अमेरिका-इजराइल बनाम ईरान: दुनिया की तासीर और तस्वीर बदलने वाला युद्ध
1981-82 में, जब मैं अहमदाबाद की भठियार गली में खाना खाने बैठा था, तब दो छात्र आकर मेरे पास बैठे। जब मैंने उनसे पूछा कि वे कहाँ से हैं, तो उन्होंने बताया कि वे ईरान से हैं। मैंने तुरंत उनसे ईरान-इराक के बीच चल रहे युद्ध के बारे में बात की, तो वे उस युद्ध में ईरान के रुख का पुरजोर बचाव कर रहे थे। जब मैंने उनसे कहा कि इस तरह तो आपकी अर्थव्यवस्था (इकोनॉमी) बर्बाद हो जाएगी, तो उनका तुरंत जवाब था— "इकोनॉमी जाए भाड़ में" (Hell with the economy)।
भारी तबाही और आर्थिक नुकसान झेलने के बाद भी, ईरान आज भी वही जोश और जज्बा दिखा रहा है। 1979 में हुई इस्लामिक क्रांति को बदलने के लिए अमेरिका ने इराक के सद्दाम हुसैन को मोहरा बनाकर यह युद्ध शुरू करवाया था। उसका एकमात्र उद्देश्य 'सत्ता परिवर्तन' (Regime Change) था। 28 फरवरी, 2026 को इजराइल और अमेरिका ने मिलकर जो युद्ध शुरू किया है, उसका उद्देश्य भी वही सत्ता परिवर्तन है।
1979 में जिस शाह रजा पहलवी को सत्ता से बेदखल किया गया था, अमेरिका अब उनके बेटे को फिर से सिंहासन पर बैठाना चाहता है। लेकिन जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता बिल्कुल नहीं है और अब इस युद्ध ने उस पर एक बड़ा पूर्णविराम लगा दिया है। पिछले एक महीने से यह युद्ध चल रहा है, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है।
दुनिया भर के न्यूज़ चैनल, टीवी एंकर, यूट्यूबर्स और अखबार इसे अलग-अलग भाषाओं में और कई नजरियों से पेश कर रहे हैं। चलिए, थोड़ा विस्तार से समझते हैं।
28 फरवरी, 2026 को अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए संयुक्त सैन्य अभियान ने मध्य पूर्व को एक नए और विनाशकारी युद्ध के कगार पर ला खड़ा किया था। अब, लगभग एक महीने बाद, यह संघर्ष न सिर्फ जारी है बल्कि नए मोर्चों और रणनीतियों के साथ और अधिक जटिल हो गया है। 22 मार्च, 2026 को ईरान द्वारा इज़राइल के दिमोना परमाणु स्थल पर किए गए हमले ने इस युद्ध को एक नए मोड़ पर पहुंचा दिया।
यह सीधा सैन्य संघर्ष वर्षों से चली आ रही छद्म युद्ध (shadow war) की परिणति है। 28 फरवरी, 2026 की शुरुआत में, इज़राइल और अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया। पहले हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई, रक्षा मंत्री, और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के कमांडर सहित वरिष्ठ सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व को निशाना बनाया गया।
अमेरिका और इज़राइल की रणनीति के तीन मुख्य चरण रहे हैं:
1. वायु सुरक्षा को नष्ट करना: ईरान की वायु रक्षा प्रणाली को ध्वस्त कर आसमान पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना।
2. सैन्य क्षमताओं को ध्वस्त करना: मिसाइल स्थलों, ड्रोन कारखानों और IRGC नौसेना के ठिकानों को नष्ट करना।
3. सत्ता परिवर्तन का प्रयास: सुरक्षा तंत्र को कमजोर कर ईरान के भीतर से सत्ता परिवर्तन की स्थिति बनाना।
हाल के दिनों में युद्ध की प्रकृति में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिला है, जहां ईरान ने पलटवार की अपनी रणनीति को और अधिक आक्रामक बना दिया है।
1. दिमोना पर हमला (22 मार्च 2026)
22 मार्च, 2026 को ईरान ने इज़राइल के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित दिमोना परमाणु ढांचे पर हमला किया। यह स्थल इज़राइल के परमाणु कार्यक्रम का केंद्र माना जाता है। यह हमला उसी दिन हुए अमेरिका-इज़राइल के हमले की प्रतिक्रिया थी, जिसमें ईरान के नाटांज़ परमाणु संवर्धन सुविधा को निशाना बनाया गया था।
यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि ईरान अब "क्षैतिज विस्तार" (horizontal escalation) की रणनीति अपना रहा है। पहले जहां संघर्ष ईरान की सीमाओं के अंदर सीमित था, वहीं अब ईरान इज़राइल के अंदर भी उतने ही संवेदनशील लक्ष्यों को निशाना बना रहा है।
2. नेतन्याहू बनाम ट्रंप: साझेदारी में दरार?
