इंजीनियर दिवस : जानें इतिहास में गुम इन महान प्रयोगों की शानदार कहानी
आज जब हम इंजीनियर शब्द सुनते हैं तो हमारे सामने कंप्यूटर, रोबोट, पुल, बांध, मशीनें और अंतरिक्ष यान की तस्वीर उभरती है। इंजीनियरिंग हमें आधुनिक दुनिया की देन लगती है, एक ऐसी दुनिया की, जहां विश्वविद्यालय हैं, प्रयोगशालाएं हैं, सीएडी सॉफ्टवेयर हैं और जटिल मशीनों को डिजाइन करने के लिए अत्याधुनिक तकनीक है। लेकिन अगर हम इतिहास की तरफ थोड़ा पीछे मुड़कर देखें, तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है।
आज से कई सौ साल पहले, जब ना आधुनिक इंजीनियरिंग कॉलेज थे, ना कंप्यूटर और ना ही आधुनिक मशीन टूल्स, उस समय मुस्लिम दुनिया में ऐसे वैज्ञानिक और कारीगर मौजूद थे जो पानी उठाने वाली मशीनें बना रहे थे, स्वचालित यंत्र डिजाइन कर रहे थे, जल-घड़ियां बना रहे थे, बांध और नहरें तैयार कर रहे थे और ऐसी मशीनों के सिद्धांत विकसित कर रहे थे जिनमें आज की मशीनें, जलगति विज्ञान, ऑटोमोशन और कंट्रोल इंजीनियरिंग की झलक दिखाई देती है।
बनी मूसा:
इस कहानी को शुरू करने के लिए हमें नौवीं सदी के बगदाद जाना होगा। यहां तीन भाइयों का एक परिवार था .. बनी मूसा। मुहम्मद, अहमद और अल-हसन बिन मूसा। इन भाइयों ने ज्यामिति, खगोलशास्त्र और यंत्रशास्त्र सहित कई क्षेत्रों में काम किया। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से एक थी किताब अल हयाल, अर्थात Book of Ingenious Devices। लगभग 830 ईस्वी के आसपास लिखी गई इस किताब में करीब 100 तकनीकी उपकरणों और यांत्रिक डिवाइस का वर्णन मिलता है। इनमें फाउंटेन, वॉल्वस और ऐसे उपकरण शामिल थे जिनमें पानी के स्तर को नियंत्रित करने जैसी प्रक्रियाएं अपने आप हो सकती थीं।
यानी मशीन को केवल चलाना ही उद्देश्य नहीं था; मशीन को इस तरह डिजाइन करना कि वह परिस्थितियों के अनुसार खुद प्रतिक्रिया दे। आज की भाषा में कहें तो यहां हमें फीडबैक और ऑटोमैटिक कंट्रोल जैसी अवधारणाओं की शुरुआती झलक दिखाई देती है। बाद के इतिहासकारों ने बनी मूसा के काम को इसी वजह से early control engineering के इतिहास से जोड़कर देखा है।
अल-कराजी:
इसी परंपरा में लगभग दो शताब्दियों बाद एक और नाम सामने आता है, मुहम्मद अल-कराजी। वो 10वीं के अंत और 11वीं सदी की शुरुआत के मुस्लिम गणितज्ञ और इंजीनियर थे। उनका काम केवल सैद्धांतिक गणित तक सीमित नहीं था; उन्होंने पानी और जल यंत्र से संबंधित व्यावहारिक समस्याओं पर भी काम किया।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझने की जरूरत है। पुराने दौर में “इंजीनियर” शब्द का अर्थ आज के बीटेक या एमटेक डिग्री धारक जैसा नहीं था।
