ड्राइंग रुम में किताबों का अभाव
किताब इंसान की सबसे वफादार दोस्त होती है यह ना नाराज होती है, ना छोड़ कर जाती है, और ना ही यह जज करती है। जब चाहे, जहां चाहे और जितनी देर चाहे हम इनसे बातें कर सकते हैं। किताबें हमारी समझ, सोचने की ताकत और धैर्य को विकसित करती है।
पहले के दौर में जब हम किसी के घर जाते थे तो ड्राइंग रूम में सबसे पहले नजर बुक शेल्फ पर पड़ती थी। गीता, कुरआन के साथ प्रेमचंद, मंटो, शेक्सपियर और मैग्जीन के ढेर मिल जाते थे। कभी घर की शान कहलाने वाली बुक शेल्फ आज लगभग ड्राइंग रूम से गायब है। जहां पहले दीवारों पर प्रेमचंद टैगोर और कलम सजे होते थे वहां अब 55 इंच की एलईडी चमकती है। शो-पीस और टेबल पर रिमोट पड़ा मिलता है।
आज किताबें अपना अस्तित्व खोती जा रही है। पहले मेहमान घर आते थे तो किताबों पर, लेखक को, कवियों, लेखन शैली पर और कहानियों में उतारे गए किरदारों पर चर्चाएं होती थी। पहले पढ़ा लिखा घर उसके ड्राइंग रूम में रखी किताबों से पहचाना जाता था। लेकिन अब हर व्यवस्था से भरपूर वेल फर्नीचर्ड घर (आज की लाइफस्टाइल का उच्चतम स्तर) ही अच्छे घर का पैमाना बन चुका है। पहले मां-बाप, दादा-दादी धार्मिक किताबों के साथ समाचार पत्रों, मैगजीन,उपन्यास को पढ़कर आनंदमय होते थे। बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। जब घर के बड़े और मां-बाप खुद फोन में बिजी हैं तो किताबें कैसे पढ़ेंगे? पढ़ने के लिए उस किताब को उठना होता है और जब ड्राइंग रूम में किताबें ही नहीं है तो उठेंगी कैसे?
पहले के युवा और आज के युवा का किताबों के साथ रिश्ता
अगर हम पुराने ज़माने की बात करें तो 1980- 2000 के दौर में पॉकेट मनी बचाकर कॉमिक्स, कहानी और शायरी की किताब, जासूसी नॉवेल खरीदने का चलन था। उस दौर के नाटको, फिल्मों में भी ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहां बस में, पार्क में, छत पर, हर जगह किताब साथ होती थी लेकिन आज किताब का मतलब पाठ्यक्रम को समझते हैं और किताबें बोझ लगती है। उस दौर में कॉलेज की लाइब्रेरी, मोहल्ले की किसी लाइब्रेरी में मेंबरशिप लेना शान की बात समझी जाती थी और दोस्तों के बीच किताबों की अदला बदली होती थी लेकिन आज लाइब्रेरी के कल्चर की जगह स्क्रोल कल्चर लेता जा रहा है।
जहां खाली टाइम इंस्टा रील, यूट्यूब शॉट्स आज के युवाओं के दिमाग को कंट्रोल कर रहा है। उसे दौर में नया उपन्यास या किताब आने का इंतजार रहता था और बुक स्टॉल पर लाइन लग जाती थी। इस "इंतज़ार के मज़े" की जगह आज जल्दबाज़ी लेता जा रहा है। कोई बात समझनी है, कोई रेसिपी देखनी है या किसी से भी संबंधित जानकारी चाहिए तो 2 मिनट का वीडियो देख लेते हैं।
किताब खोलकर 2 घंटे लगाने का धैर्य अब बाकी नहीं रहा। उसे दौर में किताबों के साथ गहरी दोस्ती हुआ करती थी। एक ही किताब को दो-तीन बार पढ़ा जाता था। पत्रों के नाम, डायलॉग ज़बानी याद होते थे। किताबों पर बहस होती थी और नोट्स भी बनाए जाते थे। लेकिन आज के युवाओं का किताबों से सिर्फ मतलबी और सजावटी रिश्ता ही बाकी रह गया है। अपने विषय से और पाठ्यक्रम से और डिग्री से संबंधित किताबें ही उनकी बुक शेल्फ में पाई जाती हैं। और बुक शेल्फ में इसके अलावा किताबें हैं भी तो इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और फेसबुक पर स्टोरी के लिए।
किताबों से दूरी की एक वजह टेक्नोलॉजी, इंटरनेट और सोशल मीडिया का बिना किसी सीमा के उपयोग, इंसान में बढ़ती जल्दबाजी है। बोर होते ही या खाली टाइम में मोबाइल खुल जाता है। रील, शॉट्स, गेम्स में हर 5 सैकंड में नया आनंद मिलता है। तेज़ डोपामिन (डिजिटल नशा) के आगे धैर्य हारता जा रहा है जबकि किताब पढ़ने में धैर्य चाहिए पेज देर पर पेज जाना पड़ता है। सिलेबस की मोटी मोटी किताबों पर रट्टा लगाना, नंबर का प्रेशर बनाने से बच्चों को लगा कि हर किताब ही सर दर्द है। इसलिए मज़े वाली किताबो के साथ रिश्ता कभी बन ही नहीं पाया।