जहां इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लगातार सैन्य दबाव बनाए रखने के पक्ष में हैं, वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कूटनीतिक समाधान की ओर संकेत कर रहे हैं। ट्रंप ने हाल ही में ईरान के ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमलों को स्थगित कर दिया और "रचनात्मक बातचीत" का हवाला दिया।
विश्लेषकों के अनुसार, यह "गठबंधन जाल" (alliance trap) की स्थिति को दर्शाता है, जहां एक छोटा सहयोगी (इज़राइल) बड़े सहयोगी (अमेरिका) को उस युद्ध में धकेल सकता है जिससे वह बाहर निकलना चाहता है।
यह युद्ध सिर्फ सैन्य प्रतिष्ठानों तक सीमित नहीं रहा है। संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवीय संगठनों के अनुसार, इसके विनाशकारी परिणाम सामने आए हैं।
1. जानमाल का नुकसान और विस्थापन
मृत्यु और विस्थापन: 20 मार्च, 2026 तक, ईरान में हवाई हमलों में 1,444 से अधिक लोग मारे गए थे, जिनमें ज्यादातर नागरिक थे, और 18,550 से अधिक घायल हुए थे। इनमें कम से कम 168 बच्चे और 55 स्वास्थ्य कर्मी शामिल हैं।
· आंतरिक विस्थापन: लगभग 3.2 मिलियन ईरानी अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं।
· मीनाब त्रासदी: एक स्कूल पर हुए हमले में 168 से अधिक स्कूली छात्राओं की मौत ने युद्ध की भयावहता को दर्शाया है। संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने इस नागरिक ढांचे पर हमले की कड़ी निंदा की है ।
2. वैश्विक अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभाव
· होर्मुज जलडमरूमध्य: ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को बाधित कर दिया है। यह मार्ग दुनिया के लगभग 25% तेल व्यापार का मार्ग है ।
· खाद्य सुरक्षा: खाड़ी देशों से यूरिया उर्वरक के निर्यात में रुकावट से दक्षिण एशिया और अफ्रीका जैसे आयात-निर्भर क्षेत्रों में खाद्य संकट गहरा सकता है।
· जल संकट: खाड़ी देशों की अलवणीकरण संयंत्र (desalination plants) पर निर्भरता के कारण, इन ढांचों को नुकसान होने पर लगभग 6.2 करोड़ लोगों के लिए पेयजल संकट पैदा हो सकता है।
शुरुआत में अमेरिका-इज़राइल ने अपनी सैन्य श्रेष्ठता का पूरा लाभ उठाया। उनके लड़ाकू विमानों ने ईरान के आसमान में बिना किसी नुकसान के संचालन किया लेकिन अब स्थिति बदल गई है। नेतन्याहू का लक्ष्य IRGC को पूरी तरह नष्ट करना है, जबकि ट्रंप प्रशासन "सुनहरी बिंदु" (Goldilocks point) की तलाश में है - यानी ईरान को इतना कमजोर करना कि वह खतरा न रहे, लेकिन इतना नहीं कि वह पूरी तरह ढह जाए और अराजकता फैल जाए।
ईरान जानता है कि वह अमेरिका-इज़राइल गठबंधन को सीधे सैन्य युद्ध में नहीं हरा सकता। इसलिए उसने "क्षैतिज विस्तार" की रणनीति अपनाई है।
उद्देश्य: युद्ध को लंबा खींचना, भौगोलिक रूप से फैलाना, और वैश्विक अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाकर अमेरिका और उसके सहयोगियों पर राजनीतिक और आर्थिक लागत बढ़ाना।
· मोज़ेक रक्षा (Mosaic Defence): नेतृत्व पर हमलों के बावजूद, ईरान की कमान और नियंत्रण प्रणाली विकेंद्रीकृत है, जिससे वह तेजी से पलटवार कर सकता है।