उस समय इंजीनियरिंग किसी विश्वविद्यालय से मिली डिग्री का नाम नहीं थी। यह गणित, ज्यामिति, शिल्पकला, वास्तुशास्त्र और व्यवहारिक समस्या के समाधान के मेल से विकसित होने वाली एक तकनीकी परंपरा थी। इसलिए इतिहास के इन लोगों को समझने का सही तरीका यह है कि हम देखें—उन्होंने कौन-सी समस्या हल की, किस तरह की मशीन बनाई और उसके पीछे कौन-सा इंजानियरिंग प्रिंसिपल इस्तेमाल किया।
अल-जज़री:
अगर मुस्लिम इंजीनियरिंग की पूरी कहानी में किसी एक व्यक्ति को सबसे अधिक प्रसिद्धि मिली है, तो वह हैं बदीउज़्ज़मां अबू-ल-इज़्ज़ इब्न इस्माइल इब्न अल-रज़ाज़ अल-जज़री। यूरोप और आधुनिक इंजीनियरिंग इतिहास में उन्हें अक्सर अल जज़री के नाम से जाना जाता है। वे 12वीं और 13वीं सदी के बीच दियार बकर के इलाके में रहे। वो अपने समय के एक असाधारण मैकेनिकल इंजीनियर थे। अल-जज़री की सबसे प्रसिद्ध किताब थी— Kitab fi Ma'rifat al-Hiyal al-Handasiya अर्थात् ingenious mechanical devices की जानकारी से संबंधित किताब।
लगभग 1206 ईस्वी में तैयार की गई इस किताब में उन्होंने मशीनों के डिज़ाइन, उनके पार्ट्स और उनके काम करने के तरीकों का विस्तृत वर्णन है और यहां अल-जज़री की सबसे खास बात सामने आती है। उन्होंने केवल यह नहीं बताया कि मशीन क्या करती है। उन्होंने यह भी बताया कि मशीन बनाई कैसे जाए। यही वजह है कि उनके काम में एक प्रैक्टिल इंजीनियर की मानसिकता दिखाई देती है।
पानी उठाने वाली मशीनें:
अल-जज़री ने कई तरह की पानी ऊपर उठाने वाली मशीनें डिजाइन कीं। इन मशीनों में गियर, शॉफ्टस, पिस्टन, वॉल्व और दूसरे मैकेनिकल कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया गया था। स्कॉलर्स ने आधुनिक इंजीनियरिंग विश्लेषण और कंप्यूटर मॉडलिंग की मदद से अल-जज़री की कुछ मशीनों को दोबारा जीवंत करने का प्रयास किया।
उनके मूल पांडुलिपियों में दिए गए डाइमेंशन और विश्लेषण के आधार पर आधुनिक इंजीनियरिंग मॉडल और 3D मॉडल तैयार किए गए और उनके मैकेनिकल ऑपरेशन का अध्ययन किया गया। यह दिलचस्प बात है कि किसी 800 साल पुराने हस्तलिपि में बनी मशीन को लेकर आज के इंजीनियर उसके मैकेनिज़्म को फिर से मॉडल करें और देखें कि वह वास्तव में काम कर सकती थी या नहीं।
यह इतिहास और इंजीनियरिंग, दोनों का एक असाधारण मेल है। इन अध्ययनों में अल-जज़री की पारंपरिक पम्प और दूसरी पानी को खींचने वाली मशीन के काम करने के तरीके का विश्लेषण किया गया।
अल-जज़री की मशीनों में ऑटोमोशन की झलक:
अल-जज़री की प्रसिद्ध Elephant Clock भी इसी इंजीनियरिंग कल्पना का उदाहरण है। यह सिर्फ समय बताने वाली घड़ी नहीं थी। इसमें पानी के प्रवाह, गति, भार और मैकेनिकल गति को इस तरह जोड़ा गया था कि अलग-अलग मैकेनिकल कंपोनेंट्स एक लय में काम करें। आज हम ऐसी चीजों को ऑटोमोशन, मैकेनिकल कंट्रोल और प्रोग्राम-योग्य तंत्र जैसी अवधारणाओं के संदर्भ में देखते हैं।
