घर में भावनात्मक सुरक्षा : इस्लामी दृष्टिकोण
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परिवार

घर में भावनात्मक सुरक्षा : इस्लामी दृष्टिकोण

भावनात्मक सुरक्षा का अर्थ है कि परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपने घर में सुख, शांति मिले। उसे यह महसूस हो कि उसकी भावनाओं का उसके घर में महत्व है। पारिवारिक सदस्य उसकी भावनाओं को समझते हैं और वे उसके सुख दुख में हमेशा साथ रहेंगे।

लेकिन जब हम अपने समाज का आंकलन करते हैं तो हमें यह महसूस होता है कि घरों से यह सुरक्षा विलुप्त होती जा रही है। कुछ घर ऐसे होते हैं जहां सुकून, गरमाहट और अपनेपन का एहसास मौजूद होता है लेकिन अधिकांश घरों से यह भावना मिटती जा रही है। जबकि आत्मिक शांति या भावनात्मक सुरक्षा से घर में ऐसा माहौल बनता है जहां व्यक्ति बिना डर के स्वीकार किया जाता है, बिना आलोचना के उसे सुना और समझा जाता है और बिना शर्तों के उसे प्यार मिलता है। यही सुरक्षा एक मकान को वास्तविक रुप में घर बनाती है। एक ऐसी जगह जहां आत्मा को शांति मिल सके। 

वर्तमान समय में जब दूरियां बढ़ती जा रही हैं तो ऐसे में भावनात्मक सुरक्षा ना केवल ज़रुरी बल्कि ज़रुरत बन चुकी है और इस्लाम ने इसके महत्व को बहुत पहले ही बता दिया था। कुरआन हमें एक बेहतरीन परिवार की जो कल्पना देता है वह यह है कि और उसकी निशानियों में से है कि उसने तुम्हारे लिए तुम्हीं में से जोड़ियां पैदा की ताकि तुम उनसे सुकून पाओ, और तुम्हारे बीच मुहब्बत और रहमत रख दी। – (30:21)

यह केवल सुंदर शब्द नहीं बल्कि एक वास्तविक नियम है। एक मज़बूत परिवार वह होता है जहां सुकून हो, जो मोहब्बत और रहमत के ज़रिए पैदा होता है। जब ये चीज़ें ख़त्म हो जाती हैं, तो रिश्तों का ढांचा तो बाक़ी रहता है, लेकिन उनकी रूह समाप्त हो जाती है। आज लोग पारिवारिक व्यवस्था पर भरोसा क्यों खोना शुरू कर रहे हैं? इसकी बड़ी वजह यही है कि घरों से मोहब्बत और रहमत कम होती जा रही है। जब घर भावनात्मक सुरक्षा दे, तो वह सुकून की जगह नहीं रहता, बल्कि बोझ बन जाता है।

रसूलुल्लाहकी ज़िंदगी हमें भावनात्मक सुरक्षा का बेहतरीन नमूना दिखाती है। आप ना सख़्त मिज़ाज थे और दूर रहने वाले, बल्कि गहरी तवज्जो देने वाले और समझने वाले थे। आपका रिश्ता आयशा बिन्त अबी बक्र के साथ इसकी ख़ूबसूरत मिसाल है। आप उनके साथ हँसते-खेलते, उनका दिल खुश करते और ऐसे लम्हे पैदा करते जो समीपता को बढ़ाते। एक बार आपने उन्हें हब्शी लोगों का खेल देखने दिया जब वह आपके कंधे से लगकर देख रही थींसिर्फ़ इसलिए कि वह खुशी महसूस कर सकें। छोटी-छोटी बातें, जैसे उनके पीने के बर्तन के वही हिस्से से पीना, उनके बीच मोहब्बत और निकटता को मज़बूत बनाती थीं।

आपकी संवेदनशीलता उस समय और भी स्पष्ट होती है जब कोई दुखी मन हो। जब सफ़िया बिन्त हुयय्य को उनकी नस्ल की वजह से तकलीफ़ पहुँची, तो आपने उनका दर्द नज़रअंदाज़ नहीं किया। आपने उन्हें इज़्ज़त के साथ तसल्ली दी और उन्हें याद दिलाया कि उनका सिलसिला हज़रत मूसा (.) और हज़रत हारून (.) जैसे अज़ीम पैग़म्बरों से जुड़ा है। यह असल जज़्बाती सहारा हैजब इंसान को उसके कमज़ोर लम्हे में सहारा दिया जाए।

