मुस्लिम महिलाओं को अपना इतिहास जानना और समझना बेहद ज़रुरी
भारतीय समाज को विकसित एवं सभ्य बनाने में मुसलमानों का बड़ा योगदान रहा है, फिर चाहे भाषा हो, संस्कृति हो, टेक्नोलॉजी हो, हर क्षेत्र में मुस्लिम योगदान को भुलाया या झुठलाया नहीं जा सकता। लेकिन वर्तमान समय में देश के अंदर ऐसा नैरेटिव बनाया जा रहा है कि मुस्लिम केवल एक लुटेरे शासक के अलावा कुछ नहीं थे। भारतीय इतिहास के कुछ स्वर्णिम पहलुओं पर आभा संपाकीय बोर्ड की सदस्य सुमैया मरयम ने प्रोफेसर डॉक्टर सफ़ूरा राज़ेक से बातचीत की। डॉक्टर सफ़ूरा ने ‘मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और भारतीय लोकतंत्र’ पर रिसर्च की है। इसके अलावा भी उनके अनेकों रिसर्च पेपर विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। पेश है उनसे बातचीत के कुछ अंशः
भारतीय इतिहास में आदर्श मुस्लिम योगदान आपके अनुसार क्या है?
पहली बात जब हम भारतीय मुसलमानों की बात करते हैं तो हमें याद रखना चाहिए कि वे यहां पर अलग अलग जगह से अलग अलग समय पर आए हैं। सबसे पहली बात यह है कि जब वे सेंट्रल एशिया से यहां आए थे तो वे एक अमीर कल्चर से संबंध रखते थे। और उनका यह कल्चर हमें आर्किटेक्ट के रुप में, प्रतिदिन के जीवन में, और तमीज़ व तहज़ीब की शक्ल में दिखाई देता है और यह बहुत बड़ा योगदान है भारतीय समाज को विकसित बनाने में। ईरानी मुस्लिम जो आए उन्होंने भारतीय समाज को अदब सिखाया जिससे सभ्य समाज का निर्माण हुआ।
कल्चर योगदान मुस्लिमों का क्या रहा?
फूड, लिविंग, टेक्नोलॉजी, यूनानी मेडिसिन, प्रिटिंग प्रेस, पेपर मेकिंग इत्यादि। प्रिटिंग प्रेस और पेपर मेकिंग यह दोनों चीज़ तुर्की के द्वारा भारत में आयी। इसके अलावा गुड गवर्नेंस मुस्लिमों द्वारा ही दिया गया। बाबर ने हुमायुं के लिए भी लिखवाया था। जिसमें नैतिकता और इंसानियत की शिक्षा राज परिवार के लोगों को दी जाती थी। राजनीतिक भाषा को विकसित करने में भी मुस्लिमों का ही योगदान रहा है।
भारतीय शिक्षा व्यवस्था को साम्राज्यवाद के चंगुल से निकालने में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का क्या योगदान रहा है?
हमारे देश के गुलामी के दौर में जो शिक्षा व्यवस्था थी वह असमानता व अन्याय से जुड़ी हुई थी। जब इसका डीकोलोनाइज़ेशन हुआ तो मौलाना आज़ाद और उनके जैसे लोगों का यह प्रयास रहा कि ऐसी शिक्षा प्रणाली बने जिससे सामाजिक न्याय को बढ़ावा मिले। लोकतांत्रिक आधार पर सबको शिक्षा मिले, उसमें असमानता व भेदभाव ना हो। शिक्षा पर हर किसी का अधिकार हो।
क्या हमारे आज के एजुकेशन सिस्टम में भी साम्राज्यवाद का प्रभाव मौजूद है?
बिल्कुल आज भी उसका प्रभाव हमारे एजुकेशन सिस्टम में देखने को मिलता है। जो हमारे नेता उस समय सोच रहे थे कि इस तरह का हमारा देश होगा तो उनकी कल्पना में यह अध्यात्मिकता, नैतिकता आदि चीज़ें थीं जो सामाजिक न्याय को बढ़ावा देतीं। वे पूंजीवाद से एजुकेशन सिस्टम को बचाना चाहते थे लेकिन आज हमने उसे बहुत कायदे से जकड़ा हुआ है।
इसके प्रभाव से बाहर निकलने का क्या तरीका हो सकता है वर्तमान समय में?
