स्वयं की दूसरों से तुलना, अवसाद का बड़ा कारण
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स्वास्थ्य

स्वयं की दूसरों से तुलना, अवसाद का बड़ा कारण


जब हम सुबह उठते ही आंख मलते हुए अपने सोशल मीडिया अकाउंट को चेक करते हैं तो वहां पर किसी की कहीं घूमते हुए फोटो, डिनर करते हुए फोटो या वीडियो, या सोलो व्लॉग या फिर एनिवर्सिरी, बर्थडे पार्टीज़ इत्यादि की फोटो वीडियोज़ मौजूद रहती है। जिन्हें देखकर लगता है कि काश हमारी ज़िंदगी में भी कुछ ऐसा ही होता और यहीं से शुरुआत होती है निराशा व असफलता की। दूसरों को देखकर इंसान खुद को असफल और कमतर समझने लगता है और धीरे धीरे मन में दबाव, उदासी और आत्म संदेह पैदा होने लगता है जिससे आत्मविश्वास टूटता चला जाता है। 

आज के समय का यह दुर्भाग्य है कि अनेकों लोग केवल इस कारण डिप्रेशन से घिरे हैं कि उन्हें लगता है वे दूसरों से कम हैं। जबकि वे खुद अपनी ज़िंदगी में सफल होते हैं। उनकी लाइफस्टाइल संतुलित और अनुशासित होती है। लेकिन दूसरों की तुलना के कारण वे स्वंय की सुख शांति को तबाह कर बैठते हैं। और इस को बढ़ावा मिला है सोशल मीडिया के ज़रिए से। लाखों लोग हर रोज़ फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हॉट्सऐप्प स्टेट्स पर अपने सजे संवरे और खुशियों भरे फोटो व वीडियो डालते हैं जिसे देखकर लगता है कि इनकी जिंदगी एकदम परफेक्ट है। जिसे देखकर दूसरे लोग अनजाने में अपनी ज़िंदगी की चुनौतियों, कमियों और संघर्ष की तुलना इन आकर्षक और परफेक्ट दिखने वाले लोगों से करने लगते हैं। 

यह तुलना अकसर बिना किसी सचेत प्रयास के ऐसे ही सहज प्रतिक्रिया के रुप में होती है जिसका मस्तिष्क पर बड़ा ही गहरा असर पड़ता है। स्क्रीन पर एक पल के लिए देखी गई फोटो मन पर ऐसा निशान छोड़ जाती है जो लंबे समय तक बना रह सकता है। 

संभव है कि हम जिस इंसान की ज़िंदगी की झलक सोशल मीडिया पर देख कर उससे जलन महसूस कर रहे हैं, वह भी उसी समय अपने फोन की स्क्रीन पर नज़र गड़ाए बैठा हो और किसी अन्य व्यक्ति की ज़िंदगी को देखकर अंसतोष की भावना से जूझ रहा हो। क्योंकि यह असुरक्षा का एक वैश्विक चक्र बन चुका है, जहां लोग अपने जीवन के वास्तविक और अनदेखे पहलुओं की तुलना दूसरों के जीवन के उन चुनिंदा पलों से करते हैं जिन्हें अत्यंत आकर्षक रुप में प्रस्तुत किया जाता है।

इसलिए यह याद रखना ज़रुरी है कि मानसिक उलझन से जूझने वाले आप अकेले नहीं है। जिस व्यक्ति का जीवन बाहर से पूर्ण और आदर्श दिखाई दे रहा है वह भी अपने निजी संघर्ष, चिंताओं और असुरक्षाओं से जूझ रहा हो सकता है। क्योंकि असल समस्या व्यक्ति में नहीं बल्कि उस आधुनिक जीवन व्यवस्था में मौजूद है जिसने तुलना (कंपैरिज़न) को लाइफस्टाइल का हिस्सा बना दिया है। आज अधिकांश लोग वास्तव में असफल नहीं है बल्कि वे इसलिए दुखी हैं कि उन्हें लगता है कि दुनिया के बाकी सभी लोगों ने अपने जीवन का रास्ता खोज लिया है और वे पीछे रह गए हैं।

सोशल मीडिया पर लोग प्रायः अपने व्यक्तित्व और जीवन का सर्वश्रेष्ठ पक्ष प्रस्तुत करते हैं। परिणामस्वरुप लोग अपने वास्तविक जीवन की तुलना इन आदर्श फोटो और वीडियो से करने लगते हैं। यह प्रक्रिया धीरे धीरे आत्म सम्मान को कमज़ोर कर सकती हैं और तनाव एवं अवसाद जैसी गंभीर मानसिक बीमारियों को जन्म दे सकती है।

अवसाद के शुरुआती लक्षण को लोग हल्के में ले लेते हैं जबकि यह मन के भीतर उठने वाला एक ऐसा मौन तूफान है जिसे बाहर की दुनिया देख नहीं पाती लेकिन उससे गुज़रने वाला व्यक्ति हर क्षण उसकी तीव्रता को महसूस करता है। यह कमज़ोरी का नहीं बल्कि लंबे समय तक अत्यधिक भावनात्मक पीड़ा और मानसिक बोझ उठाने का परिणाम होता है। यह इतना गहराई से इंसान को जकड़ लेता है कि लगता है मानो यह संघर्ष अब कभी समाप्त ही नहीं होगा।

