ज्ञान का दीपक
ज्ञान का दीपक
अंधेरे ने हर चीज को अपने हिसार में ले रखा था अपने प्रश्नों में घिरा व्यक्ति उत्तर की खोज में टकटकी बांधे लगातार आकाश की ओर देख रहा था। इस आस के साथ की शायद उसे उसके प्रश्नों का उत्तर मिल जाए। उसने बहुत सारे दरवाजे खटखटाए की, उसके उत्तर उसे मिल जाए, मगर निराशा ही हाथ लगी जिस कारण उसे अपने अंदर गहरा अंधेरा समाहित होता हुआ प्रतीत हुआ।
अचानक उसका परिचय ज्ञान से हुआ, उसने पढ़ना शुरू किया यहां तक उसके आसपास का अंधेरा छटने लगा, उसने सोचना शुरू किया यहां तक कि उसके उत्तर उसे नज़र आने लगे। उसके अंदर ज्ञान की लौ जगमगाने लगी। जिसने उसके अंदर के अंधेरे को पराजित करके उसके अंदर ज्ञान की लौ रोशन कर दी जिससे उसकी दुनियां जगमगा उठी।
तब जाकर उसे यह एहसास हुआ कि ज्ञान केवल कुछ किताबें पढ़ लेना, परीक्षा में सफलता प्राप्त करने का नाम नहीं अपितु यह तो वह किरण है जो इंसान को घनघोर अंधेरे से निकाल कर रोशनी की ओर लाती है। उसे सोचने समझने की योग्यता देती है, उसके अंदर प्रश्नों को जन्म देती है,उसके अंदर छिपी योग्यताओं को एक पहचान मिलती है।
समाज के अंधे अनुसरण से व्यक्ति को स्वतंत्र कराती है। आखिरकार व्यक्ति इस नतीजे पर पहुंचा कि ज्ञान दीपक के समान है जिसकी रोशनी से न केवल उसे लाभ होता है अपितु उसके चारों ओर का वातावरण उसकी लौ से जगमगा उठता है।
सफ़िया शफ़क़ (मेवात, हरियाणा)
पुस्तक—एक जादुई द्वार
"हूँ... आज के इस सुहावने दिन को कैसे बिताया जाए?"
अभी दिमाग यह सोच ही रहा था कि मन में एक हल्की-सी गुदगुदाहट पैदा हुई—क्यों न आज फिर किसी सैर पर चला जाए?
और अचानक मेरी आँखें चमक उठीं! मुझे जवाब मिल गया था कि अभी का समय कैसे बीतेगा। मैं तुरंत भागकर रसोई में गई, गर्मा-गरम पॉपकॉर्न बनाए और अपने उस जादुई कोने में आकर बैठ गई, जहाँ से जिस युग में चाहो, जिस दिशा में चाहो, जाने का द्वार मिल जाता है।
अब बैठकर सोच रही हूँ कि आज कहाँ की सैर की जाए... तभी मेरी नज़र कहानियों की एक पुरानी पुस्तक पर पड़ी। यह वही किताब थी, जिसने पिछली बरसात में मुझे बिना भिगोए, ठंडी-ठंडी हवाओं के साथ पिछले युग की कुछ खट्टी-मीठी रीतियों और गाँव के रिवाज़ों को बहुत करीब से दिखाया था। एक बेहद सुहाना मंज़र मेरी आँखों में बस गया था, विचारों पर एक सुंदर-सा चित्र छप गया था।
खैर, सोचने की बात तो यह है कि अभी इस जादुई द्वार से कहाँ चला जाए? सुबह-सुबह अख़बार को तो खूब खंगाल लिया था। देश, विदेश, नगर, देहात, खेल की दुनिया से लेकर राजनीति तक की यात्रा हो चुकी थी। जो भूतकाल में हुआ, वह भी मालूम चल गया और जो वर्तमान की स्थिति है, उसे भी खूब भाँप लिया।
अब... अब क्या? सवाल तो वहीं का वहीं है—कहाँ चला जाए?
सोचते-सोचते मेरे कटोरे के पॉपकॉर्न खत्म होते जा रहे थे, जिन्हें मैं लगातार खाए जा रही थी। मुझे खुद पर ही प्यार आ गया—हाँ-हाँ, इस सुहानी ठंडी हवा में प्यार ही तो आता है! मुझे इस खूबसूरत समय का पूरा लाभ उठाना था और इन हवाओं के साथ किसी न किसी सैर पर तो जाना ही था।
इतने में मेरे दादाजी की आवाज़ आई, "बेटा! सावन के लिए कुछ गर्मा-गरम बना देती, तो यह बरसात और भी सुहानी लगने लगती..."
