" नेकदिल मर्द और पाकीज़ा ख़ातून "
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साहित्य

" नेकदिल मर्द और पाकीज़ा ख़ातून "

(अंतिम भाग)

कॉफी वक्त बीत जाने के बाद भी शहर के लोग मुन्ने खाँ को याद करते रहे। लोग अक्सर बैठकर उनकी चर्चा करते रहते। चर्चा की एक वजह ये भी थी कि लोग उनकी बेवा पत्नी मुन्नी बेगम का हाल चाल जानने को बैचेन रहते थे। 

जब मुन्ने ख़ाँ ज़िंदा थे उस वक्त कुछ लोग तो हक़ीक़त में मुन्ने खाँ की पत्नी की वजह से ही सब्ज़ी लेने जाते थे। ताहम जो भी गाहक अगर सब्ज़ी लेने उनकी दुकान पर जाते थे, उनके बारे में यही माना जाता था कि वे मुन्ने ख़ाँ की पत्नी की वजह से जाते हैं। लोगों का यह मानना था कि जबसे मुन्नी बेग़म दुकान पर बैठने लगीं हैं तब से मुन्ने खाँ की दुकान पहले से ज़्यादा चलने लगी है। 

मानव कुमार जी, धर्म लाल गुप्ता और पप्पू यादव की मुन्ने खाँ से बहुत गहरी छनती थी। चारों आपस में सुख दुख के साथी थे लेकिन लोग इन लोगों व मुन्नी बेगम को लेकर अक्सर उलटी सीधी बातें करते रहते थे। अब भी लोगों में उन लोगों के बारे में काना फूसी चलती रहती है। यहाँ तक कि उनके घर में भी इसी मामले को लेकर किड़ी कोंकों मची रहती थी। 

मुन्ने ख़ाँ की मौत के बाद से मुन्नी बेग़म ने दुकान पर बैठना बन्द कर दिया क्योंकि वो इद्दत में हैं इसलिये उसका बेटा पप्पू दुकान पर बैठता है। तो भी अक्सर पुराने गाहक किसी न किसी बहाने से पप्पू से मिलने आते और मुन्नी बेगम के हाल चाल जानने की कोशिश करते। कुछ दिन बाद मानव कुमार जी व उनके साथी धर्म लाल गुप्ता, सरदार लखपत सिंह, दौलत खाँ ड्राईवर, डेविड और पप्पू यादव ने समझा बुझा कर पप्पू को फिर से दुकान शुरू करवा दी और रोज़ उसके हाल चाल पूछने आया करते हैं।

शहर के मर्द ही नहीं बल्कि औरतें भी मुन्नी बेग़म की निजी ज़िन्दगी में दिलचस्पी लेती हैं और आपस में उनकी बातें नमक मिर्च लगाकर करती रहती हैं। ख़ुद तो वो उनकी दुकान से सब्ज़ी ख़रीदना पसंद करती पर परिवार के मर्दों को उनकी दुकान से सब्ज़ी ख़रीदने से रोकती हैं। 

क़मरून्निसा और कामना देवी की नज़र में मुन्नी बेग़म की इज़्ज़त है और वे उन्हें शरीफ़ और पाकीज़ा औरत समझती हैं। लेकिन कामना देवी को मानव कुमार जी का उनकी दुकान पर जाना आज भी पसंद नहीं जबकि मुन्नी बेग़म ने दुकान पर बैठना बंद कर रखा है। हालाँकि वे दोनों मुन्नी बेग़म की ख़ैर ख़बर लेती रहती हैं और इद्दत के पीरियड में हर दूसरे तीसरे दिन उनके घर जाती रहती हैं। 

आज भी क़मरून्निसा के आते ही कामना देवी उनके घर के लिये चल पड़ीं। रोज़ की तरह आज भी रास्ते में क़मरून्निसा बताती रही, ’’इद्दत के दौरान मुन्नी बेग़म बिल्कुल घर से बाहर नहीं निकलेंगी। हर मुस्लिम बेवा को शौहर की मौत के दिन से चार महीने दस दिन की मुद्दत तक अपने पति के घर के अंदर गुज़ारना पड़ती है। इस दौरान वह किसी ग़ैर मर्द से नहीं मिल सकती है और न ही दूसरी शादी कर सकती है। इस के पीछे एक ख़ास मक़सद ये है कि अगर वो प्रेगनेंट होती है तो इस पीरियड में ये मालूम हो जाता है कि होने वाला बच्चा है और पति के ख़ानदान का वारिस माना जाता है। उसके सारे अधिकार व कर्तव्य अपने मरहूम बाप के परिवार के प्रति होते है।’’

