'' समय की डोर से जकड़े मासूम बच्चे ''
अपेक्षाओं में दबा हुआ बचपनः अब बच्चों का बचपन खेलकूद, शरारत, सामाजिक मेलजोल और बचपन की खुशियों का मज़ा उठाने के बजाए शिक्षा और कुछ बनने के सपने के अधीन गुज़रने लगा है। माता-पिता बच्चों पर दबाव बनाने लगे हैं। हंसते-खेलते पढ़ने और सीखने का मज़ा एंजॉय करने के बजाय उनके दिमाग और याद्दाश्त पर दबाव बनाकर कमज़ोर कर दिया गया है। बच्चों का बचपन अब “निवेश” बन चुका है। माता-पिता सोचते हैं कि आज एक दो लाख रुपये लगा देंगे तो 18 साल की उम्र में आईआईटी से एक करोड़ का पैकेज मिलेगा। यह एक प्रकार का एजुकेशनल जुआ बन चुका है। बचपन बच्चों की शिक्षा की तैयारी में लगा दिया गया और नौवीं कक्षा तक पहुंचते पहुंचते उन पर बोझ लाद दिया गया।
यह ट्यूशन और कोचिंग कल्चर देश में शैक्षिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। नौवीं कक्षा से लेकर इंजीनियरिंग, मेडिकल, सिविल सर्विसेज़ और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए यह एक सामान्तर एजुकेशन सिस्टम का रुप धारण कर चुका है।
कोचिंग कल्चर को बढ़ावा देने वाले कारकः समाज की आवाज़ों ने माता-पिता को समझाया कि यह प्रोफेशनल एजुकेशन ही उनके बच्चे के भविष्य की रक्षा का एकमात्र साधन है, इसीलिए अतिरिक्त शैक्षिक खर्च माता-पिता के लिए आसान रास्ता नज़र आने लगा है, लेकिन उसका प्रभाव समय के साथ छात्र और अभिभावक के मनोविज्ञान पर गहरा असर डाल रहे हैं। देश की कोचिंग इंडस्ट्री, जो जेईई, नीट, यूपीएससी और अन्य परीक्षाओं की तैयारी कराती है, एक समान्तर एजुकेशन इकोनॉमी का रुप धारण कर चुकी है।
2024 में उसकी नेटवर्थ लगभग 58,000 करोड़ (लगभग 7 बिलियन डॉलर) थी, जो 2028 तक 1.3 लाख करोड़ (170 बिलियन डॉलर) तक पहुंचने की उम्मीद है। इसके ज़रिए रोज़गार के अवसर और देश की जीडीपी को तो फायदा पहुंचता है लेकिन परिवारों पर आर्थिक बोझ, असमानता और सामाजिक लागत बढ़ती है।
कोचिंग कल्चर के प्रभावः जहां इन एकेडमियों ने कुछ छात्रों के रिज़ल्ट को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है वहीं इसने सामाजिक स्थिति को भी प्रभावित किया है। इसका फायदा यह है कि लाखों नौकरियां (टीचर्, स्टॉफ, टेक सपोर्ट) से अर्थव्यवस्था को फायदा मिला है। जैसे कोटा की 25 से 30 प्रतिशत जीडीपी इसका उदाहरण है। ऑनलाइन एकेडमी ने गरीब, ग्रामीण बच्चों को सस्ती शिक्षा दी और घर घर शिक्षा पहुंचाने में मदद की है। विभिन्न प्रतिभाओं, डेवलपमेंट और लर्निंग प्रोग्राम्स से सफलता का प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन इन फायदों का अवलोकन जब हम इनके नुकसान और इससे उपजी समस्याओं से करते हैं तो स्थिति अलग नज़र आती है।
आर्थिक बोझ बढ़कर 5 से 15 लाख प्रति कोर्स तक बढ़ जाता है। जो आमतौर पर मिडिल क्लास फैमिली को कर्ज़ के बोझ तले दबा देता है। मानसिक स्वास्थ्य पर बुरी तरह प्रभाव पड़ता है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, 2022 में 13,000 से अधिक छात्रों ने परीक्षा में मिली असफलता के चलते आत्महत्या कर लिया। यह सिस्टम समाज को बुरी तरह बांट रहा है।