हालांकि यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि अल-जज़री ने आधुनिक कंप्यूटर या आधुनिक रोबोट बना दिया था। लेकिन यह कहना बिल्कुल उचित है कि उनकी मशीनों में ऑटोमैटिक मैकेनिकल कंट्रोल और कंट्रोल मैकेनिज्म की ऐसी तकनीकें दिखाई देती हैं जो बाद की मैकेनिकल इंजीनियरिंग की समझ के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इसीलिए अल जज़री का काम उन्हें रोबोटिक्स एवं ऑटोमोशन की ऐतिहासिक जड़ों से जोड़ता है।
तक़ी अल-दीन:
अल-जज़री के लगभग तीन-चार सौ साल बाद ऑटोमॉन दुनिया में एक और बड़ा नाम सामने आता है—तक़ी अल-दीन मुहम्मद इब्न मारूफ। उनका जन्म 16वीं सदी में दमास्कस (दमिश्क) में हुआ और बाद में उन्होंने इंस्ताबुल में काम किया। उन्होंने 19 किताबें लिखीं और उन्हें अपने समय के महान वैज्ञानिक और इंजीनियर में गिना गया। उनके इंजीनियरिंग काम में सबसे महत्वपूर्ण था उनका छह सिलेंडर आधारित पानी का पम्प (six-cylinder water pump)। यह एक आधुनिक पिस्टन पंप था जिसमें छह सिलेंडर को एक मैकेनिकल में जोड़ा गया था। इसका वर्णन लगभग 1550 के आसपास उनके treatise Al-Turuq al-Saniyya fi al-'Alat al-Ruhaniyya में मिलता है।
आज किसी पंप में कई सिलेंडर का इस्तेमाल हमें सामान्य लग सकता है। लेकिन 16वीं सदी में इस तरह की मैकेनिकल जटिलता हासिल करना एक बड़ी इंजीनियरिंग उपलब्धि थी। इसमें चक्र गति को पिस्टन की आगे-पीछे की गति में बदला जाता था—यानी वही मूल इंजीनियरिंग समस्या जिसे आधुनिक इंजन, पंप और दूसरे मैकेनिकल सिस्टम में अलग-अलग रूपों में देखा जा सकता है।
मशीनें और बांध:
मुस्लिम इंजीनियरिंग की कहानी केवल घड़ी और पंप तक सीमित नहीं थी। इसका एक बड़ा हिस्सा सिविल और हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग भी था, पारंपरिक इस्लामी दुनिया में डैम, नहरें, जलाशय और सिंचाई प्रणालियाँ पर काफी काम हुआ। इन संरचनाएं का इस्तेमाल पानी जमा करने, खेती की सिंचाई, बाढ़ को नियंत्रित करने और शहरों तथा कृषि क्षेत्रों तक पानी पहुंचाने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, मुस्लिम दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सातवीं-आठवीं सदी से ही डैम के निर्माण के प्रमाण मिलते हैं। बाद के दौर में ईराक, ईरान, सीरिया, उत्तरी अफ़्रीका, अल-अंदलूस और मुस्लिम दुनिया में हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग और अधिक विकसित हुई।
दिल्ली के आसपास की इंजीनियिरंग:
इस कहानी का एक महत्वपूर्ण अध्याय भारत में भी लिखा गया। दिल्ली सल्तनत के दौर में पानी मैनेजमेंट के लिए बांध, जलाशय, नहरें और नियंत्रण द्वार बनाए गए। विशेष रूप से तुगलक़बाद के आसपास बांध और पानी नियंत्रण सिस्टम का इस्तेमाल एक साथ कई उद्देश्यों के लिए किया गया। पानी रोकने, सिंचाई करने और सुरक्षा सिस्टम को मजबूत करने के लिए।
