इंसानियत (जंग के हालत में)
أَعُوذُ بِاللّٰهِ مِنَ الشَّيْطَانِ الرَّجِيمِ
بِسْمِ اللّٰهِ الرَّحْمٰنِ الرَّحِيْمِ
مَنۡ قَتَلَ نَفۡسًۢا بِغَيۡرِ نَفۡسٍ اَوۡ فَسَادٍ فِى الۡاَرۡضِ فَكَاَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيۡعًا ؕ وَمَنۡ اَحۡيَاهَا فَكَاَنَّمَاۤ اَحۡيَا النَّاسَ جَمِيۡعًا ؕ ۞
“जिसने किसी एक जान को नाहक़ क़त्ल किया, तो गोया उसने पूरी इंसानियत को क़त्ल किया, और जिसने एक जान को बचाया, तो गोया उसने पूरी इंसानियत को बचाया।”
(सूरह अल-माइदा: 32)
सूरह माएदा एक मदनी सूरह है जो इंसानी ज़िंदगी के तमाम पहलुओं, ख़ास तौर पर मुआहिदात (समझौते), हलाल व हराम और अद्ल व इंसाफ़ के कानून पर रोशनी डालती है।
इस सूरह की आयत नंबर 32 इंसानी जान की हुरमत और आलमी अमन का ऐसा चार्टर पेश करती है, जिसकी मिसाल दुनिया के किसी भी क़ानून में नहीं मिलती।
सूरह माएदा की यह आयत हमें सिखाती है कि इंसानी जान की हुरमत रंग, नस्ल और मज़हब से ऊपर है। चाहे हालात जंग के हों या अमन के, एक बेगुनाह इंसान का ख़ून पूरी दुनिया का ख़ून है।
इस्लाम का मक़सद ज़मीन पर फ़साद को ख़त्म करना और अद्ल व इंसाफ़ के ज़रिये इंसानियत की हिफ़ाज़त करना है। हमें चाहिए कि इस क़ुरआनी पैग़ाम को आम करें, ताकि दुनिया से दहशतगर्दी और नाहक़ ख़ून-रेज़ी का ख़ात्मा हो सके।
मानव जीवन के मूल्य का सार्वभौमिक सिद्धांत
अल्लाह तआला ने हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के बेटों (हाबील और क़ाबील) की घटना और क़ाबील के हाथों हाबील के नाहक़ क़त्ल के बाद यह कानून निर्धारित किया कि जिसने किसी एक इंसान को (बिना क़िसास या ज़मीन में फ़साद फैलाने के जुर्म के) क़त्ल किया, उसने मानो पूरी इंसानियत का क़त्ल कर दिया।
यह सिद्धांत इसलिए स्थापित किया गया क्योंकि एक इंसान का क़त्ल दरअसल पूरी इंसानियत की पवित्रता को रौंदने और अल्लाह की मख़लूक़ पर ज़ुल्म करने के बराबर है।
आज के हालात से संबंध
आज दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जंग चल रही है, जहाँ: बेगुनाह लोग, बच्चे और औरतें मारे जा रहे हैं, घर, स्कूल और अस्पताल तक सुरक्षित नहीं रहे।
ऐसे हालात में यह आयत हमें याद दिलाती है कि:
हर इंसानी जान बहुमूल्य है। किसी भी हाल में बेगुनाहों को नुकसान पहुँचाना इस्लाम के खिलाफ है।
जंग के दौरान रसूल ﷺ का उस्वा (आदर्श)
हज़रत मुहम्मद ﷺ ने जंग के समय भी इंसानियत की सबसे ऊँची मिसालें पेश कीं:
1. बेगुनाहों की हिफाज़त
आप ﷺ ने सख़्त हिदायत दी: बच्चों, औरतों और बूढ़ों को नुकसान न पहुँचाया जाए। इससे पता चलता है कि इस्लाम में सिविलयन सुरक्षा कितनी ज़रूरी है।
2. रहम और नर्मी का रवैया
आप ﷺ ने सिखाया: “दुश्मन के साथ भी इंसानियत और रहम का बर्ताव करो” अर्थात जंग में भी दिल की सख़्ती नहीं, बल्कि रहम होना चाहिए।
3. क़ैदियों के साथ अच्छा सुलूक
सहाबा को हिदायत दी गई: क़ैदियों को अच्छा खाना खिलाओ, उनके साथ इज़्ज़त से पेश आओ। यह दर्शाता है कि: इस्लाम में दुश्मन के साथ भी इंसानी व्यवहार ज़रूरी है।
4.माफी और अमन को तरजीह
जब मक्का फतह हुआ, तो आप ﷺ ने: अपने दुश्मनों को माफ़ कर दिया। यह इस्लाम का असली पैग़ाम है: बदला नहीं, बल्कि माफी और अमन।
आज की जंगों में जहाँ इंसानियत दबती नजर आती है, वहीं इस्लाम हमें सिखाता है कि हर जान की हिफाज़त करो, ज़ुल्म से बचो, रहम और इंसाफ़ को अपनाओ और अमन को सबसे ऊपर रखो।
काज़िया स्वालिहाती
गुजरात