सादगी दिवस : जीवन में सादगी आज़ादी है हर प्रकार के नियंत्रण से
प्रत्येक वर्ष 12 जुलाई को सादगी दिवस मनाया जाता है। ऐसे में इस अवसर पर हमें यह मंथन करना चाहिए कि क्या वास्तव में हमारे जीवन में सादगी नाम की कोई चीज़ रह गई है? क्योंकि 21 वीं सदी का व्यक्ति एवं समाज भौतिक वस्तुओं और भौतिकता कि मानसिकता से पूरी तरह नियंत्रित एवं उसी में डूबा हुआ नज़र आता है, और इसी कारण वह अपनी प्रकृति एवं अपने चारों ओर मौजूद प्राकृतिक चिन्हों से कटा हुआ नज़र आता है, जिसके परिणाम स्वरुप व्यक्ति के मन की शांति उसकी सुन्दरता एवं समाज में न्याय एवं शांति कम से कम होती जा रही है|
आइये जीवन में सादगी (Simplicity) से दूरी के कारण और दुष्परिणामों एवं सादा जीवन शैली अपनाने से होने वाले सकारात्मक बदलाव के विभिन्न पहलुओं पर हम विचार करते हैः-
सादगी: प्रकृति से निकटता
जीवन में सादगी अर्थात कम से कम भौतिक साधनों में एक आनंदमय संतुष्ट जीवन जीना है। यह सादगी वास्तव में प्रकृति से सामंजस्य, निकटता और प्रकृति के साथ बहना है। कोई व्यक्ति कितना धनवान, खुश और सफल है यह इस बात से तय नहीं होता कि उसके पास कितना धन और विलासिता के भौतिक साधन या उनको प्राप्त करने का सामर्थ्य है, बल्कि इस बात से तय होता है कि वह कितने कम से कम भौतिक साधनों में गुजारा करके ईश्वर का कृतज्ञ (Grateful) हो सकता है।
यह कृतज्ञता (Gratitude) की मानसिक व हार्दिक अवस्था ईश्वर कि किसी पर होने वाली बहुत बड़ी और मूल्यवान कृपा है। कृतज्ञता मानव कि प्रकृति है, वर्तमान से बेहतर होने कि चाह ईश्वर ने मानव में रखी है। वह इस धरती पर मानव जीवन की प्रगति और समृधि के लिए एक आवश्यकता है, लेकिन यह अगर अनियंत्रित लालच बन जाए और इंसान अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण न कर सके तो वह ज्यादा से ज्यादा धन प्राप्त करने के जाल में फंसता चला जाता है|
ज्यादा धन और साधन प्राप्त करते रहने की प्रवृति का एक कारण इंसान का डर और असुरक्षा है, वह अपने आप को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित रखने के लिए ज्यादा भौतिक साधन जमा करने की होड़ में शामिल हो जाता है और उसका गुलाम बनता चला जाता है। वह इस तरह अपनी प्रकृति और इस संसार कि प्रकृति से दूर होता चला जाता है। प्रकृति से दूरी संसार में बिगाड़ और अशांति को बढ़ावा देती है।
सादगी आजादी है
इंसान वास्तव में धन, शक्ति और साधन ज्यादा से ज्यादा जिन कारणों से अर्जित करने की कोशिश करता है उनमें लालच, डर और दिखावा यानि अपनी वास्तविकता छुपा कर अपने आप को वह साबित करने का प्रयास जो वह नहीं है। और ये सब प्रवत्तियां इंसान की गुलामी की विभिन्न शक्लें हैं, सादगी जीवन में सरलता, सहजता और पारदर्शिता को अपनाने का नाम है जिसके परिणामस्वरुप इंसान उन बहुत सारी गुलामियों से आज़ाद हो जाता है।
सादगी का एक और अर्थ है स्वयं बनना। वस्तुएं, समाज और हालात जो हम को स्वयं के अलावा कुछ और बनाना चाहते हैं इस दबाव से आजादी का परिणाम है सादगी का जीवन। समाज के रीति रिवाज के आगे अधिकतर लोग समाज से डर कर और मजबूर होकर भीड़ के पीछे चलते रहते हैं। आवश्यकता और आर्थिक सामर्थ्य न होते हुए भी हम बहुत से काम ऐसे करते हैं जो सिर्फ समाज को खुश रखने के लिए होते हैं।
इस डर से आजादी हासिल करना बहुत आवश्यक है कि लोग क्या कहेंगे और हमारे बारे में क्या सोचेंगे? अगर हम मजबूती से अपनी इस बात पर जम जाएं कि हम वह काम और वह खर्च नहीं करेंगे जो हमारी आवश्यकता नहीं है तो हमारे जीवन में अपार सुख व शांति आ सकती है।
विलासिता पूर्ण जीवन; अन्याय व अशांति का कारण
यह संसार, प्रकृति और इसमें मौजूद संसाधन इंसान कि आवश्यकता के लिए बनाए गए हैं, अपनी आवश्यकता के अनुसार इनका प्रयोग करना उचित है और उस पर हम को ईश्वर का कृतज्ञ भी होना चाहिए और कृतज्ञता को बार बार दोहराते रहना चाहिए। ईश्वर प्रदत्त इन सुविधाओं पर हम को विनम्र होना चाहिए और हमारे मन और मस्तिष्क में यह भाव हमेशा रहना चाहिए कि हम इन सब चीज़ों के मालिक नहीं हैं बल्कि हमको इनका ट्रस्टी बनाया गया है।
