छात्र आंदोलन : देशद्रोह या लोकतांत्रिक आवश्यकता
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छात्र आंदोलन : देशद्रोह या लोकतांत्रिक आवश्यकता

भारतीय विश्विद्यालयों में होने वाले छात्र आंदोलन समय–समय पर चर्चा के विषय बनते रहते हैं। जहां विद्वानों द्वारा छात्रों के इन प्रतिरोधों को व्यावहारिक राजनीति की पहली सीढ़ी और लोकतंत्र की आवश्यकता कहा जाता है वहीं कुछ समूह इन्हें देशद्रोह की संज्ञा से भी नवाज़ते हैं। देश के हर बड़े सामाजिक और राजनीतिक दल ने अपने अधीन एक छात्र संगठन खड़ा किया हुआ है। यह छात्र संगठन अपने पैतृक संगठन की विचारधारा को युवा वर्ग में आगे बढ़ाने और संगठन को नेतृत्व प्रदान करने का कार्य करते हैं।

विकिपीडिया पर मौजूद आंकड़ों के मुताबिक़ देशभर में 30 से ज़्यादा राष्ट्रीय स्तर के छात्र संगठन मौजूद हैं, इन संगठनों से जुड़े छात्रों की संख्या लाखों में हैं। वहीं देशभर के हज़ारों महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में छात्र संघ के चुनाव भी आयोजित करवाएं जाते हैं। जिनमें मुख्यधारा के राजनीतिक दलों से संबद्ध छात्र संगठनों के छात्र हिस्सा लेते हैं और अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करते हैं। वर्तमान राजनीति के मुख्य चेहरों जैसे अशोक गहलोत, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव और अरुण जेटली ने भी अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत छात्र संघ चुनावों से ही की है।

मुख्यतः छात्रों के ये आंदोलन छात्र हितों के लिए होते रहे हैं जैसे कि कभी फीस वृद्धि के विरुद्ध तो कभी हॉस्टल और अन्य समस्याओं को लेकर, लेकिन कभी कभी ये आंदोलन मुख्यधारा के राजनीतिक मुद्दों से भी जुड़े हुए नज़र आते हैं। विशेषकर केंद्रीय महाविद्यालयों के छात्र आंदोलनों में ये प्रवृति देखी जाती है कि वह सामाजिक मुद्दों और सरकार के अनुचित कार्यों व निर्णयों के विरोध में भी अपनी आवाज़ बुलंद करते हैं।

यह आंदोलन जब सत्तापक्ष के विरुद्ध होते हैं तो सत्ताधारी दल इसके जवाब में ऐसा नरेटिव तैयार करने की कोशिश करता है कि यह आंदोलन सत्तापक्ष के विरुद्ध नहीं बल्कि देशविरोधी है। यहां तक कि आंदोलनकारी छात्रों को देशद्रोही बताकर UAPA जैसे सख़्त कानूनों का इस्तेमाल कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया जाता है।

हम इस लेख में आगे यही समझने की कोशिश करेंगे कि भारत में छात्र आंदोलनों का इतिहास क्या है, छात्र आंदोलन लोकतंत्र के लिए कितने आवश्यक और लाभकारी है और आखिर क्यों इन्हें देशद्रोह का झूठा नरेटिव तैयार कर दबा दिया जाता है।

भारत में छात्र आंदोलन का इतिहास

भारत में छात्र आंदोलन का इतिहास आज़ादी से भी पहले का रहा है। 1848 में दादाभाई नौरोजी ने स्टूडेंट्स साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसाइटी की स्थापना कर छात्रों को संगठित मंच दिया था, जिसे भारत में छात्र आंदोलन की प्रारंभिक नींव माना जाता है। कलकत्ता में 1902 में सतीशचंद्र मुखर्जी ने ‘इंडियन यूनिवर्सिटी कमीशन रिपोर्ट’ के विरोध में ‘डॉन सोसाइटी’ नाम से एक छात्र संगठन की बुनियाद डाली थी। 1913 में किंग एडवर्ड मेडिकल कॉलेज, लाहौर में छात्रों ने अंग्रेज़ और भारतीय छात्रों के बीच अकादमिक भेदभाव के खिलाफ पहली संगठित छात्र हड़ताल की था। 

इसी तरह देश की स्वतंत्रता के लिए हुए स्वदेशी आंदोलन और असहयोग आंदोलन में भी छात्रों ने अग्रणी भूमिका निभाई थी। असहयोग आंदोलन के दौरान छात्रों ने स्कूलों और कॉलेजों का बहिष्कार किया था और अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए थे। 12 अक्टूबर 1920 को अलीगढ़ कॉलेज (वर्तमान नाम अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी) के यूनियन क्लब में छात्रों ने एक सभा का आयोजन किया था और इसमें महात्मा गांधी, मौलाना मुहम्मद अली जौहर और मौलाना शौकत अली को छात्रों को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। 

