नारी सशक्तिकरण : बातें, वादे और हक़ीक़त
8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के उल्लास के बीच महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध एक कड़वी सच्चाई हैं। एनसीआरबी (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच कुल 23,129 महिलाएं और लड़कियां लापता हुईं, जिसका औसत 43 मामले प्रतिदिन और लगभग 51 मामले प्रति घंटा है। इसमें वर्ष 2024 में लापता हुई 12,017 नाबालिग बेटियां और गुजरात में पिछले पांच वर्षों में ग़ायब हुई 40,000 से अधिक महिलाएं शामिल हैं, जो व्यापक स्तर पर मानव तस्करी की जांच की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
देश में महिला सुरक्षा की स्थिति बेहद चिंताजनक है। 2022 में महिलाओं के ख़िलाफ़ 4.45 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए और हर 10 मिनट में एक बलात्कार की घटना सामने आई। एनसीआरबी के अनुसार, बलात्कार, हत्या और सामूहिक अपराधों की दर 69% तक पहुँच चुकी है। घरेलू हिंसा, अपहरण और शीलभंग (डिफ्लोरेशन) के मामले भी बड़ी संख्या में हैं। इन अपराधों में उत्तर प्रदेश सबसे आगे है। सबसे गंभीर चिंता यह है कि इतने मामलों के बावजूद पीड़ितों को न्याय मिलना अब भी मुश्किल बना हुआ है।
भारत में चुनावी घोषणापत्रों में महिलाओं से जुड़े मुद्दों का उल्लेख बढ़ा है। शिक्षा और जागरूकता के कारण महिलाएँ अपने अधिकारों और सुरक्षा को लेकर अधिक सजग हुई हैं। चुनावों के दौरान “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे नारे और महिला सुरक्षा के वादे किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इसके विपरीत है। महिलाओं यहां तक की मासूम बच्चियों पर बढ़ते अत्याचार और लचर कानून व्यवस्था यह दर्शाते हैं कि उन्हें अब भी समय पर न्याय नहीं मिल पा रहा है। इससे भी चिंताजनक यह है कि इतने गंभीर विषय पर न तो राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई देती है और न ही मीडिया में कोई गंभीर बहस होती है। ऐसे में महिला सुरक्षा से जुड़े वादे खोखले प्रतीत होते हैं।
महिलाएँ समाज की रीढ़ हैं और उनके बिना मानव जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। पुरुष और महिलाएँ एक-दूसरे पर निर्भर हैं और उनकी भूमिकाएँ अलग होते हुए भी एक-दूसरे को पूरा करती हैं। इस्लाम दोनों को बराबरी का दर्जा देता है, जहाँ न कोई श्रेष्ठ है न ही हीन, बल्कि जि़म्मेदारियाँ अलग-अलग हैं। जब दोनों एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्यों को निभाते हैं, तभी एक संतुलित और न्यायपूर्ण समाज बनता है।
इस्लाम: महिला सशक्तिकरण (वूमेन एंपावरमेंट) का अग्रदूत (प्रैकर्सर)
आम धारणाओं के विपरीत, इस्लाम ने महिलाओं को अधिकार, सुरक्षा और सम्मान दिया। जिस दौर में महिलाओं को हाशिए पर रखा जाता था, उन पर अत्याचार किया जाता था और उन्हें हीन समझा जाता था, उस समय इस्लाम ने उन्हें बराबरी का दर्जा देकर समाज में भागीदार बनाया। पुरुष और महिला को प्रतिद्वंदी(राइवल) नहीं, बल्कि एक दूसरे का सहयोगी माना गया। महिलाओं की गरिमा और शक्ति को पहचानकर इस्लाम ने एक अधिक न्यायपूर्ण और संतुलित समाज की नींव रखी।
इस्लामिक पारिवारिक व्यवस्था: समानता और पारस्परिक ज़िम्मेदारी
इस्लाम की पवित्र पुस्तक क़ुरान यह सुझाव नहीं देती कि पुरुष महिलाओं से श्रेष्ठ हैं या इसके विपरीत। इसके बजाय, यह परिवार को बनाए रखने और उसकी देखभाल करने की पुरुषों की ज़िम्मेदारी को स्वीकार करता है, इस संदर्भ में उन्हें कुछ हद तक अधिकार प्रदान करता है। हालाकि, इस्लाम पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता सुनिश्चित करता है, जैसे अपराधों के लिए सज़ा, पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान है। अच्छे कामों के लिए पुरस्कार,पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान है।(क़ुरान, 33:35)
इस्लाम परिवार के भीतर पारस्परिक जिम्मेदारी और अधिकारों पर ज़ोर देता है, जैसे कि महिलाओं के अधिकारों का सम्मान करने के लिए पुरुष उत्तरदायी हैं। पुरुषों के अधिकारों को पूरा करने के लिए महिलाएं समान रूप से ज़िम्मेदार हैं। पुरुषों और महिलाओं दोनों के समान अधिकार और दायित्व हैं। यह संतुलित दृष्टिकोण एक सामंजस्यपूर्ण और न्यायसंगत पारिवारिक व्यवस्था को बढ़ावा देता है।
इस्लाम द्वारा महिलाओं के मौलिक अधिकारों की गारंटी
