घरेलू हिंसा : घर घर की कहानी
सुबह 6 बजे का अलार्म बजता है। आभा अलार्म सुनती है, पर उसका शरीर उसका साथ नहीं देता। उसकी पीठ के घाव में अभी भी दर्द हो रहा है। रात देर तक रोने की वजह से आँखों में सूजन थी। पर बच्चों को स्कूल भेजना भी था। वह हिम्मत जुटाकर खड़ी हुई और जैसे-तैसे बच्चों को तैयार करके स्कूल भेज दिया।
उसके दिमाग में सवाल गूंज रहा था—आखिर कब तक? 15 साल होने आए। अब तो बच्चों ने भी इसे रूटीन की तरह अपना लिया है। अभी पिछले साल तो अदिति बता रही थी—
"मम्मी, मैंने, खुशी ने और मान्या ने आज अपनी जिंदगी का एक अहम फैसला लिया है।"
अदिति जैसे एक बड़े समझदार इंसान की तरह बोली। मैंने भी उत्सुकता से पूछा, "ऐसा क्या अहम फैसला लिया है भई, आप लोगों ने? मुझे भी तो बताओ।"
अदिति बोली, "हम तीनों कभी शादी नहीं करेंगे।"
आभा: "ऐसा फैसला क्यों लिया है हमारी गुड़िया ने?"
अदिति: "हम अगर शादी करेंगे तो हमें भी आपकी तरह रोज़ मार खानी पड़ेगी ना।"
अदिति ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया। पर इस जवाब से आभा दंग रह गई। उसने सोचा भी नहीं था कि उसके पति के इस व्यवहार का इन छोटे बच्चों पर क्या असर होगा।
लेकिन अब तो अदिति भी जैसे सहम गई है।
आखिर क्यों? किस गलती की सज़ा मिल रही है? शादी करने की गलती या औरत बनकर जन्म लेने की गलती?
इन्हीं सवालों की उलझनों में वह फंसी थी कि तभी घंटी बजती है। दरवाज़े पर सविता थी। आज उसकी आँखों के आसपास चोट के निशान थे।
आभा उसे देखती है और आह भरती है, "आज फिर?"
सविता फट से जवाब देती है, "रात को उस शराबी को पैसे देने से मना किया तो मुन्ने के बैट से मार खानी पड़ी। पर कल तो भाभी, मैंने भी सामने एक दे ही दी।"
यह कहकर सविता हँसने लगी।
आभा: "सविता, तुम्हें बुरा नहीं लगता?"
सविता: "कब तक बुरा लगेगा भाभी। बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं,सुनरिता "
आभा मुस्कुराते हुए: "सेनोरिटा, सुनरिता नहीं, ‘
सविता: "हाँ वही। छोड़ो ना भाभी, जैसा भी है, मर्द तो है ना। सुबह सॉरी बोला था बेचारा।"
यह कहकर सविता झाड़ू लेकर दूसरे कमरे में चली जाती है। आभा एक लंबी आह लेकर अपने काम में लग जाती है।
यही सुबह मालिक मेंशन में नए प्लान्स और उमंगों के साथ शुरू होती है।
मिस्टर और मिसेज़ मलिक की नई बहू अमायरा नहा-धोकर तैयार होकर किचन में आती है। आज छुट्टी का आखिरी दिन था। रात की फ्लाइट से वह अपने शौहर के साथ बैंगलोर जाने वाली है। कल से दोनों अपने-अपने काम पर वापस जाने वाले हैं।
शादी के लिए ली हुई छुट्टियाँ पता ही नहीं चला कब खत्म हो गईं। शादी के बाद आज आठवां दिन है। हनीमून पर नहीं जा सकी क्योंकि शोएब की कल महत्वपूर्ण मीटिंग है। MNC के मैनेजर को मीटिंग्स और क्लाइंट्स के मामले में कोई बहाना नहीं चलता।
