स्कूल जाने वाली उन मासूम बच्चियों का कसूर क्या था?
सुबह-सुबह उठकर तैयार होकर मां-बाप से गले मिलकर, आंखों में नए नए सपने संजोकर वे सारी लड़कियां अपने अपने घरों से स्कूल की ओर निकल पड़ी थीं। किसी को अपने अधूरे होमवर्क की फिक्र सता रही होगी तो कोई टीचर की ओर से दिए गए टॉस्क को पूरा कर खुशी खुशी कदम बढ़ाता हुआ जा रहा होगा। किसी को इस बात की खुशी रही होगी कि आज के लंच बॉक्स में उसकी पसंदीदा चीज़ मौजूद है। लगभग यही मंज़र रहा होगा उस समय का जब ईरान के मीनाब में हुए हमले में 156 बच्चियां मौत के मुंह में समा गईं। क्या कसूर था उन छोटी-छोटी मासूम बच्चियों का?
उन्हें तो यही भी नहीं पता था कि जिस स्कूल को वह सुरक्षित जगह और अपना दूसरा घर समझती हैं वह थोड़ी देर में राख के ढेर में बदलने वाला है। उन मासूम बच्चियों का इस युद्ध या यूं कहें कि ईरान पर थोपे गए युद्ध से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं था। संयुक्त राष्ट्र का मानवाधिकार कानून यह स्पष्ट रुप से कहता है कि युद्ध के दौरान स्कूल, अस्पताल और नागरिक स्थान जंग का निशाना नहीं बनना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र समेत सभी अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए जवाबदेही की मांग की है। लेकिन यह एक कड़वा सच है कि इज़रायल हमेशा से अंतर्राष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करता रहा है और उसको कोई भी नियंत्रित नहीं कर पाता।
गज़ा में किए गए युद्ध अपराध के लिए पहले से बेजामिन नेतन्याहू के विरुद्ध इंटरनेशनल कोर्ट में केस चल रहा है लेकिन उसके बावजूद उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। मीनाब की इस त्रासदी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध के इस आधुनिक रुप ने भले ही तरक्की कर ली हो लेकिन उसकी नैतिक संवेदनाएं बहुत पीछे छूट चुकी हैं। किसी भी सभ्यता की सबसे पड़ी परीक्षा यह नहीं कि वह आधुनिक तकनीक से लैस हो जाए बल्कि नैतिकता का पैमाना यह होता है कि वे महिलाओं, बच्चों और बेकसूरों को लेकर कितनी संवेदनाएं रखते हैं।
मीनाब के स्कूल की यह घटना और इससे पहले गज़ा में किए गए इज़रायल के युद्ध अपराध यह दर्शाते हैं कि इज़रायल एक समाज और सभ्यता के रुप में बुरी तरह फेल हो चुका है और उसको समर्थन देने वाले अमेरिकी नेताओं की इंसानियत की मिसाल तो पहले ही एपस्टीन फाइल के ज़रिए दुनिया के सामने आ चुकी है।
युद्ध और इस्लामी शिक्षाएं
इतिहास गवाह है कि इस्लाम ने युद्ध के दौरान भी नैतिक सीमाएँ निर्धारित कीं। बड़े से बड़े युद्ध हुए लेकिन कभी इस तरह की हैवानियत का कहीं सबूत नहीं मिलता। फतह मक्का के समय मुहम्मद सल्ल० का आम माफ़ी का ऐलान इस बात का प्रतीक है। आप सल्ल० ने उस समय स्पष्ट निर्देश दिए थे कि औरतों, बच्चों, बूढ़ों और इबादत में लगे लोगों को नुकसान ना पहुँचाया जाए।
एक बार ख़लीफ़ा अबू बक्र ने अपनी सेना को रवाना करते समय कहा था:
किसी बच्चे, औरत या बूढ़े को हानि न पहुँचाना
पेड़ों, फ़सलों और बस्तियों को नष्ट न करना
इबादतगाहों में रहने वालों को न छेड़ना
क़ुरआन में कहा गया है: “जिसने एक निर्दोष की हत्या की, उसने पूरी मानवता की हत्या की।” (सूरह अल-माइदा 5:32)
जब पूरी दुनिया युद्ध के संकट से गुज़र रही है और मानवता पर प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है तो हमें ऐसे में मानवता के अस्तित्व को बचाए रखने के लिए इस्लामी शिक्षा की आवश्यकता है। इतिहास से सबक लेने की आवश्यकता है और लोगों को इंसानियत का महत्व बताने की आवश्यकता है। साथ ही अपने हित के लिए पूरी दुनिया को युद्ध की आग में धकेलने वाले अमेरिका और इज़रायल को यह सबक सिखाने की आवश्यकता है कि इंसानियत ही किसी देश और सभ्यता के अस्तित्व को बचा सकती है। ताकि आगे कोई मीनाब ना बन सके, कोई हिंद रजब बेरहमी से कत्ल ना हो सके, फिर कोई गज़ा ना उजड़ सके।
आरिफ़ा परवीन
प्रधान संपादक