समलैगिंकता
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इस्लाम दर्शन

समलैगिंकता


समलैगिंकता का मुद्दा

वर्तमान समय में जिन विभिन्न सेक्स को वैश्विक स्तर पर प्रसिद्धि मिली है, बल्कि एक गहरी साजिश के तहत इनको हवा दी गई है और भिन्न भिन्न बहानों से उनके समर्थन में माहौल बनाने और उन्हें कानूनी वैधता उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है, उनमें से एक घिनौना और घृणा योग्य तरीका वह है जिसे समलैगिंकता Homosexuality का नाम दिया गया है। यह वास्तव में दो शब्दों से मिलकर बना है। Homo प्राचीन यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है same (समान), जबकि Sexus का संबध लैटिन भाषा से है जिसका अर्थ है इच्छा पूरी करना। Homosexuality का अर्थ है किसी व्यक्ति का, चाहे वह पुरुष हो या महिला, अपने ही समान लिंग के किसी व्यक्ति के साथ संबध रखना और उसके द्वारा अपनी वासना को पूरा करना। इसे उर्दू में हम जिंसियत और हिंदी में समलैंगिकता कहा जा सकता है।

समलैंगिकता – विचार और दर्शन

प्रकृति ने सभी सजीव को ज़िंदगी गुज़ारने का एक तरीका दिया है। आरंभ से ही जिसका चलन उसकी प्राकृतिक तरीके पर ही आधारित रहा है और उन्होंने उससे कभी बगावत नहीं की। लेकिन मानव समाज को चूंकि आरंभ से ही विचार व स्वतंत्रता मिली हुई है, इसलिए उसके कुछ लोगों ने ज़िंदगी के उस चलन से बगावत कर ली। यह बगावत दूसरी समस्याओं के साथ यौन सबंध के तरीकों में भी रही। मानव इतिहास के कुछ दौर में ऐसे लोग पाए गए हैं जो अपने ही समान लिंग के द्वारा अपनी इच्छा पूरी करते थे, लेकिन ऐसे व्यक्ति को हर दौर में नफरत और निंदा की दृष्टि से देखा गया और उनके घृणित कार्य को समाज द्वारा स्वीकार नहीं किया गया, बल्कि उसे हर संभावित तरीके से उसकी निंदा की जाती रही। जिस कारण उन्नीसवीं सदी तक दुनिया के लगभग सभी देश में इस कार्य को घृणित व अपराध समझा जाता था, बल्कि कुछ देशों में उसकी सज़ा मौत थी।

पश्चिम में, वहां के कुछ विशेष परिदृश्य में, जब स्वतंत्रता समानता और मानव अधिकार की हवा चली तो उसका प्रभाव बहुत से सामाजिक मूल्यों पर पड़ा और उनकी नींव हिलने लगीं। कहा गया कि हर व्यक्ति स्वतंत्र पैदा हुआ है, वह अपनी मर्ज़ी का मालिक है, उसके विचार और कार्य पर किसी तरह की कोई सीमा निर्धारित करना उसकी स्वतंत्रता को रोकना और उसके किसी कार्य की बुनियाद पर उसके साथ किसी दूसरे व्यक्तियों से भिन्न व्यवहार करना मानव अधिकार का उल्लंघन है। समलैंगिकता को पश्चिम में एक कार्य के बजाय एक व्यवहार करार दिया गया है और उसके लिए बकायदा दर्शन मुहैया कराया गया।

समलैंगिक लोगों को चार ग्रुप में बांट दिया गया जिसमेः

  1. Lesbian – महिला, जो महिला के साथ संबध बनाने का रुझान रखे।

  2. Gay – पुरुष, जिसका पुरुष के साथ सबंध बनाने में रुझान हो।

  3. Bisexual – वह लोग (चाहे पुरुष हो महिला) जिनका पुरुष व महिला दोनों की ओर रुझान हो। किस ओर कितना रुझान है इसको नापने के लिए एक पैमाना तय किया गया जिसको kisney scale का नाम दिया गया।

  4. Transgender – वह व्यक्ति जिसमें पुरुष व स्त्री दोनों की विशेषता मौजूद हो। उन्हें हिजड़ा कहा जाता है।

इन चारों ग्रुप्स के लोगों को सामूहिक रुप से LGBT कहा जाता है। इनमें शामिल लोगों को एक समूह करार दिया गया और उनके आपसी संबध को प्राकृतिक करार देते हुए उनके समर्थन में आंदोलन चलाए गए और विभिन्न कानून दिलाए गए।

पश्चिम का आंदोलन को समर्थन

समलैंगिकता को जनता में भी गंदा और घिनौना कार्य समझा जाता था और देशों के कानून में भी इस पर सख्त सज़ाएं लागू थीं, इसलिए जो लोग अपने इस रवैये में लिप्त थे वह उसके इज़हार की हिम्मत ना कर पाते थे, लेकिन उन्नीसवीं सदी ईसवी के अंत से उसके हक में हवा बनने लगी। 