पर कोई बात नहीं। दिवाली की छुट्टियों में यूरोप टूर का वादा किया है शोएब ने।
इन्हीं ख्यालों में खोई हुई अमायरा को पता ही नहीं चला कि कब मम्मीजी किचन में आ पहुँचीं।
"बेटा, मुझे मामूजान को मिलने जाना है। आजकल उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती। जुलेखा खाला भी जा रही हैं, तो मैं भी मिलकर आती हूँ। तुम लंच में भिंडी की सब्ज़ी बना लेना।"
अमायरा: "जी मम्मीजी। आज शाम की चाय में कुछ स्पेशल बनाती हूँ। कल से तो साथ में शाम की चाय भी नसीब नहीं होगी।"
मम्मीजी मुस्कुराते हुए: "जैसी तुम्हारी मर्ज़ी।"
अपने परफेक्ट पति, परफेक्ट मैरिड लाइफ और परफेक्ट ससुराल के बारे में सोचकर अमायरा मन ही मन मुस्कुराती है।
तभी रुखसाना आवाज़ देती है, "भाभी, रोटी बना दी है। भिंडी भी काटकर रखी है। मैम ने बोला था कि भिंडी आप बनाएँगी। आप छौंक दे दीजिए।"
अमायरा: "हाँ, मैं बना देती हूँ।"
अमायरा ने साथ में कस्टर्ड भी बना दिया। देखते ही देखते लंच टाइम हो गया।
शोएब डाइनिंग टेबल पर आकर बैठ गया। अमायरा ने रुखसाना से जल्दी लंच सर्व करने को कहा।
पर यह क्या—कस्टर्ड में फल डालना तो वह भूल ही गई। वह जल्दी-जल्दी फल काटने लगती है।
तभी जोर की आवाज़ आती है—जैसे किसी ने प्लेट गिरा दी हो या फेंक दी हो।
वह दौड़कर डाइनिंग रूम में जाती है—"शोएब, आप ठीक तो हैं? क्या हुआ?"
पर यह क्या—शोएब का चेहरा गुस्से से लाल था।
अमायरा कुछ समझे उससे पहले शोएब उसके बाल खींचकर कहता है—
"यह भिंडी की सब्ज़ी है या नमक की? इतना नमक खिलाकर मुझे मारना चाहती हो क्या? तुम्हारी अम्मी ने सब्ज़ी बनाना भी नहीं सिखाया?"
यह कहकर शोएब अपने कमरे में चला जाता है।
अमायरा के पैरों तले ज़मीन खिसक जाती है। उसे लगता है जैसे उसकी परफेक्ट दुनिया एक भ्रम थी, जो टूट गई।
रुखसाना चुपचाप टूटे हुए प्लेट के टुकड़े उठाने लगती है। वह अमायरा की ओर देखती है और सिर झुका लेती है—मानो कह रही हो—यही सच है। यही इस घर का सच है।
कुछ देर बाद शोएब फोन पर किसी दोस्त से बात करते हुए घर से निकल गया, जैसे कुछ हुआ ही नहीं।
अमायरा अपने कमरे में जाकर सोफे पर बैठ गई। उसका सिर चकरा रहा था। वह चाहती थी कि कोई उसे इस बुरे सपने से जगा दे। आँसू पोंछते हुए उसे पिछली बातें याद आने लगीं।
उसे याद आया, उस दिन मम्मीजी के पर्स से गिरी एक रसीद। जब अमायरा ने पढ़ी तो मम्मीजी ने डरते हुए उसके हाथ से ले ली।“मम्मी, यह कैसी संस्था है जिसमें आपने एक लाख रुपये दान दिए?”
मम्मीजी: “बेटा, यह घरेलू हिंसा की पीड़ित महिलाओं की मदद करने वाली संस्था है।”
अमायरा: “अच्छा! यह तो बहुत अच्छी बात है। आप छिपा क्यों रही हैं?”
