...जब प्रधानमंत्री वाजपेयी ने लेफ्ट नेता को फ़ोन किया
20 मार्च 2003 की सुबह दुनिया एक नए युग में दाख़िल हुई। अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने इराक़ पर हमले का ऐलान कर दिया। दावा था कि सद्दाम हुसैन के पास तबाही के हथियार हैं। केमिकल और जैविक हथियार जो पूरी दुनिया के लिए ख़तरा हैं। यह दावा बाद में झूठ साबित हुआ, लेकिन उस समय अमेरिका की ताक़त और दबाव के सामने दुनिया के 48 मुल्क एक गठबंधन में शामिल हो गए। ब्रिटेन, पोलैंड, ऑस्ट्रेलिया सब साथ थे।
अमेरिका का इराक़ पर क़ब्ज़ा करना एक बात थी, उसे संभालना बिल्कुल दूसरी बात। मोसुल और कुर्दिश इलाक़ों में शांति बनाए रखने के लिए उन्हें भरोसेमंद और ताक़तवर सेना चाहिए थी। और उनकी नज़र में भारतीय सेना से बेहतर विकल्प कोई नहीं था।
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बृजेश मिश्रा मई के पहले हफ़्ते में वाशिंगटन गए। वहाँ बुश, सेक्रेटरी ऑफ स्टेट और सुरक्षा सलाहकार से मुलाक़ात हुई। यही वो पल था जब अमेरिका ने पहली बार औपचारिक रूप से माँग रखी कि भारत एक पूरा बेड़ा, यानी क़रीब 17,000 से 20,000 सैनिक, उत्तरी इराक़ भेजे। और ये बात लगभग तय हो चुकी थी भारत से एक बड़ा दस्ता इराक़ भेजा जाने वाला था। भारतीय सेना इसके लिए संस्थागत रूप से तैयार थी।
उस समय माहौल ऐसा था कि भारत के बड़े-बड़े अख़बार और पत्रिकाएँ भी सेना भेजने के पक्ष में थे। इंडियन एक्सप्रेस के प्रधान संपादक शेखर गुप्ता ने एक लेख लिखा 'Unshackle, seize the moment' जिसमें उन्होंने कहा कि अमेरिका के साथ न खड़े होना "दोहरा ख़तरा" है। इंडिया टुडे ने अपने संपादकीय में लिखा कि संसदीय प्रस्ताव के ज़रिए भारत ने "इतिहास के सही पक्ष में खड़े होने का मौक़ा गँवा दिया।" फाइनेंशियल एक्सप्रेस के संपादक संजय बारू ने तर्क दिया कि सेना भेजना आर्थिक रूप से भी सही होगा ऊर्जा सुरक्षा में निवेश होगा। सी राजा मोहन जैसे विश्लेषक ने द हिंदू में लिखा कि अगर वाजपेयी ने यह "साहसी फ़ैसला" किया, तो दुनिया के नेताओं में उनकी हैसियत "नाटकीय रूप से" बढ़ जाएगी।
एक तरफ अमेरिका और दूसरी तरफ़ मीडिया पूरी तरह से दबाव बना रहा था की भारत सरकार सेना को इराक़ भेजे और उस समय भारत के रक्षा मंत्री जॉर्ज फ़र्नांडीस, गृह मंत्री लाल कृष्ण आडवाणी, विदेश मंत्री जसवंत सिंह और सेना प्रमुख, सब के सब इराक़ में सेना भेजने को लेकर सहमत थे, अर्थात सरकार के भीतर से कोई विरोध नहीं था।
रिपोर्टों के मुताबिक़ भारतीय सेना ने उन यूनिट्स तक की पहचान कर ली थी जो इराक़ भेजी जाती। ट्रांसपोर्टेशन और तैनाती की योजनाएँ बन चुकी थीं। सभी को यही आशा थी की भारत बस कुछ ही हफ़्तों में अमेरिकी गठबंधन का हिस्सा बन जाएगा।
जून 2003 में उप-प्रधानमंत्री आडवाणी वाशिंगटन गए। उनका इरादा था कश्मीर पर अमेरिकी समर्थन लेना और पाकिस्तान पर दबाव बनवाना। लेकिन बातचीत में कुछ और ही हावी रहा। ख़ुद आडवाणी ने स्वीकार किया कि वाशिंगटन में इराक़ के लिए भारतीय सेना को भेजने का मुद्दा ही हावी रहा।
लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सेना नहीं भेजना चाहते थे इसके लिए उन्हें एक ऐसा बहाना चाहिए था जो अमेरिकी दबाव से बाहर निकलने का रास्ता दे सके और उन्होंने अपनी असल चाल चली। बाजपेयी ने फ़ोन उठाया और सीपीआई के महासचिव ए.बी. बर्धन को कॉल लगाया।
दोनों के बीच पुरानी जान-पहचान थी। राजनीतिक विरोधी थे, लेकिन एक-दूसरे को जानते समझते थे। बर्धन ने बाद में इस बातचीत को ख़ुद सार्वजनिक किया।
- क्या तुम इराक़ में भारतीय कब्ज़े का समर्थन कर रहे हो? .... वाजपेयी ने तंज़ के साथ पूछा।