इसी दौर में बंबई में भी छात्रों की एक सभा को गांधी जी ने संबोधित किया था। इसी तरह गांधी जी की दांडी यात्रा में भारत नौजवान सभा,यूथ लीग जैसे संगठनों से जुड़े और कई कॉलेजों के छात्रों ने बढ़ चढकर हिस्सा लिया था। गांधी जी की गिरफ्तारी के विरोध में भी छात्रों द्वारा कई कॉलेजों में हड़ताल रखी गई थी। इस प्रकार हम कह सकते है कि आज़ादी के आंदोलन में छात्रों और छात्र सभाओं ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 

भारत में औपचारिक रूप से स्थापित किया गया पहला छात्र संगठन ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन है। जिसकी बुनियाद 12 अगस्त 1936 को लखनऊ में रखी गई थी। इसकी स्थापना सभा का उद्घाटन प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने और अध्यक्षता मुहम्मद अली जिन्ना ने की थी। वहीं देश की स्वतंत्रता के बाद अगर हम देखें तो दिसंबर 1973 में गुजरात के मोरबी इंजीनियरिंग कॉलेज से शुरू हुआ छात्र आंदोलन फीस वृद्धि के विरोध से निकलकर महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ व्यापक जन–आंदोलन बन गया था।

लगातार प्रदर्शनों के दबाव में चिमनभाई पटेल की राज्य सरकार गिरी और इंदिरा गांधी ने फरवरी 1974 में गुजरात विधानसभा भंग कर दी थी। सन् 1974 में हुआ मशहूर जय प्रकाश नारायण आंदोलन या बिहार आंदोलन भी पहले छात्रों द्वार ही शुरू किया गया था। बाद में छात्रों ने इसका नेतृत्व समाजवादी और गांधीवादी नेता जय प्रकाश नारायण को सौंप दिया था।

छात्र आंदोलनों पर देशद्रोह का ठप्पा

आज़ादी के पहले से होते आ रहे छात्र आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को पहले केवल मतभेद और असहमति रखने वाले समूह के तौर पर देखा जाता था। लंबे समय तक सरकार में रही कांग्रेस ने भी छात्र आंदोलनों के दमन की कोशिश की लेकिन कभी इन विरोध स्वरों को देशद्रोह का नाम नहीं दिया था। पहली बार 2016 में किसी छात्र आंदोलन को देशद्रोह से जोड़ा गया था। जब दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम में देश विरोधी नारे लगाए जाने की अफवाह उड़ाई गई थी। 

उस समय की सत्ता दल भाजपा और अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने कार्यक्रम की फेक वीडियो वायरल की जिसमें देशविरोधी नारे सुनाई दे रहे थे। मामले के तूल पकड़ने पर आयोजक छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि बाद में जांच पड़ताल के बाद अदालत ने सभी छात्रों पर लगे आरोपों को बेबुनियाद पाकर रिहा कर दिया था। इस आंदोलन के मुख्य चेहरे वर्तमान में कांग्रेस नेता कन्हैया कुमार, सोशल एक्टिविस्ट उमर खालिद और अन्य थे। इसी तरह हैदराबाद विश्वविद्यालय में पीएचडी शोधार्थी रोहित चक्रवर्ती वेमुला की आत्महत्या ने भारतीय विश्वविद्यालयों में जातिगत भेदभाव, छात्र राजनीति और देशद्रोह के नैरेटिव को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी थी। रोहित वेमुला अंबेडकरवादी छात्र संगठन अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (ASA) से जुड़े हुए थे। 

संगठनात्मक गतिविधियों के कारण उन्हें संस्थागत रूप से निशाना बनाया गया और जुलाई 2015 में उनका मासिक वजीफ़ा रोक दिया गया था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) से जुड़े एक विवाद के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने रोहित समेत पाँच छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। इसी क्रम में भाजपा सांसद और तत्कालीन केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को पत्र लिखकर हैदराबाद विश्वविद्यालय को “जातिवादी, चरमपंथी और राष्ट्रविरोधी राजनीति का अड्डा” बताया, जिसके बाद छात्रों पर कार्रवाई और तेज़ हुई। कई अपीलों के बावजूद निलंबन बरकरार रखा गया और 17 जनवरी 2016 को रोहित ने आत्महत्या कर ली। उनकी मृत्यु के बाद शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और छात्रों के आंदोलनों को राष्ट्रविरोध और देशद्रोह के फ्रेम में पेश किए जाने की प्रवृत्ति पर भी गंभीर सवाल उठे थे।

