दुनिया में बढ़ती युद्ध की प्रवृत्ति
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कवर स्टोरी

दुनिया में बढ़ती युद्ध की प्रवृत्ति

क्या हम शीत युद्ध से गुज़र रहे हैं, या विश्व युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं?



I. परिचय

दिसंबर 2025 की एक सर्द सुबह। ग़ाज़ा के मलबे में तब्दील हुए एक घर के पास खड़े लोग एक छोटे बच्चे के निर्जीव शरीर को निकालने की कोशिश कर रहे थे। उसी दिन Armed Conflict Location & Event Data Project (ACLED) के अनुसार दुनिया भर में 550 से अधिक हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं । एक ओर यह दृश्य—मानव पीड़ा का चरम—और दूसरी ओर आंकड़े, जो बताते हैं कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि अब ऐसे दृश्य एक सामान्य होते जा रहे हैं।

2025 में ACLED के अनुसार वैश्विक स्तर पर 1,85,000 से अधिक हिंसक घटनाएँ दर्ज हुईं—जो 2021 की तुलना में लगभग दोगुनी हैं। इन घटनाओं में 2,40,000 से अधिक लोगों की जान गई। इसी समय Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) की रिपोर्ट बताती है कि 2024 में वैश्विक सैन्य व्यय 2.7 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया—लगातार दसवें वर्ष वृद्धि के साथ 9.4% की छलांग।

यह केवल संख्याओं का खेल नहीं है। यह उस दिशा का संकेत है जिसमें मानव सभ्यता बढ़ रही है। युद्ध अब केवल सीमाओं का संघर्ष नहीं, बल्कि राजनीतिक राष्ट्रवाद, महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विफलता का संयुक्त परिणाम बन चुका है।

अंत में एक प्रश्न उभरता है: क्या हम 1930 के दशक की ओर लौट रहे हैं—या उससे भी अधिक ख़तरनाक दौर में प्रवेश कर चुके हैं?

II. युद्धों की बढ़ती प्रवृत्ति: आंकड़े और क्षेत्रीय परिदृश्य

यदि दुनिया के नक़्शे को आज देखा जाए, तो वह शांति के रंगों से अधिक संघर्ष के धब्बों से भरा दिखाई देता है। ACLED Conflict Index 2025 के अनुसार, लगभग 74% हिंसक घटनाओं में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सरकारें शामिल हैं—जो यह दर्शाता है कि राज्य स्वयं संघर्ष के प्रमुख कारक बनते जा रहे हैं। यूक्रेन और फिलिस्तीन जैसे दो संघर्ष अकेले ही वैश्विक हिंसा की 40% से अधिक घटनाओं से जुड़े हैं। यूरोप में रूस-यूक्रेन युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है, जहाँ ड्रोन युद्ध और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सैन्य तकनीकें युद्ध के स्वरूप को और भी भयावह बना रही हैं।

मध्य पूर्व में स्थिति और अधिक डरावनी है। दी लान्सेट के अनुसार ग़ाज़ा में 2023 से अब तक 93,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है, और अकाल की स्थिति गहराती जा रही है। यमन और सीरिया में लंबे समय से चल रहे संघर्ष अब लगभग भुला दिये गए हैं—जहाँ हिंसा अब सामान्य बात हो चुकी है। अफ्रीका में सूडान आज दुनिया का सबसे बड़ा विस्थापन संकट झेल रहा है—लगभग 1.2 करोड़ लोग अपने घरों से बेघर हो चुके हैं, और कई क्षेत्रों में आधिकारिक रूप से अकाल घोषित किया जा चुका है।

एशिया भी इससे अछूता नहीं है। म्यांमार में सैन्य शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष जारी है, भारत-चीन सीमा पर तनाव बना हुआ है, और ताइवान को लेकर बढ़ती आशंकाएँ एक बड़े टकराव की ओर इशारा कर रही हैं। विश्व शांति सूचकांक (Global Peace Index) 2025 स्पष्ट रूप से बताता है कि वैश्विक शांति में लगातार गिरावट हो रही है।

लगता है युद्ध अब अपवाद नहीं, बल्कि राजनीति का स्वाभाविक विकल्प बन चुका है। 

III. हथियारों की होड़: पारंपरिक से आधुनिकतम हथियारों की नई दौड़

जब युद्ध बढ़ते हैं, तो हथियार भी बढ़ते हैं—और आज की दुनिया में यह वृद्धि अभूतपूर्व है। SIPRI के अनुसार, 2024 में अमेरिका का सैन्य व्यय 997 बिलियन डॉलर तक पहुँच गया, जबकि चीन 314 बिलियन डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर है। यह केवल खर्च नहीं, बल्कि शक्ति-संतुलन की एक आक्रामक पुनर्संरचना है।