- बिल्कुल नहीं! ... बर्धन ने कहा।
- लेकिन मुझे कोई विरोध-प्रदर्शन दिखता नहीं? ... वाजपेयी ने कहा।
बस इतना सी बात हुई।
लेकिन इस छोटी सी बातचीत में वाजपेयी ने जो कहा, वो किसी भी सीधे आदेश से ज़्यादा असरदार था। भाजपा के नेता अटल बिहारी बाजपेयी एक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता से कह रहे थे "सड़क पर जाओ, आवाज़ उठाओ।"
इसके साथ ही एक ऑल पार्टी बैठक में वाजपेयी ने सीपीआई(एम) के हरशिकन सिंह सुरजीत को भी बुलाया। लेफ्ट नेताओं ने आपत्ति जताई जैसी उनसे उम्मीद थी। और वाजपेयी ने उनसे खुलकर कहा — "जाओ, बाहर जाकर ज़ोर से बोलो।"
और इस सबके बाद अगले दिन संसद ने प्रस्ताव पास कर दिया। .. भारत किसी गठबंधन में शामिल नहीं होगा।
विनोद मेहता, जो उन दिनों आउटलुक के संपादक थे, उन्होंने भी लिखा कि वाजपेयी ने बर्धन और सुरजीत को बुलाया था। उनसे पूछा था कि देश भर में उनके विरोध प्रदर्शनों की क्या हालत है। दोनों ने कहा कि जनता का अच्छा साथ मिल रहा है। वाजपेयी ने कहा ,,,, अच्छा है। लेकिन और तेज़ करो।
उस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने वाजपेयी को एक पत्र लिखा था जिसमें इराक़ में सेना भेजने का विरोध किया गया था। वाजपेयी ने उन्हें बैठक के लिए बुलाया। सोनिया गाँधी अपने सलाहकारों के साथ आईं, विचार-विमर्श हुआ।
सभी तीनों बैठकों में यही सहमति बनी कि भारत को इराक़ में सेना नहीं भेजनी चाहिए, यही बात अमेरिका को बताई गई।
विदेश मंत्रालय के सेक्रेटरी राजेंद्र अभयकर को ख़ुद इराक़ भेजा गया ज़मीनी हालात समझने के लिए। उन्होंने कुर्दिश नेताओं जलाल तबलानी और मसूद बरजानी से मुलाक़ात की। रिपोर्ट आई वहाँ जाना भारत के हित में नहीं।
यूएन जरनल एसेंबली के मौक़े पर वाजपेयी ने कहा बिना यूएन के स्पष्ट निर्देश के भारत सेना नहीं भेजेगा, और देश की अपनी सुरक्षा ज़रूरतें भी हैं।
आज इराक पर अमेरिकी हमले को दो दशक से ज़्यादा हो चुके है, 4,500 से ज़्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए। लाखों इराक़ी नागरिकों की जानें गईं। छह ट्रिलियन से ज़्यादा का ख़र्च अमेरिका के माथे पर आया। सद्दाम हुसैन के पास जैविक हथियार कभी मिले नहीं क्योंकि थे ही नहीं। और उस तबाही की कोख से आईएसआईएस जैसे संगठन पैदा हुए जिन्होंने दुनिया को एक नए किस्म के आतंक से रूबरू कराया।
जो देश उस गठबंधन में थे, उनमें से कई को आज भी उस फ़ैसले का ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा। ब्रिटेन में तो चिलकोट इंक्वायरी के नाम से 12 भागों की जाँच रिपोर्ट आई, जिसमें टोनी ब्लेयर की सरकार की गहरी आलोचना हुई।
उस दौरान अगर 17,000 से 20,000 भारतीय जवान मोसुल में तैनात होते, उस चिंगारी के बीच जो बाद में भड़की, उस अराजकता में जो 2003 के बाद इराक़ में आई तो क्या होता?
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प पहलू वो है जो आम तौर पर नज़रअंदाज़ हो जाता है। 2003 में, जब देश एक ऐसे फ़ैसले की कगार पर खड़ा था जो शायद इतिहास में भारी पड़ता, जब एक तरफ़ अमेरिका का दबाव दूसरी तरफ़ मीडिया का दबाव ऐसे में एक दक्षिणपंथी भाजपा सरकार को कम्युनिस्टों ने इस दबाव से बाहर निकालने में बड़ी भूमिका निभाई। कम्युनिस्टों ने भाजपा सरकार को अमेरिकी दबाव को कम करने की एक वजह दी और अमेरिका को ये संदेश गया की भारत के अंदर सेना भेजने का विरोध हो रहा है।
और इस तरह भारत को अमेरिकी दबाव से निकालने में कम्युनिस्टों ने भाजपा सरकार की मदद की और सरकार को एक बड़े संकट से बाहर निकाला।
मोहम्मद इक़बाल
बिहार