तुमने 90 प्रतिशत अंक हासिल किए, लेकिन किसी और ने 95 प्रतिशत हासिल कर लिए

तुमने सस्ती कार खरीदी, लेकिन तुम्हारे मित्र ने तुमसे बेहतर कार खरीद ली

ऐसे शब्द आज के समय में सामान्य प्रतीत होते हैं, किंतु इनके पीछे छिपी मानसिकता कहीं अधिक गहरी है। यह वह सोच है जो उपलब्धियों को उनके वास्तविक मूल्य के आधार पर नहीं, बल्कि दूसरों की उपलब्धियों से तुलना करके आंकी जाती हैं।

इस मानसिकता में व्यक्ति अपनी सफलता का आनंद लेने के बजाय लगातार यह देखने में व्यस्त रहता है कि कोई और उससे आगे तो नही निकल गया। परिणामस्वरुप, उपलब्धियां संतोष का स्त्रोत बनने के बजाय नई असुरक्षा का कारण बन जाती है। तुलना का यह अंतहीन चक्र व्यक्ति को इस भ्रम में फंसा देता है कि खुशी हमेशा किसी अगले लक्ष्य की बड़ी उपलब्धि या और बेहतर बनने में छिपी हुई है। लेकिन जब जीवन को लगातार एक प्रतिस्पर्धा के रुप में देखा जाता है, तो संतुष्टि और आत्म-स्वीकृत के लिए स्थान कम होता जाता है।

धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी उपलब्धियों की सराहना करना भूल जाता है और केवल अपनी कमियों पर ध्यान केंद्रित करने लगता है। यही वह स्थिति है जहां तुलना, जो शुरुआत में केवल एक आदत प्रतीत होती है, बाद में मानसिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। आपको नौकरी मिल गई लेकिन उसकी खुशी के बजाय आप किसी और के प्रमोशन की खबर से दुखी हैं।

आज की लाइफस्टाइल एक अंतहीन स्कोरबोर्ड जैसी दिखाई देती है। चाहे हम कितनी भी उपलब्धियां हासिल कर लें, लेकिन हमेशा कोई ना कोई ऐसा दिखाई देता है जिसके पास अधिक पैसा, बेहतर लाइफस्टाइल, बेहतर आकर्षित व्यक्तित्व है जो लगातार हमसे तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। इस प्रकार जो चीज़ एक स्वस्थ्य प्रतिस्पर्धा के रुप में शुरु हुई थी वह धीरे धीरे तुलना की एक खतरनाक आदत में बदल जाती है।

शुरुआत में तुलना हमें प्रेरित करती है। हम अधिक मेहनत करते हैं, बड़े लक्ष्य निर्धारित करते हैं और सफलता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। लेकिन जब हमारा आत्म मूल्य इस बात पर निर्भर करने लगता है कि हम दूसरों से आगे हैं या नहीं, तब यह दौड़ कभी समाप्त नहीं होती। हर सफलता अधूरी लगने लगती है, क्योकि कहीं ना कहीं कोई और व्यक्ति हमसे बेहतर प्रदर्शन करता हुआ दिखाई देता है।

स्थिति तब और अधिक बिगड़ जाती है जब हम अगली उपलब्धि की तलाश में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि ज़िंदगी की उन चीज़ो को भूल जाते हैं जो वास्तव में महत्वपूर्ण हैं। मानसिक शांति, सार्थक संबंध, अच्छा स्वास्थ्य और सच्ची खुशी। हम इस बात की सराहना करना छोड़ देते हैं कि हमने अब तक कितनी दूरी तय की है और केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करने लगते हैं कि हम स्वयं को दूसरों से कितना पीछे मानते हैं।

जब व्यक्ति अपने मूल्य को केवल दूसरों की उपलब्धियों के संदर्भ में देखने लगता है, तब वह स्वयं की विशिष्टता, अपनी यात्रा और अपनी प्रगति को नज़रअंदाज़ कर देता है। यही वह प्वाइंट है जहां तुलना प्रेरणा का स्त्रोत नहीं रह जाती, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन जाती है।

तुलना का अंत : सफलता की शुरुआत

यह बात मन में बिठा लेनी चाहिए कि सफलता कोई प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि एक व्यक्तिगत यात्रा है। हर कोई अपनी अलग अलग यात्रा पर चल रहा है। किसी दूसरे इंसान की सफलता आपके मूल्य को कम नहीं कर सकती। आपकी परिस्थितियां, संघर्ष, अनुभव और जीवन की गति पूरी तरह आपकी अपनी है। सफलता तभी खुशी देगी जब आप अपनी प्रगति की तुलना किसी के वर्तमान से नहीं, बल्कि अपने अतीत से करेंगे।

सच्चाई यह है कि सबसे ज़्यादा खुश रहने वाले लोग हमेशा वे नहीं होते जिनके पास सबसे अधिक उपलब्धियां या संसाधन होते हैं। बल्कि वह लोग ज़्यादा खुश एवं संतुष्ट रहते हैं जिन्होंने अपने पास मौजूद चीज़ों की कद्र करना सीख लिया है और जो अपनी गति से निरंतर आगे बढ़ रहे हैं।

इसलिए यह बात समझना हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद ज़रुरी है कि लगतारा दूसरों से तुलना हमें स्वयं से दूर ले जाती है, जबकि आत्म स्वीकृति और कृतज्ञता हमें अपनी वास्तविक सफलता के करीब लाती हैं। ज़िंदगी वह नहीं है जिसमें केवल प्रथन स्थान प्राप्त करने वाला ही सफल माना जाए। बल्कि यह एक व्यक्तिगत यात्रा है और इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य किसी और जैसा बनने में नहीं, बल्कि स्वयं का सर्वोत्तम रुप अपनाने में हैं।


सहर नज़ीर

स्वतंत्र पत्रकार, उत्तर प्रदेश

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