वर्किंग ऑवर 8 घंटे निर्धारित हो। उक्त प्रदर्शन हिंसा में धीरे धीरे परिवर्तित होने लगा तो राज्य सरकार ने आनन-फ़ानन में न्यूनतम मज़दूरी दर बढ़ा दी। लेकिन 300 लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ी। उनके ऊपर हिंसा भड़काने और पाकिस्तान से संबंध होने का आरोप है और वे अभी तक जेलों में बंद हैं।

ईरान बनाम अमेरिका व इज़रायल के बीच चल रहे तनाव के कारण देश में उत्पन्न हुए एलपीजी संकट से हज़ारों प्रवासी मज़दूरों की दिनचर्या बाधित हो गई। एलपीजी गैस सिलेंडर की भारी किल्लत के कारण ब्लैक में मिल रहे सिलेंडरों के दाम अचानक से आसमान छूने लगे। जिस कारण बिहार, उत्तर प्रदेश समेत देश के विभिन्न कोनों से दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में रोज़ी-रोटी कमाने गए मज़दूरों के लिए खाना बनाना या होटलों में खाना एक चुनौती बन गया और उन्हें मजबूर होकर वापस अपने घरों को लौटना पड़ रहा है।

यूं तो मज़दूरों का शोषण और संघर्ष हमारे देश में एक सामान्य बात हो चुकी है लेकिन यह दो घटनाएं मज़दूर दिवस से ठीक पहले की है जो हमारे समाज की दुर्दशा की झांकी है। जो बताती है कि आज भी अनेकों अधिकार मिलने और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कानून बन जाने के बावजूद श्रमिक बेसहारा ही हैं। उन्हें ना समाज ने ना सरकार ने कोई सम्मान दिया है। जब भी कोई संकट आता है तो वे दर दर की ठोकरें खाने या खाली हाथ घरों को लौटने पर विवश हो जाते हैं। इससे पूर्व कोरोना काल में हम उनकी दयनीय स्थिति देख चुके हैं। यदि वे अपने अधिकार व सम्मान के लिए सड़कों पर उतरते हैं तो भी कभी लाठी या जेल उनका भविष्य बनता है।

न्यूनतम मज़दूरी, कार्य के घंटे, पीएफ व मातृत्व अवकाश मिलने के बावजूद उनका शोषण सामान्य रुप से चलता ही रहता है। वहीं दूसरी ओर एआई और अन्य एडवांस टेक्नोलॉजी उनका रोज़गार छीनने में कोई कसर नहीं छोड़ रही। है। 

मज़दूर दिवस के अवसर पर प्रत्येक वर्ष कुछ विशेष प्रोग्राम कर उनके हित के लिए लंबे लंबे भाषण देने या कुछ एक रैलियां निकाल लेने से तस्वीर नहीं बदल सकती। इसके बजाय वास्तव में उनके हितों के लिए समाज में जागरुकता पैदा करने की आवश्यकता है। देश की आर्थिक व्यवस्था सुधारने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देने वाले, अपना पसीना बहाकर मानव समाज की ज़रुरत पूरी करने वालें लोगों के हितों का रक्षक समूचा समाज बन जाए तो हमारी प्रगति में कोई रुकावट नहीं होगी।

इसके साथ ही टॉक्सिक कारपोरेट कल्चर की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए। क्योंकि यहां पर संगठित रुप से मज़दूरों का शोषण करना आम बात है। अपनी जेबें भरने के लिए कॉरपोरेट कंपनियां तुगलकी फ़रमान जारी करने व उसे इस्तेमाल करने में कोई कसर नहीं बाकी छोड़ती। जिसकी झलक हमने नोएडा विरोध प्रदर्शन के रुप में देखी। इन कॉरपोरेट लोगों के लिए लेबर लॉ का सही तरीके से लागू होना अति आवश्यक है और नियम कानून तोड़ने वाले लोगों की जवाबदेही सुनिश्चित होनी चाहिए तब ही मज़दूरों को शोषण से बचाया जा सकता है और यही मज़दूर दिवस का सच्चा सबक होगा।

  सहीफ़ा ख़ान

हालिया अपलोड

img
अपडेट
“मुस्लिम महिलाओं की विलुप्त हुई विरासत...

नई दिल्ली में आयोजित “हिस्ट्री कांफ्रेंस” के एक सत्र ‘इतिहास में महिलाओं...

img
अपडेट
भारत में गर्मी का मौसम और...

भारत की भौगोलिक विविधता जहां इसे प्राकृतिक सुंदरता से भर देता हे...

img
अपडेट
“इतिहास लगातार रिसर्च और इंटरप्रिटेशन का...

(11-12 अप्रैल को नई दिल्ली में आयोजित हुई “नेशनल हिस्ट्री कांफ्रेंस” में...

img
अपडेट
एक नया कानून, एक पुरानी पॉलिसी

30 मार्च 2026 को इज़रायल की संसद नेसेट ने एक विवादस्पद कानून...

Editorial Board

Arfa ParveenEditor-in-Chief

Khan ShaheenEditor

Sahifa KhanAssociate Editor

Members