2021-25 के बीच अंतरराष्ट्रीय हथियारों के हस्तांतरण में 9.2% की वृद्धि हुई, और यूक्रेन दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक बन गया—जो इस बात का संकेत है कि युद्ध अब केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक सैन्य-आर्थिक नेटवर्क से संचालित हो रहे हैं।

लेकिन यह केवल पारंपरिक हथियारों की बात नहीं है। परमाणु हथियारों की दौड़ एक नए, अधिक ख़तरनाक चरण में प्रवेश कर चुकी है। SIPRI Yearbook 2025 के अनुसार, विश्व में लगभग 12,100 परमाणु वारहेड मौजूद हैं, जो देशवार इस प्रकार हैं:

  • रूस – लगभग 5,580 वारहेड 

  • अमेरिका – लगभग 5,040 वारहेड 

  • चीन – 600+ वारहेड (तेजी से वृद्धि) 

  • फ्रांस – लगभग 290 

  • ब्रिटेन – लगभग 225 

  • पाकिस्तान – लगभग 170 

  • भारत – लगभग 164 

  • इज़राइल – अनुमानित 90 

  • उत्तर कोरिया – अनुमानित 30–50 

इनमें से लगभग 3,800 वारहेड सक्रिय तैनाती (deployed) की स्थिति में हैं, जबकि 2,000 से अधिक हाई अलर्ट पर रखे गए हैं—जो मिनटों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं।

चिंताजनक यह है कि सभी परमाणु शक्तियाँ—चाहे अमेरिका और रूस हों या चीन, भारत और पाकिस्तान—अपने शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रही हैं। चीन का तेज़ी से विस्तार, रूस-अमेरिका के बीच New START संधि का संभावित अंत (2026), और उत्तर कोरिया की लगातार परीक्षण गतिविधियाँ—ये सभी संकेत देते हैं कि “परमाणु हथियारों की नई दौड़” अब वास्तविकता बन चुकी है।

भयानक नए हथियार

इसी के साथ, युद्ध के नए आयाम उभर रहे हैं। हाइपरसोनिक मिसाइलें—जैसे रूस की Avangard और चीन की DF-17—ध्वनि की गति से कई गुना तेज़ हैं और पारंपरिक रक्षा प्रणालियों को अप्रभावी बना सकती हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी अंतरिक्ष-आधारित रक्षा प्रणालियों (जैसे मिसाइल शील्ड परियोजनाएँ) पर काम कर रहे हैं, जो युद्ध को पृथ्वी से बाहर तक विस्तारित कर रही हैं।

ड्रोन युद्ध ने भी युद्ध के चरित्र को बदल दिया है। यूक्रेन, ग़ाज़ा और यमन में सस्ते लेकिन घातक ड्रोन ने दिखा दिया है कि अब युद्ध केवल महाशक्तियों का विशेषाधिकार नहीं रहा। ACLED के अनुसार, 469 से अधिक ग़ैर-राज्य समूह अब ड्रोन का उपयोग कर रहे हैं।

साइबर युद्ध भी उतना ही ख़तरनाक बन चुका है—जहाँ बिजली ग्रिड, बैंकिंग सिस्टम और संचार नेटवर्क को बिना गोली चलाए पंगु बनाया जा सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह होड़ केवल मात्रा (quantity) की नहीं, बल्कि गुणवत्ता (quality) की है। यह पारंपरिक “Mutually Assured Destruction (MAD)” की अवधारणा को चुनौती दे रही है, क्योंकि नई तकनीककों के कारण “पहले प्रहार” (first strike) अधिक पसंदीदा और संभव हो गए हैं।

लेकिन परमाणु हथियार ही विनाश का अंतिम रूप नहीं हैं। आधुनिक युद्ध में कई ऐसे हथियार मौजूद हैं, जिनकी विध्वंसक क्षमता, भले ही परमाणु स्तर की न हो, परन्तु मानवीय दृष्टि से उतनी ही भयावह है।

हाइड्रोजन बम (Thermonuclear Weapons): ये परमाणु बमों से कहीं अधिक शक्तिशाली होते हैं। अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देशों के शस्त्रागार में अधिकांश उन्नत वारहेड वास्तव में हाइड्रोजन बम आधारित हैं। उदाहरण के लिए, रूस का RS-28 Sarmat (“Satan-II”) एक ही मिसाइल में कई हाइड्रोजन वारहेड ले जाने में सक्षम है। इनकी शक्ति हिरोशिमा पर गिराए गए बम से सैकड़ों गुना अधिक हो सकती है।

