शांति दिवस : संवाद, न्याय एवं सद्भाव की वैश्विक पुकार
आज की दुनिया तकनीक, विज्ञान और आर्थिक प्रगति के अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। लेकिन इस विकास की चमक के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी मौजूद है। दुनिया के कई हिस्सों में सीमा विवाद, हिंसक संघर्ष, गृहयुद्ध, आतंकवाद, विस्थापन और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियाँ मानवता के सामने भयावह रुप में खड़ी हैं। बारूद की गंध और निर्दोषों की पीड़ा के बीच आज ‘शांति’ केवल एक सुंदर शब्द या आदर्श नहीं, बल्कि पूरी मानवता के अस्तित्व और सुरक्षित भविष्य के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुकी है।
इसी आवश्यकता को रेखांकित करने और दुनिया में शांति तथा अहिंसा की भावना को मजबूत करने के लिए हर वर्ष 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस मनाया जाता है। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि युद्ध किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं, बल्कि मानव जीवन, समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए विनाश का कारण बन सकता है।
अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस की नींव संयुक्त राष्ट्र महासभा ने वर्ष 1981 में रखी थी। उस समय सितंबर के तीसरे मंगलवार को इस दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया था। पहली बार अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस सितंबर 1982 में मनाया गया।
इसके बाद वर्ष 2001 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए 21 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस के लिए स्थायी तारीख निर्धारित की। संयुक्त राष्ट्र ने इस दिन को वैश्विक युद्धविराम और अहिंसा के अवसर के रूप में स्थापित किया तथा सभी देशों और लोगों से शत्रुता समाप्त करने और शांति के प्रति अपनी प्रतिबद्धता व्यक्त करने का आह्वान किया।
अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस से जुड़ी महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में जापानी शांति घंटी (Japanese Peace Bell) का बजाया जाना है।
यह घंटी वर्ष 1954 में जापान ने संयुक्त राष्ट्र को भेंट की थी। इसे बनाने में 60 से अधिक देशों के बच्चों द्वारा दिए गए सिक्कों के साथ-साथ विभिन्न लोगों और प्रतिनिधियों द्वारा दिए गए सिक्कों तथा पदकों का उपयोग किया गया था।
शांति की यह घंटी केवल धातु से बनी एक वस्तु नहीं है, बल्कि यह मानवता के साझा भविष्य का प्रतीक है। इसकी ध्वनि हमें यह संदेश देती है कि युद्ध और हिंसा का सबसे गहरा प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है। इसलिए आज की दुनिया को अपने वर्तमान के साथ-साथ आने वाली पीढ़ियों के भविष्य की भी चिंता करनी होगी।
आज समाचार पत्रों की सुर्खियाँ और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आने वाली खबरें हमें बार-बार यह याद दिलाती हैं कि हिंसा और युद्ध किसी भी संघर्ष का स्थायी और न्यायपूर्ण समाधान नहीं हैं। युद्ध अपने पीछे विनाश, विस्थापन, भुखमरी, भय और गहरे सामाजिक घाव छोड़ जाते हैं। इसका सबसे अधिक खामियाजा आम नागरिकों और विशेषकर बच्चों को भुगतना पड़ता है।
जिस देश या समाज में अशांति, हिंसा और भय का वातावरण हो, वहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढाँचे और आर्थिक विकास की गति प्रभावित होती है। शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि विकास और मानव कल्याण की आवश्यक शर्त भी है।
दुनिया के जटिल से जटिल विवादों का स्थायी समाधान संवाद, कूटनीति और आपसी समझ के माध्यम से खोजा जा सकता है। हिंसा अक्सर किसी संघर्ष को समाप्त करने के बजाय बदले और प्रतिशोध का नया चक्र शुरू कर देती है। इसलिए बातचीत की मेज पर बैठना कमजोरी नहीं, बल्कि दूरदर्शिता और साहस का परिचायक है।
शांति का अर्थ केवल बंदूकों का शांत हो जाना नहीं है। वास्तविक और टिकाऊ शांति तब स्थापित होती है, जब समाज में न्याय, समानता, मानवाधिकारों की रक्षा और एक-दूसरे के विचारों के प्रति सम्मान मौजूद हो। जहाँ अन्याय, भेदभाव और घृणा बनी रहती है, वहाँ बाहरी शांति के बावजूद समाज के भीतर अशांति बनी रह सकती है।