सबसे पहले चरण में इस कृत्य को कठोर दंड की सूची से बाहर निकाला गया। जिस कारण बीसवीं सदी ईसवी के शुरुआत में ही विभिन्न पश्चिमी देशों के कानून में बदलाव शुरु हो गया और इस कार्य की सज़ा को समाप्त किया गया। दूसरे चरण में LGBT समुदाय ने वैश्विक स्तर पर खुद को संगठित करना शुरु किया। इसके लिए उन्होंने विभिन्न जगहों पर प्रदर्शन किए, जिन्हें Pride Parade का नाम दिया गया और कई कांफ्रेंस आयोजित की गईं, जिन के द्वारा अपने अधिकार के लिए आवाज़ें बुलंद की। पहले ऐसे लोगों को सरकारी, प्रशासनिक और सैन्य पदों के लिए अयोग्य घोषित कर दिया गया था, लेकिन उनकी संगठित कोशिश और दबाव के आधार पर धीरे धीरे उनके अधिकार स्वीकार किए जाने लगे और उन्हें हर पद के योग्य घोषित किया जाने लगा। इस प्रकार सरकार, सैन्य, अदालत, प्रशासन समेत हर प्रकार के क्षेत्र में ऐसे लोग आने लगे जिन्होंने समलैंगिक होने का दावा किया और इसमें उन्हें ज़रा भी शर्म नहीं महसूस हुई। तीसरे चरण में ऐसे लोगों के लिए साझेदारी अधिनियम (Partnership act) लागू किए गए तथा अनुमति दी गई कि जिस प्रकार विभिन्न जोड़े शादी के बंधन में बंध कर एक साथ रहते हैं उसी प्रकार समलैंगिक जोड़े भी पार्टनर के रुप में खुद को रजिस्टर्ड करा सकते हैं और उसके आधार पर स्वामित्व, वरासत, इमीग्रेशन, टैक्स व सोशल सिक्योरिटी के अधिकार प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे जोड़ों को बच्चों को गोद लेने का अधिकार भी दिया गया। इस प्रकार समलैंगिकता के संबध में पिछले कुछ सालों का इतिहास बताता है किः-

था जो नाखूब बदतरिज वह खूब हुआ

भारत की स्थिति

भारत की गिनती भी ऐसे देशों में होती है जहां प्राचीन समय से समलैंगिकता को घृणित कृत्य समझा जाता रहा है। इसीलिए जब कानून का संपादन हुआ तो भी इसे अपराध की श्रेणी में शामिल किया गया। 1861 में निर्मित होने वाल भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में समलैंगिकता को एक गैरकानूनी कार्य और अपराध करार दिया गया, जिस पर दस वर्ष से उम्र कैद तक की सज़ा दी जा सकती है।

दुनिया के दूसरे देशों में हवा बदली तो उसके प्रभाव भारत पर भी पड़ने लगे और चारों ओर से यहां भी समलैंगिकता को अपराध की सूची से निकालने और उसे कानूनी रुप से वैध करार देने की आवाज़ें उठने लगीं। संयुक्त राष्ट्र संघ की ओर से भारत सरकार से इस धारा को समाप्त करने की मांग की गई, ताकि एचआईवी, एड्स के विरुद्ध लड़ने में आसानी हो। लॉ कमीशन ऑफ इंडिया ने सन् 2000 में अपनी 172वीं रिपोर्ट में कानून की इस धारा को समाप्त करने की सिफारिश की। इस आंदोलन में तेज़ी उस समय आयी जब एक सामाजिक संगठन नाज़ फाउंडेशन ने दिसंबर 2002 में भारतीय दंड सहिंता की इस धारा को समाप्त करने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट ने 2004 में इस याचिका को खारिज कर दिया तो उसके विरुद्ध फाउंडेशन ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, जिस पर उसे दोबारा हाईकोर्ट में लौटा दिया गया। इसके बाद फैसले पर प्रभाव डालने के लिए विभिन्न तरीके अपनाए गए। एक ओर विभिन्न समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों की ओर से समलैंगिकता का समर्थन कराया गया, दूसरी ओर सरकार के मंत्रियों की तरफ से समय समय पर बयान जारी किए गए कि इस धारा को समाप्त करना सरकार के संज्ञान में है और इस पर आम जनता में जागरुकता के लिए भिन्न तरीके अपनाए जा रहे हैं। तीसरी तरफ देश के बड़े शहरों, जैसे दिल्ली, बंगलुरु, कलकत्ता, चेन्नई, मुंबई आदि जगहों में Gay Pride Parade के नाम से प्रदर्शन कर समलैंगिकता को सामान्य रुप से स्वीकार करने का माहौल बनाया गया। आखिरकार 2 जुलाई 2009 में दिल्ली हाईकोर्ट ने आईपीसी की धारा 377 को असवैंधानिक करार देते हुए समलैंगिकता को कानूनी संरक्षण दे दिया गया।