नापाम बम (Napalm) और थर्मोबारिक हथियार: नापाम एक ज्वलनशील रासायनिक मिश्रण है, जो लक्ष्य को लंबे समय तक जलाता है। यद्यपि इसका उपयोग औपचारिक रूप से प्रतिबंधित या सीमित है, परन्तु इसके आधुनिक रूप—थर्मोबारिक (fuel-air explosives)—आज भी रूस, अमेरिका और अन्य देशों द्वारा विकसित और उपयोग किए जाते हैं। ये विस्फोट के साथ-साथ ऑक्सीजन को खींचकर अत्यधिक ताप और दाब उत्पन्न करते हैं, जिससे बंद स्थानों में भीषण मृत्यु होती है।

क्लस्टर बम (Cluster Munitions): ये बम एक साथ सैकड़ों छोटे “सबम्यूनिशन” छोड़ते हैं, जो बड़े क्षेत्र में फैल जाते हैं। समस्या यह है कि इनका एक हिस्सा विस्फोट नहीं करता और बाद में नागरिकों—विशेषकर बच्चों—के लिए घातक जाल बन जाता है। अमेरिका, रूस और यूक्रेन सहित कई देशों द्वारा इनका उपयोग विवादों के केंद्र में रहा है।

रासायनिक हथियार (Chemical Weapons): सीरिया जैसे संघर्षों में सरिन और क्लोरीन गैस के उपयोग के आरोप लगे हैं। यद्यपि Chemical Weapons Convention (CWC) इनके उपयोग को प्रतिबंधित करता है, फिर भी इनका खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

जैविक हथियार (Biological Weapons): ये सबसे ख़तरनाक संभावित हथियारों में से हैं—जहाँ वायरस या बैक्टीरिया को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। इनके प्रभाव सीमाओं से आगे जाकर वैश्विक महामारी का रूप ले सकते हैं।

हाइपरसोनिक और AI-संचालित हथियार: आज की सबसे चिंताजनक प्रवृत्ति यह है कि हथियार “स्मार्ट” होते जा रहे हैं। हाइपरसोनिक मिसाइलें, स्वायत्त ड्रोन (killer robots), और AI आधारित लक्ष्य-चयन प्रणाली—ये सब युद्ध को मानवीय नियंत्रण से दूर स्वचालित बना रहे हैं।

इन हथियारों का संयुक्त प्रभाव केवल विनाश नहीं, बल्कि पीड़ा का विस्तार है—जहाँ मृत्यु फ़ौरन नहीं, बल्कि धीमी, कष्टदायक और पीढ़ियों तक चलने वाली होती है। यही कारण है कि विशेषज्ञ इसे “तकनीकी बर्बरता” (technological barbarism) कहते हैं—जहाँ विज्ञान की प्रगति मानवता की रक्षा के बजाय उसके विनाश का साधन बन रही है।

इस प्रकार, आज की हथियारों की होड़ एक बहु-स्तरीय, बहु-आयामी प्रतिस्पर्धा बन चुकी है—जहाँ परमाणु, साइबर, अंतरिक्ष और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सभी एक साथ युद्ध के नए स्वरूप को आकार दे रहे हैं।

क्या हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ युद्ध केवल तेज़ नहीं, बल्कि अधिक अकल्पनीय, स्वचालित और विनाशकारी होंगे—जहाँ निर्णय मानव नहीं, बल्कि एल्गोरिदम लेंगे?

IV. राजनीति का केंद्रीय रोल: राष्ट्रवाद, महाशक्तियां और संस्थागत विफलता

युद्धों के पीछे केवल हथियार नहीं, बल्कि राजनीति भी होती है—और आज की राजनीति अधिक आक्रामक, अधिक राष्ट्रवादी और अधिक विभाजनकारी होती जा रही है।

अमेरिका बनाम चीन-रूस गुट की प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक शक्ति संतुलन को और भी अस्थिर कर दिया है। रूस-यूक्रेन संघर्ष में NATO विस्तार और रूस की सुरक्षा चिंताओं का टकराव इसका उदाहरण है।

मध्य पूर्व में ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते तनाव के परिणाम स्वरूप अमेरिका-इज़राइल द्वारा ईरान पर सैन्य कार्रवाई ने इस क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की आग में झोंक दिया है। यह प्रत्यक्ष युद्ध के अलावा शक्तिशाली देशों के बीच अप्रत्यक्ष युद्धों (proxy wars) की श्रृंखला भी है—जहाँ क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने-अपने प्रभाव को बचाने या बढ़ाने के लिए लड़ रही हैं।

इस बीच, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद लगभग निष्क्रिय हो चुकी है—वीटो की राजनीति ने उसे पंगु बना दिया है। परिणामस्वरूप, अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून (IHL) का क्षरण हो रहा है, और हथियारों का निर्यात एक राजनीतिक ‘व्यवसाय’ बनता जा रहा है।

साफ़ दिखाई दे रहा है कि राजनीति अब मानवता की रक्षा करने के बजाय युद्ध को वैध बनाने का माध्यम बन चुकी है।