कमरून्निसा की बात सुनकर कामना देवी बोलीं, ’’ये तो बिल्कुल बायलॉजिकल सिद्धान्त के मुताबिक है। इस वजह से कोई भी किसी विधवा के चरित्र पर उंगली नहीं उठा सकता और न ही क़ानूनन विरासत के बंटवारे में कोई अड़चन आ सकती है।’’

क़मरून्निसा ने बात को आगे बढ़ाते हुये कहा ’’इद्दत के बाद भी एक बेवा औरत का गै़र मर्दों से मिलना जुलना अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता लेकिन वो चाहे तो इस पीरियड के बाद दूसरा निकाह कर सकती है। हालाँकि हिन्दु बेवाओं की तरह आम तौर पर अपने देश की मुस्लिम बेवाएं दूसरी शादी से परहेज़ करने लगी हैं।’’

कामना देवी क़मरून्निसा से इद्दत के बारे में इतनी जानकारी कई बार सुन चुकी हैं अलबत्ता आज एक नई बात मालूम हुयी कि आज मुन्ने खाँ को मरे चार माह दस दिन हो गये और इद्दत की मुद्दत पूरी हो चुकी है। मुन्नी बेग़म के मायके से रिश्तेदार आये हैं और कुछ दिन के लिये अपने साथ ले जायेंगे। इसी वजह से ख़ास तौर पर कामना देवी और वे मुन्ने खाँ के घर जा रही हैं। 

जब वे मुन्नी बेगम के घर पहुँचीं तो काफी औरतें इकट्ठा थीं। मुन्नी देवी ने सफेद रंग का सलवार कुर्ते का सूट पहन रखा था। सफेद दुपट्टे से सिर ढांके हुये थीं। बिल्कुल परी जैसी दिखाई दे रही थीं। मुन्नी बेग़म को देखकर कामना देवी के मन में ख़्याल आया कि ’’इतनी जवान और ख़ूबसूरत औरत बाकी पहाड़ जैसी ज़िंदगी अकेले कैसे काटेंगी?’’ 

कामना देवी को देखकर मुन्नी बेग़म के चेहरे पर चमक आ गयी। चहक कर बोलीं, ’’आओ दीदी मैं आप ही का इंतज़ार कर रही हूँ। मैं आज मायके जा रही हूँ। मेरे भाई और भाभियाँ लेने आये हैं। पप्पू के बाल बच्चे भी जा रहे हैं, क़रीब एक हफ्ते बाद लौटूंगी। फिर सबसे पहले आपके घर आऊँगी। आप लोगों ने हमारा बहुत साथ दिया है। मैं आपके अहसान कभी नहीं भूलूंगी।’’ कहते हुये उसकी आँखों में आँसू आ गये। 

कामना देवी ने उनको गले से लगा लिया और बोलीं, ’’अपना ख़्याल रखना। ज़्यादा ग़म नहीं करना। मैं मोबाईल से तुम्हारी ख़ैरियत पूछती रहूँगी।’’

एक हफ्ते बाद पप्पू अपने बाल बच्चों के साथ वापिस आ गया। लेकिन मुन्नी बेगम वापिस नहीं आयीं। पूछने पर मालूम हुआ कि रिश्तेदारों ने रोक लिया है, लगभग एक माह बाद आयेंगी। कामना देवी ने मोबाईल से एक दिन उनसे बात की और ख़ैर ख़ैरियत पूछने के बाद वापिस न आने की वजह पूछी तो मुन्नी बेग़म ने कहा कि आने पर बताऊँगी। 

मुन्नी बेगम एक माह बाद भी वापिस नहीं आयीं। दो माह भी गुज़र गये। कुछ दिन बाद पप्पू और उसके बच्चों को भी बुला लिया। शहर के लोगों की चिमगोइयाँ और बढ़ने लगीं। कोई कहता उमरा करने गयीं हैं, कोई कहता हज करने गयीं हैंकोई कहता सेहत ख़राब है, कोई कुछ कहता, कोई कुछ कहता। लोगों का ख़्याल था कि क़मरून्निसा और कामना देवी को सही बात की ख़बर है लेकिन वो किसी को बताती नहीं। 

और एक दिन, मुन्नी बेगम वापिस आयीं और सीधी कामना देवी के घर पहुँचीं। कामना देवी और मानव कुमार दोनों यकबयक देखकर हक्के बक्के रह गये। आज मुन्नी बेगम सफेद कपड़े नहीं पहने थीं। हल्के गुलाबी रंग के सलवार कुर्ते में एकदम यंग, तरोताज़ा और ख़ुशनुमा दिखाई दे रहीं थी। चेहरे से नूर टपक रहा था। 