इसके अलावा अमीर बच्चे फायदा उठाते हैं, जबकि गरीब बच्चे पीछे रह जाते हैं। इस कोचिंग सिस्टम ने स्कूली शिक्षा को बुरी तरह प्रभावित किया है। ग्यारहवीं और बारहवीं के छात्र अपनी क्लास से लगातार गायब रहते हैं। 80 से 90 प्रतिशत बच्चे स्कूल केवल अटेंडेंटस लगवाने जाते हैं। एक ओर केवल नीट/जेईई के लिए रट्टा लगवाया जाता है, जिससे सच्ची समझ और रचनात्मक प्रतिभा दब जाती है। कोचिंग सेंटर के मालिकों को और पढ़ाने वाले टीचिंग स्टॉफ को बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं होता है।
बच्चों को मोटिवेशनल स्पीकर्स के द्वारा केवल मिशन दिया जाता है और यही मिशन बच्चों को ज़िंदा लाश बना देता है। ट्यूशन फीस का कर्ज़, माता-पिता पर सामाजिक दबाव बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है, जिसकी विभिन्न रिपोर्ट्स हमारे सामने मौजूद है। कोटा (राजस्थान) आईआईटी-जेईई और नीट की तैयारी का सबसे बड़ा हब है। लाखों छात्र हर साल यहां आते हैं। कोचिंग इंडस्ट्री की इनकम अब अरबों रुपये में है।
इसी प्रकार दिल्ली (मुखर्जी नगर, राजेंद्र नगर) यूपीएससी, एसएससी बैकिंग की तैयारी का गढ़ माना जाता है और हैदराबाद, पूणे, बंगलुरु जैसे शहर भी आईटी हब बन चुके हैं। छोटे शहरों में भी अब Unacademy, Resonance, Akash, Allen, Physics Wala जैसे ब्रांड्स की ब्रांच खुल गई है। कोटा में लाखों छात्र जेईई और नीट जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं। दुर्भाग्यवश यह छात्रों के लिए आत्महत्या का स्थान बन चुके हैं। यह संकट केवल मानसिक तनाव, अकेलापन, मातापिता की अपेक्षाओं और असफलता के डर की वजह से जन्मा है।
2025 तक सरकार ने कई कदम उठाए हैं, जैसे हॉस्टल में एंटी रैगिंग डिवाइस, काउंसलिंग और कोटा कैरियर प्रोग्राम्स इत्यादि। मगर फिर भी आत्महत्या रुक नहीं रही है। जब हम आंकड़े, कारण, हालिया केसेज़ का अध्ययन करते हैं तो भयावह स्थिति सामने आती है।
एक महिला ने बताया कि मेरा अपना बेटा कोटा राजस्थान की एक घटना का चश्मदीद गवाह है। वहां एक छात्र ने अपने कम अंकों की सूचना अपने माता-पिता को देने के लिए वीडियो कॉल किया और रोते हुए कहा कि मेरे नंबर शुरु से कम हैं, लेकिन यहां की फीस आप लोगों ने कर्ज़ लेकर दी है और मुझे इसका एहसास है। मैं आप लोगों को खुशी नहीं दे सकता। यह कहते हुए उसने बल्ड से अपनी नस अपने माता-पिता के सामने काट ली। वीडियो कॉल पर पैरेंट्स दुहाई देते रहे, लेकिन उसने आत्महत्या कर ली। इसी प्रकार के अनगिनत केस प्रतिदिन देश में होते रहते हैं। एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) और स्थानीय पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक साल 2015 से 2019 के बीच कोटा में लगभग 95 केस दर्ज हुए।
2022 में आत्महत्या का अनुपात 26-32 था। हर महीने औसत 3 आत्महत्या होती थी। परीक्षा परिणाम के समय यह आंकड़ा बढ़ भी जाता है। 2024 में इन आंकड़ों में कमी आयी और इसका अनुपात 16-19 था। अर्थात आत्महत्या में 50 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई। लेकिन अब भी अगस्त और सितंबर में संगीन इज़ाफ़ा हुआ। 2025 दिसंबर तक आत्महत्या का आंकड़ा 14 से 19 के बीच रहा। मई माह तक इसमें तेज़ी और फिर कमी दर्ज की गई।