V. मानवता का संकट: मानवीय, आर्थिक और नैतिक आयाम

युद्धों का सबसे बड़ा बोझ हमेशा आम लोगों पर पड़ता है। युद्ध के कारण 2025 में 56,000 से अधिक नागरिकों की मौत हुई। UNHCR के अनुसार, 2025 के मध्य तक 11.7 करोड़ लोग विस्थापित हो चुके थे—जो मानव इतिहास का सबसे बड़ा आंकड़ा है।

Integrated Food Security Phase Classification (IPC) के अनुसार, 29.5 करोड़ लोग गंभीर भुखमरी का सामना कर रहे हैं। ग़ाज़ा और सूडान में बच्चों पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है—64,000 से अधिक बच्चे मारे गए या घायल हुए। आर्थिक दृष्टि से, युद्धों ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को तोड़ दिया है, ऊर्जा और खाद्य संकट रोज़ाना है, और कई देशों की GDP पर गंभीर प्रभाव डाला है। पर्यावरणीय दृष्टि से, युद्ध कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण बढ़ा है—जिससे जलवायु संकट और गहरा हुआ है।

लेकिन सबसे गहरा संकट नैतिक है। युद्ध अपराधों की बढ़ती घटनाएँ, मानवाधिकारों का क्षरण, और हिंसा का सामान्यीकरण—यह सब मिलकर मानवता की सामूहिक चेतना को कमज़ोर कर रहे हैं। एक पूरी पीढ़ी—जो युद्ध के बीच बड़ी हो रही है—मानसिक आघात (Mental trauma), शिक्षा की कमी और स्वास्थ्य संकट से जूझ रही है। 

विचारणीय बात यह है कि जब युद्ध सामान्य हो जाए तो मानव जीवन का क्या मूल्य शेष रह जाता है?

VI. मानवता की पुकार: युद्ध नहीं शांति चाहिए

आज के आंकड़े केवल आँकड़े नहीं हैं; वे आने वाले समय की भयावह प्रस्तावना हैं। दुनिया एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहाँ युद्ध अब असाधारण घटना नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का सामान्य उपकरण बनता जा रहा है। हथियारों की अंधी दौड़, उग्र राष्ट्रवाद और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की निष्क्रियता—ये तीनों मिलकर उस अराजकता को जन्म दे रहे हैं जिसकी गूँज हमें 1939 के अंधकारमय दौर की याद दिलाती है, बल्कि उससे भी अधिक जटिल और ख़तरनाक रूप में।

यदि कूटनीति को पुनर्जीवित नहीं किया गया, यदि हथियारों की होड़ पर नियंत्रण नहीं किया गया, और यदि संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों को वास्तविक संरचनात्मक सुधारों के माध्यम से प्रभावी नहीं बनाया गया, तो यह संकट केवल बना नहीं रहेगा, बल्कि एक व्यापक वैश्विक आपदा का रूप ले लेगा। यह वह स्थिति होगी जहाँ युद्ध केवल सीमाओं को नहीं, बल्कि मानव सभ्यता की नींव को भी ध्वस्त कर देगा।

फिर भी, निराशा मानव स्वभाव नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब-जब मानवता ने अपने विवेक की आवाज़ को सुना है, उसने विनाश के रास्ते से लौटने का साहस भी दिखाया है। आज भी वही संभावना मौजूद है—नागरिक समाज की आवाज़ में, युवाओं की बेचैनी में, और उन वैश्विक मंचों में जो शांति, न्याय और सह-अस्तित्व की नई परिकल्पना कर सकते हैं। G20 और BRICS+ जैसे मंच यदि केवल आर्थिक एजेंडे से आगे बढ़कर शांति को प्राथमिकता दें, तो विश्व व्यवस्था की दिशा बदली जा सकती है। हमें समझना होगा कि मानवता का कल्याण युद्ध में नहीं शांति में है। हमें युद्ध नहीं शांति चाहिए। 

अंततः, प्रश्न हथियारों की संख्या या युद्धों की भीषणता का नहीं है—प्रश्न यह है कि क्या मानवता अब भी अपने भीतर इतनी नैतिक शक्ति और दूरदृष्टि रखती है कि वह इस विनाशकारी दौड़ को रोक सके। 

क्योंकि यदि अब भी न जागे, तो आने वाला कल इतिहास नहीं लिखेगा—वह केवल ख़ामोशी और मलबे की विरासत छोड़ जाएगा। 

संदर्भ

[1] ACLED Conflict Index Report, 2025

[2] SIPRI Yearbook, 2025

[3] UCDP Armed Conflict Dataset, 2024-25

[4] Global Peace Index, 2025

[5] UNHCR Global Trends Report, 2025

[6] IPC Global Hunger Report, 2025

[7] The Lancet May 2025


डॉ. मुहम्मद इक़बाल सिद्दीकी

वरिष्ठ लेखक, नई दिल्ली

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