इस्लाम में शांति, न्याय, करुणा और मानवता को विशेष महत्व दिया गया है। कुरआन मनुष्य को संघर्ष की स्थिति में भी शांति और सुलह का रास्ता अपनाने की प्रेरणा देता है।
अल्लाह तआला कुरआन में फरमाता है,“और यदि वे शांति की ओर झुकें तो तुम भी उसकी ओर झुक जाओ और अल्लाह पर भरोसा रखो।”
(सूरह अल-अनफाल, 8:61)
यह आयत स्पष्ट करती है कि जहाँ शांति की संभावना पैदा हो, वहाँ उसे स्वीकार करने और आगे बढ़ाने का रास्ता अपनाना चाहिए।
कुरआन शांति की बुनियाद के रूप में न्याय को भी महत्वपूर्ण स्थान देता है। अल्लाह तआला फरमाता है,“निश्चय ही अल्लाह न्याय, सदाचार और रिश्तेदारों को देने का आदेश देता है।”
(सूरह अन-नहल, 16:90)
इससे यह संदेश मिलता है कि स्थायी शांति केवल हथियारों के रुक जाने से नहीं आती। उसके लिए न्याय, समानता और अधिकारों की रक्षा भी आवश्यक है।
कुरआन आपसी संघर्ष की स्थिति में सुलह कराने का आदेश भी देता है,“और यदि ईमान वालों के दो समूह आपस में लड़ पड़ें तो उनके बीच सुलह करा दो।”
(सूरह अल-हुजुरात, 49:9)
इस्लाम में शांति केवल राष्ट्रों के बीच संबंधों तक सीमित नहीं है। परिवार, समाज और समुदाय के भीतर भी मेल-मिलाप और संबंधों की रक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है।
हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने लोगों के बीच संबंध सुधारने और मेल-मिलाप कराने की बड़ी फज़ीलत बयान की। हदीस में आता है,
“क्या मैं तुम्हें रोज़े, नमाज़ और सदक़े से भी अधिक दर्जे वाली चीज़ न बताऊँ? वह है आपस में सुलह कराना।”
(सुनन अबू दाऊद, 4919; जामे तिर्मिज़ी, 2509)
इस शिक्षा से स्पष्ट होता है कि समाज में टूटे हुए संबंधों को जोड़ना और आपसी विवादों को समाप्त करने का प्रयास करना इस्लामी दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण कार्य है। शांति स्थापित करने की जिम्मेदारी केवल राष्ट्राध्यक्षों, राजनेताओं या संयुक्त राष्ट्र की नहीं है। शांति की शुरुआत हमारे अपने घरों, मोहल्लों और समाज से होती है।
जब हम अपने आसपास के लोगों के साथ सम्मान और संवेदनशीलता से व्यवहार करते हैं, मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाते हैं और जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के नाम पर फैलने वाली नफरत तथा पूर्वाग्रहों का विरोध करते हैं, तब हम भी शांति की स्थापना में अपना योगदान देते हैं।
आज सोशल मीडिया ने हमारी जिम्मेदारी को और बढ़ा दिया है। किसी अफवाह, भड़काऊ संदेश या नफरत फैलाने वाली सामग्री को बिना सत्यापन आगे बढ़ाना सामाजिक तनाव को बढ़ा सकता है। इसके विपरीत, सत्य, संयम और सद्भाव को बढ़ावा देने वाली भाषा समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने में मदद कर सकती है।
शांति दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसी दुनिया छोड़ना चाहते हैं। क्या ऐसी दुनिया, जहाँ भय, हिंसा और नफरत का प्रभाव हो, या ऐसी दुनिया जहाँ बच्चे सुरक्षित वातावरण में शिक्षा प्राप्त करें, विभिन्न समुदाय एक-दूसरे का सम्मान करें और मतभेदों का समाधान बातचीत के माध्यम से निकाला जाए?
21 सितंबर का यह दिन हमें याद दिलाता है कि बारूद और नफरत की ताकत से कहीं अधिक शक्तिशाली करुणा, संवाद और मानवता की ताकत है। शांति किसी एक राष्ट्र, धर्म या समुदाय की जरूरत नहीं, बल्कि पूरी मानवता की साझा आवश्यकता है।
आइए, इस अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस पर हम केवल युद्ध और हिंसा के विरोध की बात न करें, बल्कि अपने विचारों और व्यवहार में सहिष्णुता, करुणा, न्याय, क्षमा और भाईचारे को स्थान देने का संकल्प लें। क्योंकि शांति केवल सीमाओं पर नहीं बनती वह हमारे दिलों, घरों और समाजों में जन्म लेती है।
जब शांति घर से शुरू होगी, तभी समाज में फैलेगी और जब समाज शांत होगा, तभी दुनिया स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ सकेगी।
एक शांत दुनिया ही सुरक्षित दुनिया है और एक सुरक्षित दुनिया ही आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर भविष्य की नींव रख सकती है।
परवीन ख़ान
पुसद, महाराष्ट्र