साक्षरता दिवस: बेटियों की घरेलू शिक्षा, नौकरी और शिक्षा के बीच संतुलन
साक्षरता का वास्विक अर्थ केवल अक्षर ज्ञान तक सीमित नहीं है। सामान्य रुप से इसका जो पैमाना माना जाता है, वह यही है कि व्यक्ति को पढ़ना-लिखना आता हो, लेकिन यह परिभाषा अधूरी है। वास्तविक साक्षरता वह है जब कोई अपने ज्ञान को केवल जानकारी तक सीमित न रखे, बल्कि उस पर विचार करे और उसे अपनी ज़िंदगी में सही-ग़लत की पहचान का साधन बनाए।
जब वह इस ज्ञान का इस्तेमाल दूसरों की भलाई के लिए,अपने व्यक्तिगत विकास के लिए और समाज के हित में करता है, तभी वह पूरी तरह साक्षर कहलाता है। यानी हलाल-हराम, अच्छे-बुरे और सकारात्मक-नकारात्मक की पहचान होना ही वास्तव में साक्षरता है।
अब यदि बेटियों की बात करें, तो उनके लिए साक्षरता का मतलब केवल पढ़ना-लिखना सिखाना नहीं है। इसका मतलब है उन्हें समझने, फ़ैसला लेने, कमाने, बोलने और अपना भविष्य ख़ुद गढ़ने की ताक़त देना। आज कई बेटियों से उम्मीद की जाती है कि वे पढ़ाई, नौकरी, घर की ज़िम्मेदारियों और परिवार की उम्मीदों के बीच तालमेल बिठाएं, और अक्सर हर मोर्चे पर बेहतर करने को कहा जाता है, जबकि अपने सपने पूरे करने के लिए उन्हें बहुत कम समय या मदद मिलती है।
मूल विषय यह है कि पढ़ा-लिखा न होने के कारण किताबों के भीतर छिपा ज्ञान एक दीवार के पीछे रह जाता है। इसीलिए ज़रूरी है कि साक्षरता पर ज़ोर दिया जाए, विशेष रुप से तब जब पुरुषों के मुक़ाबले औरतों की साक्षरता दर पूरे हिंदुस्तान में अब भी काफ़ी कम है। हाल ही में जारी एक सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पुरुष साक्षरता दर 84.7 प्रतिशत है जबकि महिला साक्षरता दर 70.3 प्रतिशत, यानी दोनों के बीच क़रीब साढ़े चौदह प्रतिशत अंकों का फ़ासला अब भी बना हुआ है।
पढ़ा-लिखा न होना सिर्फ़ अक्षर ज्ञान की कमी नहीं, बल्कि उस पूरी ज़िंदगी से महरूमी है जो ज्ञान के ज़रिए मिलती है और जो लोग साक्षर हो चुके हैं, अगर वे अपनी जानकारी को असली ज्ञान में न बदलें, तो एक बड़ा ख़ालीपन बना रहता है। यही जानकारी जब ज्ञान (इल्म) से जुड़ती है, तभी ज़िंदगी में असली बदलाव लाती है।
मुस्लिम महिलाओं की साक्षरता दर पहले के मुक़ाबले अब गिरावट का शिकार हुई है, जबकि इतिहास इसके उलट गवाही देता है। मुस्लिम समाज में मुफ़्ती(व्यवस्थापक) और फ़िक़ह(न्यायशास्त्र) लिखने वाली महिलाओं की संख्या कभी हज़ारों में रही है, हज़रत आयशा रज़ि॰ से लेकर फ़ातिमा अल-फ़िहरी तक इसके उदारण उपलब्ध हैं, जिन्होंने अपने माता-पिता से मिली पूरी संपत्ति क़ाराविईन यूनिवर्सिटी (मोरक्को) बनाने में ख़र्च कर दी। साक्षरता के मामले में भारत की महिलाएं भी कभी पीछे नहीं रहीं।
सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख जैसी महिलाओं ने महिला शिक्षा के लिए जो आंदोलन खड़ा किया वो इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है, लेकिन भारतीय समाज में मुस्लिम समुदाय जिस तरह सामाजिक विघटन का शिकार होकर पीछे हुआ, उसी के साथ यहां की महिलाएं भी पिछड़ती चली गईं। सवाल यह है कि घरेलू शिक्षा, नौकरी और पढ़ाई के बीच संतुलन कैसे बने?