इस फैसले ने समलैंगिकता के समर्थक लोगों में खुशी की लहर दौड़ा दी और उनकी गतिविधियां तेज़ हो गईं। Pink Page के नाम से पहला ऑनलाइन LGBT Magazine प्रकाशित हुई और Bombay Dost के नाम से Gay Magazine का दोबारा प्रकाशन हुआ। विभिन्न राज्यों में LGBT Pride Parade का आयोजन होने लगा। दूसरी ओर देश के विभिन्न धार्मिक संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने मिलकर हाईकोर्ट के निर्णय के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अपील कर दी। याचिका कर्ताओं की दलील सुनने और केस के तमाम पहलूओं पर विमर्श करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने 27 मार्च 2012 में निर्णय को सुरक्षित कर लिया और इस फैसले को 11 दिसंबर 2013 को सुनाया गया। इसमें दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को समाप्त करते हुए कहा गया है कि दंड संहिता की इस धारा में कोई परिवर्तन की आवश्यकता नहीं है और उसके अनुसार यह अप्राकृतिक व्यवहार है जो कि एक अपराध है। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि कानून बनाना सरकार का काम है। अगर वह चाहे तो संसद से कानून पारित करके इस धारा को समाप्त कर सकती है। इस फैसले ने चर्चा परिचर्चा का दरवाज़ा खोल दिया है और उसके समर्थन तथा विरोध में विभिन्न उदाहरण प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

क्या हम समलैंगिकता पर प्रतिबंध लगाकर मानवाधिकार का उल्लंघन कर रहें?

समलैंगिकता के समर्थक बड़े ज़ोर शोर से यह बात कहते हैं और उसी को दिल्ली हाईकोर्ट के शिक्षित जज ने भी दोहराया है कि समलैंगिकता पर प्रतिबंध स्वतंत्रता, समानता के मूलभूत अधिकार का उल्लंघन है, जिनकी संविधान में ज़मानत दी गई है। संविधान का अनुच्छेद 14 सभी वर्ग के लोगों के बीच समानता के समान अवसर उपलब्ध कराता है और अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति की निजी ज़िंदगी को सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 15 में कहा गया है कि धर्म, पीढ़ी, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी व्यक्ति के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा। 

वास्तविकता यह है कि इस प्रतिबंध को मूल मानव अधिकार के विरुद्ध नहीं करार दिया जा सकता। सभ्य मानवीय समाज में किसी व्यक्ति को अनियंत्रित स्वतंत्रता नहीं दी जा सकती, बल्कि उसे समाज के ठोस मूल्यों और निर्धारित नियमों के अनुसार चलना होगा, जैसे कोई व्यक्ति बिना कपड़े के नंगा होकर किसी सार्वजनिक स्थान पर जाने को अपना अधिकार कहे तो उसकी यह मांग स्वीकार नहीं की जाएगी और उसे इस हरकत से रोका जाएगा। इस संबध में समानता और स्वतंत्रता का उदाहरण देकर उचित नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए कि जो व्यक्ति इस घिनौने कार्य में लिप्त हो, उसे इससे रोकने के अलावा, एक मानव के रुप में उसे जो अधिकार मिलने चाहिए, उनसे ना उसको वंचित किया जाता है।

आपसी सहमति की गलत धारणा

एक बात यह कही जाती है कि अगर दो लोग आपसी सहमति (Mutual Consent) से एक दूसरे से यौन सुख हासिल कर रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे का क्या जाता है? यह सहमति दो अलग अलग लिंग से संबध रखने वाले लोगों के बीच भी हो सकती है और एक समान लिंग वालों के बीच भी। जिस प्रकार किसी पुरुष व महिला के बीच आपसी सहमति से यौन संबध (Consensual sex) पर कोई प्रतिबंध नहीं है और उसे कोई अपराध नहीं समझा जाता, उसी प्रकार इस स्थिति में भी उसकी अनुमति होनी चाहिए, जब दो पुरुष या दो महिला आपसी सहमति से इस कार्य को अंजाम दें।

किसी सभ्य समाज में आपसी सहमति की यह धारणा स्वीकार योग्य नहीं हो, बल्कि उसे सामाजिक अनुशासन की कसौटी पर परखा जाएगा और यह देखा जाएगा कि उसकी वजह से सभ्य ढांचे में कोई रुकावट तो नहीं पैदा हो रही है और समाज की नींव तो प्रभावित नहीं हो रही है। इसका उदाहरण ऐसे ही है जैसे रिश्वत का लेनदेन दो लोगों की आपसी सहमति से होता है, लेकिन उसे अपराध समझा जाता है और पकड़े जाने पर कठोर सज़ा दी जाती है। उसका कारण यह है कि यदि उन्हें इसकी अनुमति दे दी जाए तो लूट खसोट, बेईमानी, और दूसरों के अधिकारों का उल्लंघन होने लगेगा और पूरा समाज विवाद व बुराई भर जाएगा।


डॉक्टर रज़िउल इस्लाम नदवी

रिसर्च स्कॉलर

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