"हाँ, यह तो है! बरसात में कुछ गर्मा-गरम खाने को मिल जाए तो मज़ा ही आ जाता है।" और मैं अच्छी तरह जानती हूँ कि दादाजी के 'कुछ' का क्या अर्थ होता है। जी बिल्कुल, आप सही समझे—पकौड़े और चाय!
फिर क्या था! मैंने अपने जादुई कोने से एक किताब उठाई, जिसका एक पन्ना मैंने पिछले सप्ताह मोड़कर रखा था। उसे खोला, तो उसमें मोटे अक्षरों में लिखा था—'भिंडी के करारे पकौड़े'।
मैंने उसमें लिखी सामग्री निकाली और दी गई विधि के अनुसार पकौड़े बनाना शुरू कर दिया। जब पकौड़े बनकर तैयार हुए, तो सबसे पहले मैंने खुद चखे। वे इतने कुरकुरे और स्वादिष्ट बने थे कि बस मज़ा आ गया!
मैं चहकते हुए दादाजी के लिए प्लेट सजाकर ले गई। दादाजी खिड़की खोले, ठंडी-ठंडी हवा का आनंद लेते हुए सूरह रहमान गुनगुना रहे थे। मैंने उनके सामने प्लेट रख दी। दादाजी ने पकौड़े खाकर बहुत तारीफ की और ढेर सारी दुआएँ भी दीं।
तो दोस्तों, यह मेरे जादुई द्वार की ही देन है, जो हर रोज़ मेरे ज्ञान को बढ़ा देता है और मुझे प्रशंसा भी दिलवाता है।
दादाजी के कमरे से निकलते-निकलते मुझे इस बात का जवाब मिल चुका था कि आज की इस सुहानी दोपहर में कहाँ जाना है। अब मैं अपनी ही सोच में गुम अपने कमरे की तरफ बढ़ी चली जा रही थी...
जिसने मुझे पुस्तक दी, जिसने मुझे पढ़ना सिखाया, जिससे मेरा वर्तमान अच्छा होगा, जिसके द्वारा मेरा भूतकाल मेरे लिए सीख बनेगा और सबसे अहम—जिससे मेरा भविष्य एक सुंदर मोड़ लेगा... मुझे आज उसी जादुई द्वार में चलना चाहिए!
हाँ, आप लोग फिर से सही समझे! मैं उसी पवित्र पुस्तक की बात कर रही हूँ जिसे मुसहफ़ (क़ुरआन) कहते हैं।
मैंने वह पुस्तक उठाई, जो मेरे रब ने मेरे लिए भेजी है। इसे सिर्फ पढ़ना ही नहीं, बल्कि गहराई से समझना भी है। समझना भी ऐसा, जैसे ज्ञान का एक समंदर हो और अब उसमें डूबकर अपने विचारों की इच्छा के अनुसार अनमोल मोती चुनकर लाने हों।
मैंने इसे 'मोती' क्यों कहा? क्योंकि मैं चाहे कैसी भी उलझन में हूँ, यह मुझे उत्तर के रूप में ज्ञान का एक मोती देता है। उस मोती की चमक मेरे लिए उम्मीद की राह बनती है—परेशानी में सुकून, तकलीफ में आराम। जब कोई राह नहीं दिखती, तो यह मुझे सही रास्ता दिखाता है।
बस एक शर्त है—जब भी इस समंदर में उतरो, दिमाग में चाहे जो भी विचार हों, दिल में यह पक्का यकीन होना चाहिए कि यही वह राह है जो मुझे मेरे सच्चे दोस्त और सच्चे शुभचिंतक से मिलाएगी। क्योंकि वही मेरा सबसे अच्छा दोस्त है, वही मेरा सच्चा शुभचिंतक है।
इसलिए इन नर्म हवाओं के साथ मैं एक बार फिर उसके करीब होने जा रही हूँ। मैंने सूरह मुल्क खोला, जो अपने रब के अज़ीज़ बंदों के लिए एक सच्ची रोशनी बनेगा।
अब मैं ज्ञान के इसी दरिया में उतरने जा रही हूँ और समझने की कोशिश करूँगी कि अल्लाह के महबूब, हमारे प्यारे नबी सल्ल० ने इसे सबसे ज़्यादा तन्हाई और तारीकी (अंधेरे) में रोशनी का मकाम क्यों दिया। असल में तो रोशनी की कीमत अंधेरे में ही होती है, और उस तारीकी के लिए अभी से तैयारी करनी है—यही हमारा भविष्य है।
उस रोशनी तक पहुँचने के लिए मुझे 'मुसहफ़' नाम के इस जादुई द्वार के अंदर जाना है। मुसहफ़ को पढ़ने वाला और समझने वाला कभी बिना रोशनी के नहीं रहता।
इस जादुई द्वार से मैं आज फिर अपने भविष्य को सुंदर बनाने के लिए एक नई सैर पर जा रही हूँ...