इस्लामी विद्वान इब्ने तैहमिया (र.अ) की एक मशहूर कहावत है कि अगर किसी के पास एक बेटा और एक बेटी हों, और इतना ही पैसा हो कि दोनों में से सिर्फ़ एक को पढ़ाया जा सके, तो बेटी को पढ़ाना चाहिए। क्योंकि बेटी पढ़ेगी तो एक पूरी नस्ल तैयार होगी, जबकि बेटे को पढ़ाने से सिर्फ़ एक व्यक्ति शिक्षित होता है।
साक्षरता दिवस पर एक सीधा सा सवाल पूछना बनता है, बेटी को पढ़ाई, करियर और परिवार में से किसी एक को चुनने के लिए क्यों मजबूर होना चाहिए? सच में पढ़ा-लिखा समाज वह है जो लड़कियों से घर के कामों के लिए पढ़ाई छोड़ने को नहीं कहता, बल्कि ऐसा माहौल बनाता है जहां बेटियां बिना अपराध-बोध के पढ़ सकें, बिना जज हुए काम कर सकें और यह सुने बिना करियर बना सकें कि महत्वाकांक्षा कोई समस्या है।
नौकरी और शिक्षा के बीच यह संतुलन कैसे बने, इसे समझने के लिए इस्लाम के फ़ितरी निज़ाम (प्राकृतिक प्रणाली) को देखना ज़रूरी है, जिसमें पुरुष और महिला की ज़िम्मेदारियां अलग-अलग तय की गई हैं। क़ुरआन का अध्ययन करें तो पता चलता है कि शिक्षा और धार्मिक ज्ञान(दीन का इल्म) हासिल करने के मामले में पुरुष और महिलाओं को कभी अलग-अलग नहीं बल्कि बराबर का हुक्म दिया गया। क़ुरआन की शुरुआत ही एक ज़बरदस्त हुक्म से होती है:
"पढ़ो! अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया।"[क़ुरआन 96:1]
और परमेश्वर पूछता है:
"क्या जानने वाले और न जानने वाले बराबर हो सकते हैं?"(39:9)
ये आयतें याद दिलाती हैं कि इस्लाम ज्ञान और सीखने को कितना महत्व देता है। इस्लाम में तमाम आदेश(अहकाम) पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए बराबर हैं, यही इसका सबसे सकारात्मक पहलू है।
फेमिनिज़्म का नज़रिया इससे अलग है, जिसमें पुरुषों के अधिकार अलग और महिलाओं के अलग माने जाते हैं, दोनों की दुनिया अलग-अलग रखी जाती है जबकि इस्लाम में नियमों को इस तरह से नहीं बांटा गया है। इस संतुलन को समझने के लिए कैपिटलिस्ट नज़रिये की जड़ों को भी देखना ज़रूरी है।
औद्योगिक क्रांति के बाद जब वर्कफ़ोर्स की कमी हुई, तो महिलाओं को एक सस्ता और आसानी से उपलब्ध वर्कफ़ोर्स समझा गया, जो मन लगाकर काम भी करती थीं। सत्रहवीं-अठारहवीं सदी की कॉलोनियों में विकसित वर्कफ़ोर्स का लगभग आधा हिस्सा महिलाओं का था, जिनका भरपूर इस्तेमाल किया गया। इसी पृष्ठभूमि से फेमिनिस्ट नज़रिया महिलाओं के लिए बराबरी और समानता के अधिकार की बात करने लगा।
फेमिनिज़्म जैसा नारा सुनने में महिलाओं के लिए ख़ूबसूरत लगता है, लेकिन इसने कहीं न कहीं उनकी मूल पहचान को भी नुक़सान पहुंचाया, क्योंकि उन पर ग़ैर-ज़रूरी ज़िम्मेदारियां लद गईं। वे न घरेलू ज़िंदगी से आज़ाद हुईं, न वित्तीय ज़िम्मेदारी से। यह कोई नई बात नहीं, भारत जैसे कृषि प्रधान समाज में पहले से ऐसी परंपराएं मौजूद रही हैं जहां पुरुष सिर्फ़ खेतों में बीज डालते हैं जबकि खेतों की सफ़ाई, गुड़ाई और कटाई में महिला की भूमिका कहीं ज़्यादा होती है।
यही वजह है कि महिला पर हमेशा दोहरी ज़िम्मेदारी रही है, वह घर भी संभालती है, बच्चों की परवरिश भी करती है और खेती-बाड़ी या जीविका के कामों में भी बराबर हाथ बंटाती है। आज की महिलाओं का हाल भी कुछ अलग नहीं, न उन्हें घरेलू काम से मुक्ति मिली है, न दफ़्तर के कामों से।