इसके परिणामस्वरूप हमारी सोचने और इमेजिन करने की शक्ति कम होती जा रही है। जो व्यक्ति किताब नहीं पढ़ता तो उसके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता कम हो जाती है और गहरी बात की समझ विकसित नहीं हो पाती।
किताबों से खत्म होते रिश्ते का एक नतीजा डिप्रेशन व एंग्जाइटी के बढ़ते केसेस भी है। फोन हमें सिर्फ जानकारी देता है लेकिन किताबें हमें समझा देती है और जिंदगी जानकारी से नहीं समझ से चलती है। किताब पढ़ने से नए शब्द, अर्थ, मुहावरे, तर्क करने की ताकत मिलती है लेकिन आज का युवा 'bro', 'vibe', 'literally', 'Scence' से आगे नहीं बढ़ पा रहा है।
किताबें दिमाग के लिए जिम की भांति कार्य करती है। एक व्यक्ति अपनी ज़िंदगी के 20-30 साल में जो सीखता है, वो सब 300 पेज तक की किताब में लिख देता है और ये अनुभव ₹200 में किताब के रूप में आसानी से हमें मिल जाता है। मतलब यह है की किताब,अनुभव खरीदने का सबसे सस्ता तरीका है। किताबों के जरिए हम हजारों साल पहले मरे हुए लोगों से दोस्त बनकर बातें कर पाते हैं।
ऐसा लगता है मानो जैसे ग़ालिब, प्रेमचंद, कबीर, कलाम, अल्लाह इकबाल सब हमारे साथ बैठ गए हैं। किताबें भाषा व सोच की चाबी होती है। जेल में कैद कैदी और उसकी सोच को जो चीज स्वतंत्र रखती है वह किताब है। नेल्सन मंडेला जब जेल में थे तो वह भी किताबें पढ़ा करते थे। पहले के युवा एक किताब पढ़ कर 20 आइडिया निकाल लेते थे लेकिन आज के युवा 20 रील देखकर भी एक आइडिया पर नहीं टिक पाता।
रील 15 सेकंड की होती है लेकिन जिंदगी 15 सेकंड की नहीं होती। किताबें हमें ठहरना सिखाती है। किरदार के साथ रोना,हंसना, लड़ना सिखाती है और यही सब असल जिंदगी में हमारे काम आता है। किताबों से दूरी की वजह यह नहीं है की किताबें पुरानी हो गई बल्कि वजह यह है कि हम नई पीढ़ी को किताबों से जोड़ना भूल गए।
किताबों की तरफ वापसी
किताबों की तरफ वापसी के लिए हमें इसकी शुरुआत अपने घर से करनी होगी। हम अपने घर में ड्राइंग रूम में एक छोटी बुक शेल्फ लगाएं। जहां बच्चों की कॉमिक्स, धर्म की और कहानी की हर वर्ग की ऐसी छोटी-छोटी किताबें रखें। टेबल पर एक दो तस्वीर की किताबें रखें वह दिखेंगी तो उठेंगी। मेहमान घर आएंगे और टेबल पर रखी किताबों को पढ़ेंगे तो फिर चर्चाएं भी शुरू होगी। अपनी आदत और शौक में किताबों को शामिल करें।
बुक फेयर जाएं, लाइब्रेरी में मेंबरशिप ले। युवाओं और बच्चों को गिफ्ट में किताबें दे। सोने से 10-15 मिनट पहले किताब जरूर पढ़ें। फोन का जो भी काम हो उसे हम पहले पूरा करके रखें। फोन चाकू की तरह एक औजार ही है, जैसे हम चाकू से फल भी काट सकते हैं और खुद को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। बस उसके उपयोग की समझ हमारे अंदर होनी चाहिए।
फोन ने हमें किताबें पढ़ने से नहीं रोका लेकिन हमने उसे खोला भी नहीं। फोन में भी लाखों किताबें हैं लेकिन फिर भी बेहतर यही है कि हम PDF से पढ़ने की बजाय हार्ड कॉपी निकाल कर पढ़ें। ड्राइंग रूम घर का चेहरा होता है वहां सामान का रखरखाव और साज सज्जा देखने वाले के मन में घर की एक धारणा बनाती है। किताबों से सजी शेल्फ घर को सोचने समझने वाले के रूप में पहचान देती है।
अंतिम बातः जो समाज किताब से रिश्ता तोड़ देता है वह केवल दूसरों की लिखी हुई कहानी का पात्र बनकर रह जाता है। अपनी कहानी खुद लिखनी है तो पढ़ना होगा।
इशरत जहां
टोंक, राजस्थान