· लंबी अवधि: ईरान का मानना है कि जितना यह युद्ध लंबा चलेगा, अमेरिका और इज़राइल के भीतर इसके खिलाफ जनमत उतना ही मजबूत होगा, ठीक वैसे ही जैसे वियतनाम और अफगानिस्तान में हुआ था ।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ
· संयुक्त राष्ट्र: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने अमेरिका और इज़राइल द्वारा "बिना उकसावे के" शुरू किए गए हमलों की निंदा करते हुए कहा कि ये अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हैं। साथ ही, उन्होंने ईरान के जवाबी हमलों में आवश्यकता और अनुपातिकता (necessity and proportionality) के सिद्धांतों का पालन करने की आवश्यकता पर बल दिया।
· खाड़ी देश: संयुक्त अरब अमीरात, कतर और बहरीन, जहां अमेरिकी सैन्य अड्डे हैं, इस युद्ध में फंस गए हैं। इन देशों ने ईरान के हमलों का सामना किया है और वे युद्ध को सीमित रखना चाहते हैं।
· अन्य देश: जहां रूस और चीन ने तटस्थता बरती है, वहीं यूनाइटेड किंगडम ने अमेरिका को अपने ठिकानों (डिएगो गार्सिया) के इस्तेमाल की अनुमति दे दी है, जिससे अमेरिकी बमवर्षक विमानों की पहुंच बढ़ गई है ।
भविष्य की संभावनाएँ: युद्ध का अंत कैसे होगा?
विश्लेषकों के अनुसार, यह युद्ध अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गया है। अमेरिका और इज़राइल के उद्देश्यों में स्पष्ट अंतर आ गया है।
तीन संभावित परिदृश्य सामने हैं:
1. कूटनीतिक निकास: अमेरिका ओमान या अन्य मध्यस्थों के माध्यम से बातचीत का रास्ता निकालने की कोशिश कर रहा है, लेकिन ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह युद्धविराम नहीं चाहता।
2. घिसाव का युद्ध: यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो ईरान की रणनीति अमेरिका-इज़राइल गठबंधन को कमजोर कर सकती है। बढ़ती तेल की कीमतें और अमेरिकी जनता में युद्ध-विरोधी भावना ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ा सकती है ।
3. जमीनी युद्ध का जोखिम: हालांकि फिलहाल यह सिर्फ हवाई युद्ध है, यदि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद कर दिया या अमेरिकी जहाजों को भारी नुकसान पहुंचाया, तो अमेरिका जमीनी कार्रवाई करने को मजबूर हो सकता है ।
ईरान-इज़राइल युद्ध अब केवल दो देशों के बीच सैन्य टकराव नहीं रह गया है। यह एक जटिल क्षेत्रीय युद्ध बन गया है जिसमें वैश्विक शक्तियां, ऊर्जा सुरक्षा, और अंतरराष्ट्रीय कानून दांव पर लगे हैं।
जहां एक ओर इज़राइल अपनी सैन्य श्रेष्ठता के बल पर ईरान के सुरक्षा तंत्र को ध्वस्त करना चाहता है, वहीं ईरान युद्ध को लंबा खींचकर, उसे आर्थिक और राजनीतिक रूप से इतना महंगा बनाना चाहता है कि अमेरिका और इज़राइल को पीछे हटना पड़े। इस बीच, आम नागरिक और बच्चे इस युद्ध की सबसे भारी कीमत चुका रहे हैं।
प्रत्येक युद्ध की शुरुआत का कोई निश्चित कारण होता है और उसका समाधान होते ही युद्ध स्वाभाविक रूप से समाप्त भी हो जाता है।
वर्तमान में ईरान के खिलाफ अमेरिका और इज़राइल द्वारा छेड़े गए युद्ध के पीछे शुरुआत से ही कोई स्पष्ट कारण दिखाई नहीं देता। यदि वे नेतृत्व परिवर्तन की बात कर रहे थे, तो युद्ध के दूसरे ही दिन अली खामेनेई की मृत्यु के साथ वह कारण समाप्त हो गया है। परमाणु हथियारों के आरोपों के खिलाफ अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं मिले हैं, और इज़राइल दो बार यह दावा कर चुका है कि उसने ईरान के परमाणु ठिकानों को नष्ट कर दिया है। ऐसी स्थिति में अब युद्ध का कोई ठोस कारण नज़र नहीं आता।