इस्लाम स्पष्ट रूप से महिलाओं को अंतर्निहित (बुनियादी) अधिकार प्रदान करता है, जैसे,जीने का अधिकार जिसमें किसी भी व्यक्ति को महिलाओं को उनके जीवन से वंचित करने का अधिकार नहीं है। सम्मान का अधिकार जिसमें महिलाओं को अपमान से मुक्त सम्मान और गरिमा के साथ जीने का अधिकार है। शिक्षा का अधिकार जिसमें महिलाओं को ज्ञान और शिक्षा प्राप्त करने की स्वतंत्रता है, जिससे वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बन सकती हैं।
ये मौलिक अधिकार लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के प्रति इस्लाम की प्रतिबद्धता की आधारशिला हैं।
इस्लाम द्वारा महिलाओं की विशिष्ट परिस्थितियों को मान्यता
इस्लाम पुरुषों और महिलाओं के बीच प्राकृतिक अंतर को स्वीकार करता है और उसका सम्मान करता है। महिलाओं की अंतर्निहित शक्तियों और कमज़ोरियों को ध्यान में रखते हुए, इस्लाम ने महिलाओं को बाहरी ज़िम्मेदारियों से मुक्त किया है, जिससे उन्हें अपने स्वास्थ्य और परिवार पर ध्यान केंद्रित करने की अनुमति मिलती है।
महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आजीविका प्रदान करने की जिम्मेदारी केवल पुरुषों पर डाली गई है। पुरुषों द्वारा अपनी पत्नियों के ख़र्चों की उपेक्षा करना एक आपराधिक अपराध माना है, जबकि महिलाओं को जीविकोपार्जन न करने के लिए किसी भी दोष से मुक्त किया है। यह दृष्टिकोण महिलाओं के प्रति इस्लाम के दयालु और न्यायसंगत व्यवहार को दर्शाता है।
इस्लाम द्वारा महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का सशक्तिकरण
इस्लाम ने महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की रक्षा की है, उन्हें पूर्ण वित्तीय सुरक्षा प्रदान की है, जैसे- महिलाएँ संपत्ति ख़रीद और बेच सकती हैं, तथा जीविका कमाने के लिए व्यवसाय कर सकती हैं। वे अपनी संपत्तियों पर पूर्ण स्वामित्व और नियंत्रण रखती हैं, तथा पति, माता-पिता या ससुराल वालों द्वारा शोषण से सुरक्षित रहती हैं। महिलाओं को अपने पति से दहेज और माता-पिता से विरासत के माध्यम से वित्तीय सहायता मिलती है। वे अपने पति की संपत्ति और परिसंपत्तियों में से भी एक हिस्से की हकदार हैं।
इस्लाम अपने पति की मृत्यु के बाद भी महिलाओं की वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करता है, जिससे वे बेघर नहीं होती हैं। महिलाओं को आर्थिक स्वायत्तता प्रदान करके और उनके वित्तीय अधिकारों की रक्षा करके, इस्लाम उनके सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देता है।
विधवाओं के पुनर्विवाह और वित्तीय कल्याण के लिए इस्लाम का समर्थन
इस्लाम विधवाओं के कल्याण को बढ़ावा देता है, उन्हें पुनर्विवाह का अधिकार देता है, इस प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए सामाजिक प्रोत्साहन मिलता है तथा उनकी आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए पिता, भाई, चाचा और मामा सहित रिश्तेदारों से वित्तीय सहायता प्राप्त होती है।
इस्लाम विधवाओं पर वित्तीय बोझ को कम करता है, इसके बजाय उनके रिश्तेदारों पर उनके लिए प्रावधान करने की ज़िम्मेदारी डालता है। यह दृष्टिकोण कमजोर लोगों की रक्षा करने और सामाजिक ज़िम्मेदारी को बढ़ावा देने के लिए इस्लाम की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
महिलाओं को इस्लाम का सशक्त उपहार
इस्लाम ने महिलाओं को उनकी अंतर्निहित स्त्रीत्व को पहचानकर उन्हें अद्वितीय रूप से सशक्त बनाया है। पश्चिमी समाजों के विपरीत, जहाँ अकसर महिलाओं को समानता प्राप्त करने के लिए पुरुषों के गुणों को अपनाने की आवश्यकता होती है, इस्लाम ने महिलाओं को उनकी स्त्रीत्व पहचान को त्यागने की आवश्यकता के बिना अधिकार और सम्मान प्रदान किया है। समानता के लिए प्रतिस्पर्धात्मक संघर्ष में महिलाओं को पुरुषों के विरुद्ध खड़ा होने से बचाया है तथा उनके प्राकृतिक गुणों का त्याग किए बिना उनकी क्षमता प्राप्त करने में सक्षम बनाया है।
मुस्लिम समाज भारत के नेताओं और ज़िम्मेदार नागरिकों से सहानुभूति रखते हुए ईमानदारी के साथ महिलाओं के कल्याण को प्राथमिकता देने की हार्दिक अपील करता है। उनके साथ लगातार हो रहे अन्याय, अनैतिक कृत्य और शोषण की घोर निंदा करता है और सभी से आग्रह करता है कि महिलाओं के साथ दया और सम्मान से पेश आएँ तथा उनके साथ हो रहे अन्याय और घिनौने कृत्यों के लिए दोषियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट द्वारा सज़ा देने का प्रावधान किया जाए।
आइए हम सभी के लिए, विशेष रुप से हमारी महिलाओं के लिए एक अधिक न्यायपूर्ण और दयालु समाज बनाने के लिए मिलकर प्रयास करें।
रज़िया मसूद
भोपाल, एमपी