खिड़की (लघुकथा)
article-image
कहानी

खिड़की (लघुकथा)

कहानी


"क्या कहा डॉक्टर ने?"

खिड़की के पास खड़ी, चाय की चुस्की लेते हुए आभा ने अपनी पड़ोसन और सहेली वैदेही से पूछा।

"वही, कुछ नया नहीं। मोबाइल की लत का असर है।" वैदेही ने आह भरते हुए कहा। "आज भी स्कूल से आते ही खुशी सिर पकड़कर बैठ गई। मेरी बच्ची की तकलीफ़ देखी भी नहीं जाती।"

"सही कह रही है। उसे समझाओ न कि कुछ दिन मोबाइल से दूरी बना ले।" आभा ने कहा।

"कहती तो हूँ, पर समझती ही नहीं। और छोड़ना भी चाहे तो बार-बार किसी न किसी काम के लिए मोबाइल उठाना पड़ता है। स्कूल के संदेश देखने होते हैं। फिर उसी में उलझ जाती है।"

तभी कमरे के कोने में बैठे वैदेही के ससुर ज़ोर से हँस पड़े। वे मोबाइल पर कोई वीडियो देख रहे थे।

वैदेही ने उनकी ओर देखते हुए कहा, "खुशी तो फिर भी बारह साल की है। ये सत्तर साल के बाबूजी हैं, इनकी लत कहाँ छूटती है! दिनभर मोबाइल में लगे रहते हैं। इन बुज़ुर्गों की इस आदत का भी कुछ होना चाहिए।"

"हूँ..." आभा बस इतना ही बोली और किसी सोच में डूब गई।

एक मिनट के मौन के बाद, खिड़की के बाहर देखते हुए वैदेही ने पूछा, "क्या हुआ? क्या सोच रही है?"

आभा मुस्कुराई, "कुछ नहीं। बस सोच रही थी कि यह खिड़की भी गज़ब की चीज़ है, है न?"

"खिड़की? उसमें क्या गज़ब है?" वैदेही ने आश्चर्य से पूछा।

बाहर की ओर इशारा करते हुए आभा बोली, "गज़ब ही तो है। कितनी सारी बातें करती है यह खिड़की। बाहर की रंग-बिरंगी दुनिया से हमें जोड़ती है। रोज़ नई-नई छोटी कहानियों का खज़ाना है यह।"

"क्या बोल रही है तू, आभा?" वैदेही हँस पड़ी।

"अरे, देख न। वह औरत कैसे अपने बच्चे की उँगली पकड़कर उसे प्यार से कहीं ले जा रही है।"

"तो उसमें क्या हुआ?" वैदेही ने पूछा।

"यार, तू समझ नहीं रही। ज़रा गौर से देख। कितना कुछ है इस खिड़की के बाहर। वह देख, सड़क साफ़ करने वाली दो औरतें काम करते-करते बातें कर रही हैं। लगता है अपने सुख-दुःख बाँट रही होंगी। और उधर देख, शायद कोई पति-पत्नी खरीदारी करके लौटे हैं। हाथों में कितने सारे थैले हैं। अरे वाह! सब्ज़ी वाला भी आ गया। अब दो घंटे तक उसके आसपास कितनी चहल-पहल रहेगी।"

"तू आज इतनी दार्शनिक क्यों बन गई है? सब ठीक तो है?" वैदेही ने छेड़ा।

"सब ठीक है। देख न, आसमान में उड़ते पक्षियों को तो हमने देखा ही नहीं। कैसे एक साथ झूमते हुए उड़ रहे हैं। और आज तो आसमान भी कितना सुंदर लग रहा है।"

काफ़ी देर तक दोनों सहेलियाँ खिड़की के बाहर के दृश्यों पर अपनी टिप्पणियाँ करती रहीं।

फिर वैदेही हँसते हुए बोली, "आज तो हमने खिड़की पर शोध ही कर डाला।"

"सच में। अच्छा यह बता, ऐसी और कितनी खिड़कियाँ होंगी हमारी ज़िंदगी में?" आभा ने पूछा।