हमें बचपन में नैतिक शिक्षा पढ़ाई जाती थी जिसमें नैतिकता का महत्व हर चीज़ से ज़्यादा था। एक देश के रुप में हिंदू, मुस्लिम, जैन, सिख, ईसाई हर किसी के लिए नैतिक शिक्षा और नैतिकता महत्वपूर्ण होती थी। यही चीज़ हमारे एजुकेशन सिस्टम को पूंजीवाद से बचा सकती है।
आपकी रिसर्च में हमने देखा कि आपने नए दौर की महिलाओं के बारे में बात की है, तो क्या है यह नए दौर की महिला?
1857 की क्रांति के बाद जब मुस्लिमों के सामने अपनी पहचान और अस्तित्व का सवाल खड़ा हुआ तो सर सैय्यद अहमदा खां और दूसरे मुस्लिम लीडर्स ने मुस्लिम नेतृत्व को खड़ा करने की कोशिश की जिसे “शोरफ़ा” नाम दिया गया। यानि ऐसे शरीफ लोगों का ग्रुप जो समाज का प्रतिनिधित्व कर सकें और ऐसे लोगों को बचपन से तैयार करने के लिए एक मां की अर्थात महिला की ज़रुरत पेश आई। यह चीज़ सामने निकलकर आई कि ऐसी माएं तैयार की जाएं जो आने वाली पीढ़ी को इस तरह तैयार कर सकें जो समाज के प्रतिनिधित्व के लायक हों। सर सैय्यद ने तो विशेषरुप से ऐसी महिलाओं को सीधे तौर पर खिताब नहीं किया लेकिन उस समय में डिप्टी नज़ीर अहमद, अल्ताफ़ हुसैन हॉली जैसे लोगों ने इस तरह महिलाओं को मुखातिब किया कि वे नई पीढ़ी की इस प्रकार परवरिश करें, उन्हें इस तरह तैयार करें कि वे आगे चलकर शोरफ़ा बन सकें। मैंने अपनी रिसर्च में भी जिस नए दौर की महिलाओं की बात की है वे अलीगढ़ मूवमेंट से प्रेरित थीं।
तो क्या उस समय के मुस्लिम बौद्धिक समाज ने महिला सशक्तिकरण को समर्थन दिया?
जी बिल्कुल! उस समय के कल्चर के हिसाब से ज़नाना क्वार्टर में रहकर अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए साम्राज्यवाद के खिलाफ़ अपना योगदान देना बेहद महत्वपूर्ण चीज़ है जो उस समय की महिलाओं ने किया। यह महिला सशक्तिकरण ही था जिसने मुस्लिम महिलाओं को इतना मज़बूत बनाया। दुर्भाग्यवश इस सशक्तिकरण को समाज में स्थान नहीं मिला।
मौलाना आज़ाद का नेशनलिज़्म का एक कांसेप्ट था, उसे आप किस तरह देखती हैं?
जब हम आज़ाद की बात करते हैं तो हमें यह समझना होगा कि आज़ाद ऐसे मुस्लिम देखना चाहते थे जो साम्राज्यवाद के जाल से निकलकर अपने देश और समाज के बारे में सोचे, उनसे प्रेम करे और साथ ही इस्लाम से भी उतना ही प्रेम करे। आज़ाद सांप्रदायिकता और साम्राज्यवाद दोनों के खिलाफ़ थे। वे लोकतांत्रिक समाज का निर्माण चाहते थे।
आज के दौर में मुस्लिम योगदान को याद करना और समझना क्यों ज़रुरी है?
आज के समय में विशेषरुप से मुस्लिम महिलाओं को अपना इतिहास और ऐतिहासिक योगदान को जानना और समझना ज़रुरी है क्योंकि जब वह जानेंगी तभी भविष्य की पीढ़ियां अपने इतिहास को जान पाएंगी। तभी भावी पीढ़ियों में आत्मविश्वास आएगा और वे अपने असित्व व पहचान के लिए कुछ कर पाएंगे। हमें अपने इतिहास को इसलिए भी जानना ज़रुरी है कि हम लोकतंत्र के बारे में बात कर सकें, समानता की बात कर सकें, सामाजिक पिछड़ेपन पर बात कर सकें।