मम्मीजी: “बेटा, दान ऐसे करना चाहिए कि एक हाथ से दो तो दूसरे को भी पता न चले। सबको पता चल जाएगा तो अल्लाह के यहाँ अज्र कम हो जाएगा। तुम भी किसी को मत बताना।”
धीरे-धीरे सारी बातें साफ़ होने लगीं। जब भी अमायरा ने कोई सलाह माँगी, मम्मीजी ने कहा — “अपने पापा या शोएब से पूछो।” कभी उन्होंने खुद से कोई फैसला नहीं लिया। निकाह का जोड़ा कैसा हो, रिश्तेदारों के लिए क्या लेना है — हर फैसला पापा या शोएब ने ही लिया।
इन्हीं ख्यालों में खोई थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई। अमायरा ने दरवाज़ा खोला — मम्मीजी थीं। अमायरा उनके गले लगकर रोने लगी, मानो कह रही हो — “मम्मीजी, आप कैसे इतना सब सह लेती हैं?”मिसेज़ मालिक ने उसके माथे को चूमते हुए उसे थाम लिया। उनकी आँखों के आँसू जैसे माफ़ी माँग रहे थे। फिर वह खुद पर काबू न रख सकीं और अपने कमरे में चली गईं।
अमायरा ने आँसू पोंछे और अपना बैग पैक करना शुरू किया। उसने तय कर लिया — वह अब और बर्दाश्त नहीं करेगी। बैग लेकर बाहर आई। मम्मीजी ने रोकने को हाथ बढ़ाया, पर फिर खुद को रोक लिया — “अगर मैंने यह फैसला पहले दिन लिया होता, तो आज तुम्हारे साथ ऐसा नहीं होता।” यह सोचकर वह कुछ नहीं बोलीं।
अमायरा कैब में बैठकर चली गई। रास्ते में उसने अपनी बेस्ट फ्रेंड शबनम को फोन किया और सब बताया। शबनम ने कहा, “तूने बिल्कुल सही किया, अमायरा। तू अपने अम्मी के घर जा। मैं आंटी को फोन कर देती हूँ।”
अमायरा सोचती रही — “क्यों शोएब या पापाजी मेरे अब्बू जैसे नहीं हैं? अब्बू हमेशा अम्मी को इज़्ज़त देते हैं, हर छोटे-बड़े फैसले में उनकी राय लेते हैं। कभी-कभी अम्मी झुंझला कर कहती हैं — ‘आपको जो ठीक लगे करिए,’ फिर भी अब्बू उनसे पूछते हैं। यह उनका प्यार और सम्मान है।”
फिर अमायरा ने सोचा — “क्यों सारे मर्द अब्बू जैसे नहीं होते? भाईजान भी भाभी से कितना प्यार करते हैं। पर शोएब?”
आख़िर यह घरेलू हिंसा का सिलसिला कब खत्म होगा?आभा, सविता और अमायरा जैसी हज़ारों औरतों के ज़हन में यही सवाल है। घरेलू हिंसा समाज के लिए एक नासूर है। हर साल हज़ारों मामले दर्ज होते हैं, और उससे भी ज़्यादा दर्ज ही नहीं होते। जो घर सुरक्षा का स्थान होना चाहिए, वहीं महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं।
आख़िर इसे कैसे रोका जाए? काश, हर औरत अमायरा की तरह हिम्मत दिखाए और आभा व सविता की तरह इसे ज़िंदगी की मजबूरी न बना ले। इस समस्या की जड़ हैं— पितृसत्तात्मक सोच, आर्थिक निर्भरता, डर और सामाजिक बदनामी, शिक्षा की कमी।
भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए कड़े कानून मौजूद हैं, जैसे:
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005
यह अधिनियम महिलाओं को शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और यौन हिंसा से सुरक्षा देता है। पीड़िता को घर में रहने का अधिकार, संरक्षण आदेश मिल सकते हैं।
भारतीय दंड संहिता की धारा 498A
पति या उसके परिवार द्वारा क्रूरता के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।
इसके अलावा:हेल्पलाइन 181,महिला पुलिस स्टेशन, फास्ट ट्रैक कोर्ट। राष्ट्रीय महिला आयोग का पोर्टल (14490) भी उपलब्ध हैं। लेकिन फिर भी घरेलू हिंसा एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है। ज़रूरत है समाज को जागरूक करने की। बेटियों का साथ देने की और बेटों को सही शिक्षा देने की। क्योंकि जब बेटे समझेंगे, तभी बेटियाँ सुरक्षित होंगी।
मोहसिना
गुजरात