इसी तरह भारत सरकार द्वारा 12 दिसंबर 2019 को लागू किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ व्यापक विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। इन विरोध प्रदर्शनों को शुरू करने में अहम भूमिका केंद्रीय विश्विद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों की थी। जामिया से शुरू हुआ ये आंदोलन उस समय शाहीन बाग के नाम से पूरे देशभर में फैल गया था। हालांकि बाद में कोरोना महामारी के कारण यह खत्म हो गया था। 

परंतु इस आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को UAPA जैसे कानूनों के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था जिसमें एक बड़ी संख्या छात्रों की थी। इनमें से कई आज भी बिना ट्रायल सलाखों के पीछे सज़ा काट रहे हैं। इस आंदोलन के समय भी मीडिया संस्थानों और सत्ता पक्ष ने इन विरोध प्रदर्शनो को देशविरोधी का नाम देने की कोशिश की थी।

हमें उक्त तीन आंदोलनों के उदाहरण से यह बात समझ में आती है कि किस तरह वर्तमान सत्ता अपने विरोधियों को देशद्रोही प्रमाणित करने की कोशिश करती है। वहीं अब हम आगे यह समझने की कोशिश करेंगे कि छात्र आंदोलन किस प्रकार एक अच्छे लोकतांत्रिक देश के लिए आवश्यक होते हैं।

छात्र आंदोलन : एक बेहतर लोकतंत्र का आवश्यक घटक

किसी भी देश में लोकतांत्रिक वातावरण बनाएं रखने के लिए आवश्यक होता है कि वहां  आलोचनात्मक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौजूद हो। सत्ता पक्ष विपक्ष की आलोचना बर्दाश्त करने का माद्दा रखता हो। सत्ता में बैठा दल जब–जब कोई अनुचित कदम उठाता है या कानून के दुरुपयोग की कोशिश करता है तो आवश्यकता होती है ऐसे संगठनों या विपक्ष की जो विरोध जताकर सत्तापक्ष को सही राह पर लाने का कार्य करें।

यह महत्वपूर्ण भूमिका मुख्यधारा के विपक्षी दलों के साथ–साथ छात्रों व युवाओं के संगठन और कॉलेज के छात्र संघ भी बख़ूबी निभाते रहें हैं।

छात्र संगठन के माहौल में रहकर छात्र एक सजग और वैचारिक नागरिक बनते हैं। जिन्हें देश के तमाम मुद्दों से सीधा सरोकार होता है। जो देश की प्रगति के बारे में विचार करते हैं। छात्र आंदोलनों में राष्ट्रीय स्तर तक का नेतृत्व तैयार होता है, इसके कई उदाहरण हमारे देश में मौजूद है। छात्र आंदोलन युवाओं को आंदोलन करने अपनी उचित मांगों को मनवाने का तरीका सिखाते हैं। इस अनुभव को वह बाद के जीवन में भी इस्तेमाल करते है और व्यावहारिक राजनीति के गुर सीखते हैं।

इतना ही नहीं हमें पूर्व में हुए छात्र आंदोलनों से यह बात समझ में आती है कि छात्र न सिर्फ़ कैंपस या राजनीति के मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं बल्कि वह सामाजिक मुद्दों और मौलिक अधिकारों के सम्बन्ध में भी खुलकर अपनी बात रखते हैं और आवश्यकता पड़ने पर विरोध भी दर्ज कराते हैं। 

हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में हुआ रोहित वेमुला आंदोलन जातिगत भेदभाव के विरुद्ध था, वहीं नागरिकता संशोधन अधिनियम के विरुद्ध हुआ आंदोलन मौलिक अधिकारों के लिए था और हाल ही में लखनऊ विश्विद्यालय उत्तर प्रदेश में जब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने यूनिवर्सिटी परिसर में मौजूद मस्जिद में ताला लगाकर बंद कर दिया तो मुस्लिम छात्रों के अधिकार की लड़ाई के लिए हिंदू छात्र आगे आएं हैं। यह सामाजिक सौहार्द जो लखनऊ विश्विद्यालय के हिंदू मुस्लिम छात्रों में देखने को मिला भारत जैसे बहुधर्मिक देश के सामाजिक वातावरण को बेहतर बनाएं रखने के लिए अति आवश्यक है।


मुहम्मद शुऐब शान (राजस्थान)


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