कुछ सोचकर वैदेही बोली, "मैं समझ गई तू क्या कहना चाह रही है। तेरा मतलब है ऐसी खिड़कियाँ जो हमें बाहरी दुनिया से जोड़ती हैं। जो हमारी रोज़मर्रा की सीमित दुनिया से निकालकर बाहर झाँकने का अवसर देती हैं।"

"वाह! अब तू भी मेरी तरह दार्शनिक बन गई।" दोनों खिलखिलाकर हँस पड़ीं।

"लेकिन तेरे सवाल का जवाब अभी बाकी है। जैसे... टेलीविज़न?" वैदेही ने कहा।

"बिलकुल। और पुराने घरों में लगे बड़े-बड़े चित्र भी।"

"अरे! यह तो मुझे कभी सूझा ही नहीं। और... किटी पार्टियाँ!"

"हाँ, बिल्कुल!"

तभी दरवाज़े पर आभा का बेटा ऋषि आया।

"मम्मी, दादी बुला रही हैं। उनका चश्मा नहीं मिल रहा।"

"आती हूँ।"

आभा उठकर जाने लगी। तभी बाबूजी के मोबाइल से ज़ोर से गीत बजने लगे। वैदेही ने फिर वही नापसंदगी वाला चेहरा बनाया, मानो सोच रही हो कि इनका यह मोबाइल कब छूटेगा।

आभा ने उसकी ओर देखते हुए कहा, "देखना, खुशी की परेशानी दूर करने के चक्कर में बाबूजी की खिड़की मत बंद कर देना।"

यह कहकर वह चली गई, लेकिन वैदेही वहीं खड़ी सोचती रह गई।

अब उसे समझ में आ गया था कि आभा अचानक खिड़की की बात क्यों करने लगी थी।


यह मोबाइल भी तो बाबूजी की एक खिड़की ही है।

और है भी क्या उनके पास?

न हमारे पास इतना समय है कि बैठकर उनसे बातें करें, न उनमें अब इतनी शक्ति बची है कि किसी काम में मन लगाकर समय बिता सकें। पहले फिर भी बाहर निकलते थे। सब्ज़ी ले आते थे, अपने हमउम्र लोगों के साथ कुछ देर बैठ लेते थे। अब वह भी कहाँ हो पाता है।

और वैदेही सोचती रही...

केवल बाबूजी ही नहीं, अपने आसपास के सभी बुज़ुर्गों के बारे में सोचने लगी। पड़ोस वाली सुशीला आंटी, चौथी मंज़िल वाले पीयूष अंकल, और हाँ, बारहवीं मंज़िल वाली मीना आंटी।

मीना आंटी तो मोबाइल का उपयोग भी नहीं करतीं। उन्हें स्मार्टफ़ोन चलाना नहीं आता। शायद इसलिए वे हमेशा कुछ उदास-सी लगती हैं। मानो बंद कमरों में कैद ज़िंदगी जी रही हों, क्योंकि उनके पास कोई खिड़की ही नहीं है...

तभी बाबूजी ने पानी के लिए आवाज़ लगाई।

इस बार वैदेही बिना देर किए मुस्कुराते हुए पानी लेने चली गई, मानो वह बाबूजी को एक और छोटी-सी खिड़की देना चाहती हो।

आज सचमुच आभा गज़ब कर गई थी।


मोहसिना सचोरा

अहमदाबाद, गुजरात

हालिया अपलोड

img
अपडेट
ज्ञान का दीपक

ज्ञान का दीपकअंधेरे ने हर चीज को अपने हिसार में ले रखा...

img
अपडेट
बदलते समय में व्यक्तित्व निर्माण क्यों...

दुनिया शायद पहले कभी इतनी तेज़ी से नहीं बदली, जितनी आज बदल...

img
अपडेट
स्त्री मांगे बस तेरा प्यार

स्त्री मांगे बस तेरा प्यारना मांगे बंगलाना मांगे कारस्त्री मांगे बस तेरा...

img
अपडेट
खिड़की (लघुकथा)

कहानी"क्या कहा डॉक्टर ने?"खिड़की के पास खड़ी, चाय की चुस्की लेते हुए...

Editorial Board

Arefa PareveenChief Editor

Khan ShaheenEditor

Saheefah KhanSub Editor

Members