असल में, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप बुरी तरह फंस चुके हैं और केवल अपनी साख बचाने के लिए अपने अहंकार को पोषित कर रहे हैं। एक कहावत है— "माँ, मुझे कोठी (अनाज के बड़े पात्र) से बाहर निकाल।" बाल कहानी में माँ बच्चे पर गुस्सा हो जाती है, जिससे बच्चा रूठकर अनाज की एक बड़ी कोठी में छिप जाता है। माँ उसे ढूँढती है पर वह नहीं मिलता। कुछ समय बाद बच्चा कोठी के अंदर घबराने लगता है। वह ऊपर चढ़कर अंदर तो उतर गया था, लेकिन अब बाहर कैसे निकले, यह उसे समझ नहीं आ रहा। अंत में, जिससे वह रूठा था, उसी माँ को पुकार कर कहता है, "माँ, मुझे कोठी से निकाल।"
ट्रंप घोषणा करते हैं कि "हम पांच दिनों तक ईरान के बिजली घरों पर हमला नहीं करेंगे" और बातचीत का संदर्भ देते हैं, जबकि ईरान का कहना है कि वे कोई बातचीत नहीं कर रहे हैं। नाटो (NATO) के सहयोगी भी होर्मुज की नाकेबंदी तोड़ने के आह्वान पर कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि ट्रंप वास्तव में अकेले पड़ गए हैं। वे अब पाकिस्तान और तुर्की की मध्यस्थता के जरिए युद्धविराम का रास्ता तलाश रहे हैं। चंद दिनों में ईरान को झुका देने की उनकी और उनके सलाहकारों की शेखी और धारणा पूरी तरह गलत साबित हुई है।
युद्ध खिंचने के कारण अमेरिका सहित पूरी दुनिया में प्राकृतिक गैस और खनिज तेल की भारी कमी पैदा हो रही है। महंगाई बढ़ रही है, मुद्रास्फीति बढ़ रही है और हर देश की अर्थव्यवस्था पर इसकी भारी मार पड़ रही है। इस पूरी परिस्थिति के लिए 'विलेन' के रूप में एक ही चेहरा सामने है— डोनाल्ड ट्रंप।
अमेरिका की फजीहत तो वियतनाम और अफगानिस्तान युद्ध के समय भी हुई थी और वह किसी न किसी तरह वहां से बाहर निकल गया था। लेकिन यहाँ ट्रंप को कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। वे बाहर तो निकलना चाहते हैं, पर अंदर क्यों घुसे थे, इसका कोई स्पष्टीकरण उनके पास नहीं है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति को पकड़ लाए और सत्ता परिवर्तन कर दिया, लेकिन यहाँ ईरान में दांव उल्टा पड़ रहा है।
सैन्य शक्ति के मामले में अमेरिका हर क्षेत्र में ईरान से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। परंतु अमेरिका की कल्पना के विपरीत, ईरान ने जिस चतुराई से जवाब दिया है, उसने युद्ध को एक अलग ही दिशा दे दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) की नाकेबंदी और खाड़ी देशों पर अचानक किए गए रणनीतिक हमलों ने अमेरिका को कश्मकश में डाल दिया है। खुद ट्रंप स्वीकार करते हैं कि यह अमेरिका के लिए कल्पना से परे था। हालांकि, यह भी गौर करने वाली बात है कि ईरान अपनी इंटेलिजेंस की कमजोरी के कारण अपने शीर्ष नेतृत्व को नहीं बचा सका।
हम आशा करते हैं कि इस युद्ध का शीघ्र ही कोई समाधान निकले और विश्व में पुनः शांति स्थापित हो।
मु. उमर वोहरा
रिटायर्ड चीफ़ इंजीनियर, GETCO