इस प्रकृति और संसाधनों पर पूरी मानव जाति का अधिकार है, अगर कोई व्यक्ति, समुदाय या देश अपनी आवश्यकताओं से अधिक संसाधनों का प्रयोग करता है तो वह दूसरे लोगों का हक मार रहा है और उनको वंचित कर रहा है। यह सवाल किया जा सकता है कि आवश्यकता का निर्धारण आखिर कौन करेगा? यह बात सही है कि आवशकता का निर्धारण तो इंसान, स्वयं ही करेगा लेकिन अगर वह नैतिक रूप से मज़बूत है और ईश्वर के प्रति जवाबदेही ( Accountability before God) पर विश्वास रखता हो तो यह निर्धारण व्यवहारिक एवं न्याय पर आधारित होगा।
किसी और का या बहुत से लोगों के अधिकार पर कब्ज़ा करना अन्याय है, अन्याय करने वाले व्यक्ति के मन में भी अशांति पैदा होती है। अन्याय लोगों के बीच द्वेष, घृणा और टकराव का कारण बनता है और उससे समाज में अशांति बढ़ती है। अन्याय मानव प्रकृति के भी विरुद्ध है और अन्याय इस संसार की प्रकृति के भी विरुद्ध है। जब भी व्यक्ति या समाज प्रकृति के विरुद्ध जाएगा, आपदाओं और अशांति को निमंत्रण देगा।
ईश्वर जो इस सारी सृष्टि का रचयिता और हम सब का पैदा करने वाला और पालनहार है, सर्वज्ञानी और सर्व शक्तिमान है उसने पूरी योजना के साथ संसार कि रचना की है। उसने इस धरती और आकाश और समुद्र में मौजूद और आने वाले सभी प्राणियों की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त संसाधन पैदा किये हैं। इंसान के लालच ही के कारण समस्याएं और अव्यवस्थाएँ पैदा हुई हैं।
महात्मा गांधी जी ने कहा था किः
“इस धरती पर इंसान कि आवश्यकताओं के लिए तो पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं लेकिन ये सारे संसाधन एक व्यक्ति के लालच के भी पर्याप्त नहीं हैं”
बहुत से लोग जनसंख्या को बहुत सी समस्याओं का कारण बताते है, वास्तव में आबादी का ज्यादा होना समस्या का कारण नहीं बल्कि इंसान का लालच, उसका अहंकार, दूसरों के अधिकारों की परवाह न करना और संसाधनों का अन्याय पूर्ण वितरण है, इसी कारण संसार में द्वेष, टकराव और हिंसा व अपराध बढ़ रहे हैं, देशों के बीच तनाव और युद्ध का भी मुख्य कारण यही है।
फ़िज़ूल खर्ची ; सादगी के रास्ते कि बड़ी रुकावट
सादगी अपनाने का अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि हम खाना पीना और ईश्वर की ओर से मानव जाति को दिए गए आशीर्वाद से फायदा न उठायें और उस से आनंदित न हों, बल्कि हम आवश्कता अनुसार सारी चीज़ों का प्रयोग करें और अपने सृष्टा का धन्यवाद करते रहें। संसार की सुख सुविधाओं को पूरी तरह त्याग देना और लोगों से कट कर जीवन बिताना ईश्वर को वांछित नहीं है।
बल्कि ईश्वर ने तो यह सारी सृष्टि ही मानव के सुपुर्द की है और इस धरती पर इंसान को अपना प्रतिनिधि बनाया है और इस संसार और इसमें मौजूद सारी चीज़ों पर न्याय के साथ अधिकार दिया है। इस में हम सब की परीक्षा भी है कि हम इस ईश्वर प्रदत्त अधिकार का प्रयोग उचित रूप से करते है या नहीं।
ईश्वर के अंतिम अवतरण कुरान में हमारे सृष्टा कि ओर से बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है किः
“तुम खाओ और पीओ मगर अपव्यय (फ़िज़ूल खर्ची) मत करो”
आवश्यकता से अधिक खर्च करना ईश्वर कि दृष्टि में पाप है, कुरान में यह भी कहा गया है कि
“जो लोग फ़िज़ूल खर्ची करते हैं वो वास्तव में शैतान (ईश्वर का बागी) के भाई हैं”
फ़िज़ूल खर्ची इंसान लालच या अपने आप को बड़ा दिखाने के लिए करता है, ईश्वर ऐसे लोगों को पसंद नहीं करता। ऐसे लोग दूसरे लोगों का हक छीनने का अपराध करते हैं।
आज हमारे समाज में शादी और दूसरे खुशी के अवसरों पर अपनी शान दिखाने या समाज के दबाव में बेतहाशा खर्च किया जाता है, जिस से समाज में बहुत सी खराबियां भी बढ़ रहीं हैं।
हज़रत मुहम्मद (ईश्वर कि उन पर विशेष कृपा हो) ने एक हदीस में फ़रमायाः
“सब से ज्यादा ईश्वर की कृपा उस निकाह पर होती है जिस में सब से कम खर्च हो”
कुरान में कहा गया किः
“वास्तव में रसूल (हज़रत मुहम्मद, उन पर ईश्वर कि विशेष कृपा हो) के जीवन में तुम्हारे (सारी मानव जाति) लिए एक आदर्श है”
ईश्वर के अंतिम पैगम्बर यानि हज़रत मुहम्मद सल्ल० का जीवन सादगी की एक मिसाल था, आज के इस समय में उनके जीवन का अनुसरण करके हम अपने आप को आज़ाद कर सकते हैं। अपने जीवन को सरल, सहज, सुन्दर और सफल बना सकते हैं।
मुहम्मद सलीम इंजीनियर
राष्ट्रीय महासचिव, जमाअत-ए-इस्लामी हिंद