मुन्ने खाँ को मरे लगभग छः महीने गुज़र चुके थे लेकिन इसके पहले कभी वो इस तरह नज़र नहीं आयीं थीं। उनके साथ एक अधेड़ उम्र के मौलवीनुमा शख़्स थे जिनके चेहरे पर दाढ़ी थी लेकिन और मौलाना लोगों की तरह कपड़े नहीं पहने बल्कि पेंट शर्ट पहने थे।

मुन्नी बेग़म एक दम से आकर कामना देवी से लिपट गयीं और बड़ी देर तक लिपटी रहीं। कामना देवी ने छुड़ाने की कोशिश भी की मगर बड़ी देर तक नहीं छोड़ा। यहाँ तक उनके आँसूओं से कामना देवी के कपड़े भीग गये। 

यूं ही लिपटे हुये बोलीं, ’’कम्मो दीदी मुझे माफ करना। मैं आपकी गुनाहगार हूँ, आपको ख़बर नहीं दे सकी। मेरे साथ जो मियाँ साहब आये हैं मेरे बच्चों के नये अब्बाजान हैं, ये मेरे दूर के रिश्तेदार हैं। इन्होंने मेरे साथ निकाह कर लिया है। मैं निक़ाह के बाद सबसे पहले आपके यहाँ लेकर आयीं हूँ।’’ 

कामना देवी ने जल्दी से मुन्नी बेग़म को अलग करते हुये उनके नये पति से बहुत ही अदब से कहा, ’’आईये दूल्हा भाई! बैठिये। मैं अपनी सहेली से मिलने की ख़ुशी में आपको पूछना ही भूल गयी।’’

 मानव कुमार जी फौरन उन साहब को गले से लगा लिया और हाथ पकड़ कर बैठक में ले आये। इतनी देर में उनका बेटा राजू, बहु सुधा भी बैठक में आ चुके थे। क़मरून्निसा भी मुन्नी बेग़म के आने की ख़बर सुनकर भागी भागी चली आयीं। मुन्नी बेग़म ने अपने मियाँ साहब से उन सब को मिलवाते हुये कहा, ’’मैं इन्हीं लोगों का आपसे अक्सर ज़िक्र करती रहती थी। ये पप्पू के अब्बाजान के ख़ास दोस्त थे। हम लोगों का मुसीबत में इन लोगों ने बहुत साथ दिया।’’

थोड़ी देर में मानव कुमार जी के घर पर शहर के लोगों की भीड़ लग गयी। जिसने सुना वो भागा चला आ रहा था। मुन्नी बेगम की दास्तान सुनकर सबको हैरत भी थी और ख़ुशी भी। सब ने पप्पू और उसके नये अब्बा जान से मिलकर ख़ुशी का इज़हार किया। मानव कुमार ने धर्म लाल गुप्ता, सरदार लखपत सिंह, दौलत खाँ ड्राईवर, डेविड और पप्पू यादव वगैरह मुन्ना खाँ के तमाम पुराने दोस्तों और अपने ख़ास दोस्तों को मय फेमिली के डिनर की दावत का ऐलान भी कर दिया। 

शाम का खाना सबने साथ साथ खाया। मुन्नी बेग़म तो उसी दिन वापिस जाना चाहती थीं। लेकिन कामना देवी मानव कुमार जी ने उन्हें रोक लिया और दो दिन बाद इस तरह विदा किया जिस तरह भाई के घर से किसी बहिन की विदा होती है।

इस दौरान मुन्नी बेगम ने बताया कि ’’मियाँ साहब मदरसे में मौलाना हैं। माँ बाप बचपन में चल बसे थे। दो बहिनों और छोटे भाईयों को पाल पोस कर बड़ा किया और शादी ब्याह किये इस लिये ख़ुद अपनी शादी के बारे में सोच नहीं पाये। बहुत शरीफ इंसान हैं। मेरे लिये तो पप्पू के अब्बाजान ही सब कुछ थे। मैं तो उनकी यादों को सीने से लगाये अपने बच्चों के सहारे जीना चाहती थी। लेकिन लोगों ने समझाया। ख़ासकर इनकी बहिनों ने कहा कि हमारे भाई ने हम लोगों के लिये बहुत क़ुर्बानी दी है। अगर मैं उनसे निकाह कर लूं तो मुझे भी ज़िंदगी अकेले नहीं काटनी पड़ेगी और इनके हालात भी सुधर जायेंगे।’’


ज़हीर ललितपुरी

कवि व साहित्यकार, उत्तर प्रदेश

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