शिफ़ा उस्मानी (राजस्थान)
"खालीपन की आवाज़"
आयशा एक समझदार लड़की थी, लेकिन पिछले कुछ महीनों से उसकी ज़िंदगी जैसे बदल गई थी। सुबह उठना उसे बोझ लगता, लोगों से बात करना अच्छा नहीं लगता, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आ जाता। कभी माँ पर चिल्ला देती, कभी छोटी बहन से झगड़ पड़ती, कभी अपने कमरे में घंटों अकेली बैठी रहती।
उसे खुद भी समझ नहीं आता था कि उसके साथ क्या हो रहा है? दिल में अजीब-सी बेचैनी थी। सब कुछ होते हुए भी ऐसा लगता था जैसे अंदर कुछ बहुत बड़ा खाली है। वह उस खालीपन को कभी सोशल मीडिया से भरने की कोशिश करती, कभी दोस्तों से, कभी नई-नई चीज़ें खरीदकर... लेकिन कुछ देर बाद वही सन्नाटा लौट आता।
एक दिन उसकी माँ की पुरानी सहेली, खाला मरियम, घर आईं। उन्होंने आयशा को देखा तो समझ गईं कि बात सिर्फ़ गुस्से की नहीं, दिल की है।
माँ ने परेशान होकर कहा, "बहन, मुझे समझ नहीं आता कि मेरी बेटी को क्या हो गया है। पहले बहुत खुश रहती थी, अब हर समय उदास रहती है, सबसे लड़ती है और कहती है कि उसकी ज़िंदगी का कोई मक़सद नहीं है।"
खाला मरियम मुस्कुराईं और बोलीं, "अगर इजाज़त हो तो मैं उससे थोड़ी देर बात करूँ?"
वह आयशा के कमरे में गईं। कुछ देर खामोशी से बैठीं, फिर प्यार से पूछा,
"बेटी, क्या तुम जानती हो कि अल्लाह ने इंसान को किस चीज़ से पैदा किया?"
आयशा ने धीरे से कहा, "नहीं..."
खाला ने क़ुरआन की आयत पढ़ी:
﴿خَلَقَ الْإِنسَانَ مِن صَلْصَالٍ كَالْفَخَّارِ﴾
"उसने इंसान को खनखनाने वाली सूखी मिट्टी से पैदा किया, जो पकाई हुई मिट्टी जैसी थी।"
(सूरह अर-रहमान: 14)
फिर उन्होंने कहा,
"क्या तुमने कभी मिट्टी का खाली घड़ा देखा है? जब वह खाली होता है तो ज़रा-सी चोट पर खनखनाने लगता है। लेकिन जब उसी घड़े को पानी से भर दिया जाता है, तो उसकी आवाज़ बहुत कम हो जाती है।"
"बेटी, हम भी उसी मिट्टी से बनाए गए हैं। जब हमारे दिल अल्लाह की याद और क़ुरआन से खाली हो जाते हैं, तो हमारे अंदर भी एक शोर पैदा होने लगता है—बेचैनी, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, मायूसी और खालीपन। हम समझते हैं कि शायद यह कमी दुनिया की किसी चीज़ से पूरी हो जाएगी। लेकिन सच यह है कि जिस दिल को अल्लाह ने बनाया है, उसे सिर्फ़ अल्लाह का कलाम ही भर सकता है।"
उन्होंने फिर यह आयत पढ़ी:
﴿أَلَا بِذِكْرِ اللَّهِ تَطْمَئِنُّ الْقُلُوبُ﴾
"सुन लो! अल्लाह की याद ही से दिलों को सुकून मिलता है।"
(सूरह अर-रअद: 28)
उस दिन आयशा ने पहली बार क़ुरआन को सिर्फ़ तिलावत के लिए नहीं, बल्कि अपनी ज़िंदगी के सवालों के जवाब ढूँढ़ने के लिए खोला। उसने रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ना शुरू किया, उसका तर्जुमा समझा और हर आयत पर ग़ौर किया।
दिन बीतते गए। उसकी परेशानियाँ एक दिन में खत्म नहीं हुईं, लेकिन उसका दिल बदलने लगा। गुस्से की जगह सब्र ने ले ली, मायूसी की जगह उम्मीद ने, और खालीपन की जगह क़ुरआन का नूर भरने लगा।
कुछ महीनों बाद उसकी माँ ने मुस्कुराकर खाला मरियम से कहा,
"मेरी बेटी की ज़िंदगी बदल गई है। हालात वही हैं, लेकिन अब उसका दिल बदल चुका है।"
खाला मरियम ने जवाब दिया,
"जब इंसान अपने रब के कलाम से रिश्ता जोड़ लेता है, तो उसके दिल के सबसे गहरे अंधेरे भी धीरे-धीरे रोशनी में बदलने लगते हैं।"
तायबा शिफ़ात (मध्य प्रदेश)