महिलाओं की प्रगति के लिए पुरुषों की पहल की आवश्यकता
हर वर्ष 8 मार्च को विश्वभर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन महिलाओं को सम्मानित किया जाता है, उनके कार्यों की सराहना की जाती है और समानता के नारे लगाए जाते हैं। परंतु यह भी एक कटु सत्य है कि केवल एक दिन उत्सव मनाने से महिलाओं की वास्तविक स्थिति में परिवर्तन नहीं आता। यदि समाज में महिलाओं की सच्ची प्रगति करनी है, तो पुरुषों को भी अपनी सोच और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाना होगा।
इतिहास साक्षी है कि विभिन्न सभ्यताओं में महिलाओं के प्रति दृष्टिकोण अकसर भ्रमित और अन्यायपूर्ण रहा है। प्राचीन यूनानी सभ्यता में स्त्री को “पेंडोरा” कहकर अनेक बुराइयों की जननी माना गया। रोमन संस्कृति में उसे पति की संपत्ति समझा जाता था। आरंभिक ईसाई चिंतन में भी स्त्रियों के प्रति नकारात्मक विचार पाए जाते हैं। आधुनिक युग में भले ही समानता की बातें की जाती हों, किंतु कई स्थानों पर महिलाओं को आज भी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
समाज चाहे पारंपरिक हो या आधुनिक, अनेक रूपों में महिलाओं का शोषण जारी है। एक ओर उन्हें देवी कहकर पूजने की परंपरा है, तो दूसरी ओर भ्रूण हत्या और घरेलू हिंसा जैसी घटनाएँ भी सामने आती हैं। इसके अतिरिक्त आए दिन यौन शोषण, रेप की घटनाएं भी सामने आती रहती हैं।महिला स्वतंत्रता के नाम पर कभी उन पर दोहरी जिम्मेदारी डाल दी जाती है—घर और बाहर दोनों की।
इस संदर्भ में इस्लाम महिलाओं को स्पष्ट आर्थिक और सामाजिक अधिकार प्रदान करता है। कुरआन में महिलाओं को संपत्ति रखने, मेहर पाने और विरासत में हिस्सा लेने का अधिकार दिया गया है। विवाह में उनकी सहमति अनिवार्य मानी गई है और विशेष परिस्थितियों में उन्हें “खुला” के माध्यम से अलग होने का अधिकार भी है। कुरआन में निर्देश है—“पत्नी के साथ उत्तम व्यवहार करो” (सूरह निसा 4:19) और “आपसी संबंधों में उदारता को न भूलो” (सूरह बकरा 2:237)। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने फरमाया कि तुममें से सबसे अच्छा वह है जो अपने परिवार के साथ अच्छा व्यवहार करे।
स्त्री और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। कुरआन (सूरह रूम 30:21) के अनुसार पति-पत्नी के संबंध का उद्देश्य शांति, प्रेम और करुणा स्थापित करना है। इसलिए विवाह संस्था को मजबूत बनाए बिना समाज में नैतिक संतुलन संभव नहीं है।
महिलाओं की सच्ची उन्नति तभी संभव है जब पुरुष अपनी जिम्मेदारी को समझें—वे केवल अधिकारों की बात न करें, बल्कि व्यवहार में सम्मान, सहयोग और सुरक्षा दें। यदि पुरुष महिलाओं को प्रतिस्पर्धी नहीं बल्कि सहभागी समझें, तो समाज में संतुलन और सद्भाव स्थापित होगा।
महिला दिवस केवल उत्सव का दिन न होकर आत्मचिंतन का अवसर बने—यही इसकी सार्थकता है। महिलाओं को सम्मान, अधिकार और सुरक्षा देना केवल कानून का नहीं, बल्कि नैतिक और सामाजिक कर्तव्य है। जब पुरुष स्वयं आगे बढ़कर महिलाओं की गरिमा की रक्षा करेंगे, तभी वास्तविक प्रगति संभव होगी।
शाईस्ता वाजिद कादरी