एक और कठिन परीक्षा की घड़ी थी जब आयशा बिन्त अबी बक्र पर झूठे इल्ज़ाम लगाए गए। इतनी नाज़ुक सूरत--हाल में भी रसूलुल्लाहने सब्र और हिकमत से काम लिया। ना जल्दबाज़ी की और ना ही जज़्बाती पहलू को नज़रअंदाज़ किया। जब हक़ीक़त सामने आई, तो सिर्फ़ इज़्ज़त ही बहाल नहीं हुई, बल्कि घर का सुकून भी वापस आया। यह बताता है कि इंसाफ़ और जज़्बाती समझ, दोनों साथ चलकर ही भरोसा क़ायम रखते हैं।

बच्चों के साथ भी आपका व्यवहार स्नेह से भरा हुआ था। आप उन्हें गले लगाते, उन्हें प्यार देते और उनके साथ समय गुज़ारते। एक बार आपने सज्दा लंबा कर दिया क्योंकि आपके नवासे हसन इब्न अली या हुसैन इब्न अली आपकी पीठ पर खेल रहे थे। आपने उनकी खुशी को टूटने नहीं दिया। जब किसी ने हैरानी से कहा कि आप बच्चों को प्यार करते हैं, तो आपने फ़रमाया: अगर अल्लाह ने तुम्हारे दिल से रहमत निकाल दी है तो मैं क्या कर सकता हूँ?” यह स्पष्ट करता है कि स्नेहपूर्ण व्यवहार कमज़ोरी नहीं, बल्कि ताकत हैऔर भावनात्मक सुरक्षा की नींव भी।

रसूलुल्लाहका अपनी बेटी फ़ातिमा बिन्त मुहम्मद के साथ व्यवहार एक बेहद खूबसूरत मिसाल है। जब भी फ़ातिमा (रज़ि.) आतीं, आपखड़े होकर उनका स्वागत करते, उन्हें अपने पास बिठाते और मोहब्बत से उनका स्वागत करते हुए उन्हें चूमते भी थे। यह सिर्फ़ सम्मान नहीं, बल्कि उनकी इज़्ज़त, क़दर और गहरी मोहब्बत का इज़हार थाजो यह सिखाता है कि रिश्तों में प्यार को खुलकर जताना ही भावनात्मक मज़बूती की असल बुनियाद है।

ग़म के लम्हों में भी रसूलुल्लाहने भावनाओं को दबाया नहीं। जब आपके बेटे इब्राहीम इब्न मुहम्मद का इंतिक़ाल हुआ, तो आपकी आँखों से आँसू बह गए और आपने फ़रमाया: आँखें आँसू बहाती हैं और दिल ग़मगीन होता है, लेकिन हम वही कहते हैं जो अल्लाह को पसंद हो। यह हमें सिखाता है कि भावनाओं का इज़हार कमज़ोरी नहीं, बल्कि फ़ितरी बात है। यह दूसरों के लिए भी एक ऐसा माहौल पैदा करता है जहाँ वह अपनी भावनाएं दर्शा सकें।

बच्चों के लिए भावनात्मक सुरक्षा बुनियादी महत्व रखती है। यह उनका  भरोसा और शख्सियत तरतीब देता है। इस्लाम सिखाता है कि बच्चों के साथ इंसाफ़ हो, उन्हें बराबर मोहब्बत मिले और उनकी बात तवज्जो से सुनी जाए। ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चे मज़बूत और अडिग व्यवहार वाले बनते हैं। लेकिन जब घर में सख़्ती, बेरुख़ी या लगातार आलोचना हो, तो बच्चों के अंदर आत्मविश्वास की कमी, बग़ावत या दूरी पैदा हो जाती है।

बातचीत का अंदाज़ भी बहुत महत्वपूर्ण है। क़ुरआन हमें नरमी, सच्चाई और हुस्न--अख़लाक के साथ बात करने की शिक्षा देता है। घर के अंदर अल्फ़ाज़ गहरा असर छोड़ते हैं। सख़्त लहजा, तंज़ या लगातार बुराई आत्मिक शांति को कमज़ोर कर देती है। जबकि नरमी से सुनना और इज़्ज़त के साथ बात करना भरोसा पैदा करता है। घर तभी सुरक्षित महसूस होता है जब हर शख्स बिना डर के अपनी बात कह सके।

जब घरों में भावनात्मक सुकून और अपनापन कम हो जाता है, तो रिश्तों में दूरी और बेचैनी बढ़ती है और लोग बाहर शांति खोजने लगते हैं। इससे सिर्फ़ व्यक्ति बल्कि पूरा परिवार तंत्र कमज़ोर हो जाता है।
परिवार दरअसल समाज की नींव हैइसके कमज़ोर होने से अकेलापन, असुरक्षा और मानसिक तनाव बढ़ता है। इसके विपरीत, मज़बूत परिवार इंसान को सहारा, संतुलन और सुकून देता हैइसीलिए इसे रहमत भरी नींव माना गया है।


सुमैय्या मरयम

सोशल एक्टिविस्ट, नई दिल्ली

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