इन सिस्टम में पानी की सुरंग, नियंत्रित द्वार और पानी बहाव नियंत्रित करने जैसी व्यवस्थाएं थीं। बाद में फिरोज शाह तुगलक के शासनकाल में नहरें, जलाशय, बांध और दूसरे हाइड्रोलिक कार्य का बड़े पैमाने पर निर्माण हुआ।
यानी इंजीनियरिंग को केवल किसी मशीन या इमारत तक सीमित नहीं रखा गया था। यह एक पूरे समाज को बदलने का माध्यम भी थी। जहां पानी नहीं था, वहां पानी पहुंचाना जहां बाढ़ का खतरा था, वहां पानी को नियंत्रित करना। जहां जमीन सूखी थी, वहां सिंचाई की व्यवस्था बनाना।
यही तो इंजीनियरिंग का मूल उद्देश्य है—प्रकृति की समस्याओं को समझकर मानव जीवन को आसान बनाने के लिए तकनीकी समाधान तैयार करना।
इतिहास से मिलने वाला सबक:
इंजीनियरिंग की शुरुआत किसी एक सभ्यता या किसी एक धर्म से नहीं हुई थी। मिस्र के लोग विशाल निर्माण जानते थे। यूनानी और रोमन मैकेनिकल तथा हाइड्रोलिक तकनीक विकसित कर चुके थे। भारत और चीन की अपनी समृद्ध तकनीकी परंपरा थीं। मुस्लिम वैज्ञानिकों और इंजीनियर ने इन पुरानी परंपराओं से ज्ञान लिया, उसे समझा, उसमें सुधार किया और कई नए डिवाइस तथा तकनीक विकसित किए।
प्राचीन इस्लामी सभ्यता में यूनानी और दूसरे पुराने ज्ञान को केवल संरक्षित ही नहीं किया गया, बल्कि कई क्षेत्रों में उसे नए व्यावहारिक अनुप्रयोगों के साथ आगे बढ़ाया गया। यही वैज्ञानिक सभ्यता का स्वभाव है, ज्ञान किसी एक सभ्यता की संपत्ति नहीं होती। एक सभ्यता उसे हासिल करती है, दूसरी उसमें सुधार करती है और तीसरी उसे नए स्तर तक ले जाती है।
प्राचीन इस्लामी इंजीनियरिंग की कई उपलब्धियां लंबे समय तक इतिहास की सामान्य लोकप्रिय कहानी में पर्याप्त जगह नहीं पा सकीं। इसका एक कारण यह भी था कि कई इंजीनियर और विशेषज्ञ सामान्य लोग थे। उन्होंने अपनी उपलब्धियों को साहित्यिक विद्वानों की तरह विस्तार से दर्ज नहीं किया। उनका ज्ञान ऊपर से नीचे तक पहुंचता रहा। और जिन लोगों ने लिखा भी, उनके कई पांडुलिपियां समय के साथ खो गए, नष्ट हो गए या लंबे समय तक इतिहासकारों की नजर से दूर रहे।
इसलिए इतिहास की किताबों में किसी सभ्यता की अनुपस्थिति को हमेशा उसकी तकनीकी अनुपस्थिति नहीं समझना चाहिए। कई बार समस्या उपलब्धि की नहीं होती। समस्या उसके दस्तावेज और मान्यता की होती है।
आज इंजीनियर दिवस पर अगर हम अल-जज़री, बनी मूसा, अल-कराजी या तक़ी अल-दीन को याद करते हैं, तो इसका मतलब केवल अतीत पर गर्व करना नहीं होना चाहिए। इन लोगों की सबसे बड़ी विरासत उनकी जिज्ञासा और समस्या का हल ढूंढने के उद्देश्य की थी। आज हमारे पास सिलिकॉन चिप्स, सेंसर, माइक्रोकंट्रोलर, CAD सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग शामिल हैं। है। लेकिन इंजीनियर की मूल सोच वही है— समस्या को समझो, उसका मॉडल बनाओ, समाधान डिजाइन करो और फिर उसे वास्तविक दुनिया में प्रयोग करके दिखाओ।
मोहम्मद इक़बाल
लेख़क व इतिहासकार, बिहार