तनाव की इस स्थिति का विशेषज्ञों ने कई कारण बताया है जिसमें मुख्य कारण परीक्षा में मिली असफलता है। आत्महत्या का मूल कारण शैक्षिक सिस्टम की कमज़ोरियां हैं और ना ही यह शिक्षा बच्चों को सामाजिक सरोकार के काबिल बना रही है। एक रोबोट की तरह ज़िंदगी गुज़ारने वाला छात्र 12-15 घंटे रोज़ पढ़ाई कर रहा है। साप्ताहिक टेस्ट और रैंक 1000 के अंदर आने की मजबूरी है। यदि ना आ पाये तो असफलता को ज़िंदगी का समापन समझा जाता है।
अकेलापन और पारिवारिक दबावः 15-18 साल के बच्चे दूर दराज़ से आते हैं, घर से दूर, माता-पिता की “डॉक्टर या इंजीनियर बनो” का सपना लिए। दूसरी जगह का माहौल भी उनके लिए अनुकूल नहीं होता। हॉस्टल में अकेलापन, कोचिंग इंस्टीट्यूट का “टॉपर बनाव” का दबाव। बहुत ही मासूम दिमाग में मोटिवेशनल स्पीकर्स के द्वारा लाखों के पैकेज का सपना संजो दिया जाता है। उन्हें ज़िंदगी की वास्तविकता से रुबरु नहीं करवाया जाता बल्कि सपनों के हवाले कर दिया जाता है। जिस कारण बच्चे दिमाग से सेल्फ कंट्रोल खो देते हैं। कुछ केस में तो अफेयर या आर्थिक समस्याएं शामिल हैं, लेकिन उनमें से 80 प्रतिशत शैक्षिक तनाव से जुड़े हुए हैं।
रिसर्च बताती है कि क्लास 8 तक 90 प्रतिशत से अधिक बच्चों का करियर उनकी दिलचस्पी के अनुसार बदल जाता है। ओलंपियाड मेडलिस्ट भी जेईई में फेल हो जाते हैं और नॉन ओलंपियाड बच्चे AIR 1 ले जाते हैं। बच्चों का दिमाग 6 से 14 साल में रचनात्मकता, खेलकूद, सामाजिक महारथ के लिए होता है, ना कि रटने और दबाव के लिए। छोटे बच्चों में ट्यूशन कोचिंग का रुझान केवल शैक्षिक नहीं, माता-पिता की चिंता, कोचिंग इंडस्ट्री की लालच और आर्थिक प्रतियोगिता का मिला जुला परिणाम है।
बचपन को इनवेस्टमेंट पीरियड बना दिया गया है और उसकी कीमत बच्चों की मानसिक सेहत, खुशी और रचनात्मक प्रतिभाओं के द्वारा चुकाया जा रहा है। यदि माता पिता केवल एक नियम अपनाएं कि बच्चे को 14-15 साल तक खेलने, पढ़ने, गलतियां करने दें और उसके बाद अनुमान लगाएं कि वे क्या बनना चाहते हैं। तो शायद यह जुनून कम हो जाए। शिक्षा को हमेशा अध्यात्मिकता से जोड़ कर ही हासिल करना चाहिए।
बच्चों में यह कल्पना आम करने की ज़रुरत है। शिक्षा बिना किसी भेदभाव के इंसानियत को फायदा पहुंचाने वाली होनी चाहिए, वर्तमान सिस्टम उन्हें खुदगर्ज़ और सेल्फ सेंटर्ड बना रहा है। शिक्षा मानव हित का साधन है इस कल्पना के साथ हमें उन्हें शिक्षित बनाना चाहिए। कल्याणकारी कामों की कल्पना देनी चाहिए, शिक्षा प्राप्त करने के साथ साथ उसे सामाजिक जीवन में उसकी झलक हो यह बताना चाहिए।
शारीरिक फिटनेस और अच्छा खानपान, रिश्तों का ख्याल, और अल्लाह की खुशी हासिल करने की कल्पना ही बच्चे को मानसिक तनाव और मानसिक स्वास्थ्य के खराब होने से बचा सकती है, लेकिन फिलहाल यह रुझान तेज़ी से बढ़ रहा है और अब तो क्लास 1 और केजी के बच्चों के लिए भी प्री फाउण्डेशन क्लासेज़ शुरु हो गई हैं। ऐसी स्थिति में हमें इस साम्राज्यवादी कल्पना के विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिए।
ख़ान मुबश्शरा फ़िरदौस
संपादक, हादिया ई मैग्ज़ीन