भौतिकवाद की इस दौड़ में पुरुष और महिला दोनों शामिल हैं, और यह एक ऐसा जाल है जिसमें महिला को उलझा दिया गया है। वह अपनी प्रतिभा से दफ़्तर भी सजाती है, वर्कफ़ोर्स भी तैयार करती है, लेकिन ज़िंदगी के जो पचास-साठ बरस उसे मिलते हैं, उनमें आने वाली नस्लों का प्रशिक्षण(तरबियत) का जो सुनहरा वक़्त है, उसमें संतुलन बनाए रखना आज भी उसके लिए एक बड़ी चुनौती है।
इन हालात में महिला के बारे में कोई भी स्थायी या दो-टूक राय देना, चाहे यह कहना हो कि उसे नौकरी की ज़रूरत ही नहीं, या यह कहना हो कि नौकरी से रोकना नेचर के ख़िलाफ़ है, दोनों ही सूरतों में इंसाफ़ के साथ संतुलन बनाने की गुंजाइश इस्लाम ने दी है, और उसी हिसाब से चलना चाहिए। हालांकि फ़ितरत(प्रकृति) यही है कि महिला की मुख्य ज़िम्मेदारी एक शिक्षिका, एक मार्गदर्शक और परिवार के केंद्र की बनी रहे।
असल संतुलन यहीं क़ायम हो तो इसका फ़ायदा एक बड़ी आबादी को मिलता है, बजाय इसके कि महिला बिना ज़रूरत अपना वक़्त और सलाहियतें चंद पैसों के लिए कहीं और खपा दे। इस्लाम ने विरासत में जो हिस्सा महिला को दिया है, उसके ज़रिए से पहले से ही उसे आर्थिक सुरक्षा मिली है, ताकि वह न भी कमाए तो भी अपनी ज़िंदगी आसानी से चला सके।
लड़की के घर में क़दम रखते ही उसकी शिक्षा ख़त्म नहीं होनी चाहिए। नौकरी को बग़ावत नहीं माना जाना चाहिए। और शादी का मतलब कभी भी सीखने का अंत नहीं होना चाहिए। बेटियों को पढ़ाएं, उनके करियर में मदद करें, घर की ज़िम्मेदारियां बांटें, उन्हें सीखते रहने की आज़ादी दें। क्योंकि जब कोई बेटी पढ़ती-लिखती है, तो वह सिर्फ़ अपनी ज़िंदगी ही नहीं बदलती, वह पूरे परिवार और आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी बदल देती है।
जब क़ुरआन हमें यह भी सिखाता है:
"अल्लाह किसी भी इंसान पर उसकी क्षमता से ज़्यादा बोझ नहीं डालता।"[क़ुरआन 2:286]
तो फिर घर, परिवार, पढ़ाई और करियर की सारी ज़िम्मेदारी अपने-आप बेटी पर ही क्यों आनी चाहिए? बेटियों का साथ देने का मतलब है ऐसे परिवार बनाना जहां ज़िम्मेदारियां बांटी जाएं, पढ़ाई को बढ़ावा दिया जाए और महत्वाकांक्षा का सम्मान किया जाए। एक पढ़ी-लिखी बेटी परंपरा के लिए ख़तरा नहीं होती, वह एक शिक्षित सोच वाली, मज़बूत इंसान और समाज में अहम योगदान देने वाली होती है।
आइए ऐसी बेटियां तैयार करें जो ज्ञान में निपुण हों, दुनिया को समझ सकें, अपने अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को जान सकें,और एक सार्थक भविष्य बना सकें।
अपने पैदा करने वाले के दिए गए अधिकारों और ज़िम्मेदारियों को जान सकें। एक सार्थक भविष्य के निर्माण में अपना योगदान दे सके। जो अंतर कर सके कि उसको महफिलों में पूंजीवाद की बार्बी डाल बनना है या फैक्ट्रियों और काल सेन्टर के हेक्टिक जॉब कल्चर में एक पुर्ज़े के रूप में इस्तेमाल होना है या सम्मान के साथ अपनी जीवन व्यतीत करने के लिए नयी राहें चुनना है।
आइये उसे पढ़ाएं। उसकी गरिमा बढ़ाएं। उसका साथ दे, उसके ज्ञान का सम्मान करें, क्योंकि एक पढ़ी-लिखी बेटी पूरी पीढ़ी को संवार सकती है।
रज़िया मसूद
सोशल एक्टिविस्ट, भोपाल, मध्य प्रदेश